भारत में राष्ट्रवाद
Nationalism in India — कक्षा 10 इतिहास, अध्याय 2 | RBSE · NCERT · CBSE Board 2025
भारत में राष्ट्रवाद (Nationalism in India) का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। 20वीं सदी के प्रारंभ में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने एक नया स्वरूप ग्रहण किया। गांधीजी ने सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित जन-आंदोलनों के माध्यम से करोड़ों भारतीयों को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा।
प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के बाद भारत में राजनीतिक जागृति का एक नया दौर शुरू हुआ। रॉलेट एक्ट (1919), जलियाँवाला बाग हत्याकांड, और खिलाफत आंदोलन ने भारतीय जनमानस को झकझोर दिया। इसके बाद असहयोग आंदोलन (1920-22), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34), और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।
1. प्रथम विश्व युद्ध और भारतीय राष्ट्रवाद (1914-1918)
प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) ने भारत की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को गहराई से प्रभावित किया। युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत से भारी मात्रा में संसाधन और सैनिक लिए। इस युद्ध ने भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में निर्णायक भूमिका निभाई।
युद्ध का भारत पर प्रभाव
| क्षेत्र | प्रभाव | परिणाम |
|---|---|---|
| आर्थिक बोझ | रक्षा व्यय में भारी वृद्धि; युद्ध के लिए करों में वृद्धि | आम जनता पर आर्थिक बोझ; गरीबी बढ़ी |
| सैन्य भर्ती | गाँवों से जबरन सैनिक भर्ती; 13 लाख भारतीय सैनिक युद्ध में भेजे गए | ग्रामीण क्षेत्रों में रोष; कृषि प्रभावित |
| मूल्य वृद्धि | 1913-18 के बीच वस्तुओं की कीमतें दोगुनी हुईं | जीवन यापन कठिन; आर्थिक संकट |
| महामारी | 1918-19 में इन्फ्लुएंजा महामारी फैली | 12-13 मिलियन (1.2-1.3 करोड़) लोगों की मृत्यु |
| राजनीतिक निराशा | स्वशासन की आशा टूटी; रॉलेट एक्ट जैसे दमनकारी कानून | क्रांतिकारी विचारधारा को बल; राष्ट्रवाद का उदय |
भारतीयों को आशा थी कि युद्ध में ब्रिटेन की सहायता के बदले उन्हें स्वशासन (Home Rule) मिलेगा। परंतु युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट जैसे दमनकारी कानून बनाए, जिससे भारतीयों में गहरी निराशा और क्रोध उत्पन्न हुआ।
2. गांधीजी का भारत आगमन और प्रारंभिक गतिविधियाँ (1915)
मोहनदास करमचंद गांधी (2 अक्टूबर 1869 - 30 जनवरी 1948) जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने 21 वर्ष (1893-1914) बिताए और वहाँ भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। वहीं उन्होंने सत्याग्रह की अनूठी पद्धति विकसित की।
दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी का संघर्ष (1893-1914)
| वर्ष | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 1893 | पीटरमारित्ज़बर्ग स्टेशन पर प्रथम श्रेणी डिब्बे से बाहर फेंके गए | नस्लीय भेदभाव का पहला अनुभव; संघर्ष की प्रेरणा |
| 1894 | नेटाल इंडियन कांग्रेस (NIC) की स्थापना | भारतीयों के अधिकारों के लिए पहला संगठन |
| 1906 | ट्रांसवाल में एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट के विरुद्ध पहला सत्याग्रह | सत्याग्रह का पहला प्रयोग |
| 1910 | टॉल्स्टॉय फार्म की स्थापना | आश्रम जीवन और सामूहिक प्रतिरोध का केंद्र |
भारत आगमन के बाद (1915-1916)
भारत आने के बाद गांधीजी ने पहले एक वर्ष देश भ्रमण किया। उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें सलाह दी:
"पहले भारत को जानो, उसके लोगों को समझो, उनकी समस्याओं को महसूस करो, फिर राजनीति में उतरो।" — गोपाल कृष्ण गोखले, गांधीजी को सलाह
गांधीजी ने 1916 में अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की।
- गांधीजी का जन्म: 2 अक्टूबर 1869, पोरबंदर (गुजरात)
- भारत आगमन: जनवरी 1915
- दक्षिण अफ्रीका में समय: 1893-1914 (21 वर्ष)
- साबरमती आश्रम: 1916, अहमदाबाद
- राजनीतिक गुरु: गोपाल कृष्ण गोखले
3. सत्याग्रह: विचार और प्रारंभिक प्रयोग (1916-1918)
सत्याग्रह (Satyagraha) = सत्य (Truth) + आग्रह (Insistence) = "सत्य का आग्रह"। यह सत्य और अहिंसा पर आधारित प्रतिरोध की विधि है जिसमें शारीरिक बल का प्रयोग नहीं किया जाता।
सत्याग्रह के मूल सिद्धांत
- सत्य (Truth): सत्य ही ईश्वर है; सत्य की अंततः विजय होती है
- अहिंसा (Non-violence): किसी भी प्राणी को कष्ट न देना - मन, वचन और कर्म से
- आत्मशुद्धि: अपने भीतर के दोषों को दूर करना
- स्वावलंबन: स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग, खादी पहनना
- निर्भयता: सत्य के लिए किसी भी कष्ट को सहने की तैयारी
गांधीजी के प्रारंभिक सत्याग्रह (1916-1918)
| वर्ष | स्थान | मुद्दा | परिणाम |
|---|---|---|---|
| 1916 | चंपारण (बिहार) | तिनकठिया प्रथा (नील की खेती) - किसानों को 3/20 भाग पर नील उगाने के लिए मजबूर किया जाता था | तिनकठिया प्रथा समाप्त; गांधीजी को "महात्मा" उपाधि |
| 1917 | खेड़ा (गुजरात) | फसल खराब होने पर भी कर वसूली | ग़रीब किसानों को कर में छूट |
| 1918 | अहमदाबाद | मिल मज़दूरों के वेतन | 35% वेतन वृद्धि |
असहयोग आंदोलन के कारण
- रॉलेट एक्ट 1919: नागरिक स्वतंत्रता का हनन
- जलियाँवाला बाग हत्याकांड: अमानवीय दमन
- खिलाफत का मुद्दा: मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस
- आर्थिक शोषण: युद्ध के बाद बढ़ती महँगाई
असहयोग आंदोलन का कार्यक्रम
| प्रथम चरण (त्याग/बहिष्कार) | द्वितीय चरण (रचनात्मक कार्य) |
|---|---|
| सरकारी उपाधियाँ और पदवियाँ लौटाना | राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना |
| सरकारी स्कूल-कॉलेजों का बहिष्कार | पंचायती अदालतों की स्थापना |
| सरकारी अदालतों का बहिष्कार | स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग |
| विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार | खादी का प्रचार-प्रसार; चरखा कातना |
| विधान परिषदों के चुनावों का बहिष्कार | हिंदू-मुस्लिम एकता को मज़बूत करना |
| शराब की दुकानों पर धरना | अस्पृश्यता का अंत करना |
- असहयोग = सहयोग न करना (Negative approach)
- लक्ष्य: "एक वर्ष में स्वराज" (गांधीजी का वादा)
- कलकत्ता अधिवेशन: सितंबर 1920 (प्रस्ताव स्वीकार)
- नागपुर अधिवेशन: दिसंबर 1920 (कार्यक्रम अंतिम)
8. चौरी-चौरा कांड और आंदोलन वापसी (1922)
5 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के चौरी-चौरा गाँव में एक दुखद घटना घटी। स्वयंसेवकों के जुलूस पर पुलिस ने गोलियाँ चलाईं। इससे भड़की भीड़ ने थाने में आग लगा दी जिसमें 22 पुलिसकर्मी जलकर मर गए।
गांधीजी की प्रतिक्रिया
गांधीजी ने 12 फरवरी 1922 को बारदोली में असहयोग आंदोलन वापस लेने की घोषणा कर दी।
"हिंसा के साथ स्वराज नहीं चाहिए। एक गाँव की हिंसा पूरे आंदोलन को कलंकित कर देती है।" — महात्मा गांधी, चौरी-चौरा के बाद
गांधीजी की गिरफ्तारी
10 मार्च 1922 को गांधीजी को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उन्हें 6 वर्ष की सज़ा सुनाई गई। बीमारी के कारण फरवरी 1924 में रिहा।
9. सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-1934)
सविनय अवज्ञा आंदोलन = "अन्यायपूर्ण कानूनों को जानबूझकर तोड़ना"। यह असहयोग से एक कदम आगे था।
असहयोग और सविनय अवज्ञा में अंतर
| पक्ष | असहयोग (1920-22) | सविनय अवज्ञा (1930-34) |
|---|---|---|
| अर्थ | सरकार को सहयोग न देना | अन्यायपूर्ण कानूनों को तोड़ना |
| माँग | स्वराज (Self-rule) | पूर्ण स्वराज (Complete Independence) |
| प्रतीक | खादी, चरखा | नमक |
| उदाहरण | स्कूल छोड़ना | नमक कानून तोड़ना |
पूर्ण स्वराज की घोषणा (लाहौर अधिवेशन, दिसंबर 1929)
दिसंबर 1929 में लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में दो ऐतिहासिक निर्णय:
- पूर्ण स्वराज को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया
- 26 जनवरी 1930 को प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय
26 जनवरी 1930 को प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। इसी कारण 1950 में संविधान को 26 जनवरी को लागू किया गया और इसे गणतंत्र दिवस घोषित किया गया।
10. दांडी मार्च / नमक सत्याग्रह (1930)
दांडी मार्च भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे प्रसिद्ध घटना है। गांधीजी ने नमक कानून तोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की।
नमक कानून क्यों चुना गया?
- नमक हर व्यक्ति की ज़रूरत है - अमीर हो या ग़रीब
- नमक पर सरकारी एकाधिकार था
- नमक पर भारी कर - ग़रीबों पर अन्याय
- यह मुद्दा धर्म, जाति, वर्ग से परे था
गांधीजी का वायसराय को पत्र (2 मार्च 1930)
"प्रिय मित्र, मैं जानबूझकर किसी भी जीवित प्राणी को कष्ट नहीं दे सकता। मैं नमक कानून तोड़ूँगा क्योंकि यह सबसे अन्यायपूर्ण कानून है।" — महात्मा गांधी, वायसराय इरविन को पत्र (2 मार्च 1930)
दांडी मार्च - महत्वपूर्ण तथ्य
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| प्रारंभ | 12 मार्च 1930, साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) |
| समाप्ति | 6 अप्रैल 1930, दांडी समुद्र तट (गुजरात) |
| कुल दूरी | 385 किमी (240 मील) |
| कुल दिन | 24 दिन |
| प्रतिदिन चलना | 16-19 किमी |
| गांधीजी की आयु | 61 वर्ष |
| प्रारंभिक सहयात्री | 78 स्वयंसेवक |
| धार्मिक विविधता | हिंदू, 2 मुसलमान, 1 ईसाई, 2 हरिजन |
| नमक बनाया | 6 अप्रैल 1930, सुबह 8:30 बजे |
मार्च की पूर्व संध्या पर गांधीजी का भाषण (11 मार्च 1930)
"संभवतः यह आपसे मेरा अंतिम भाषण होगा। साबरमती की पवित्र भूमि पर यह मेरा अंतिम संबोधन है। कल प्रातः हम यात्रा प्रारंभ करेंगे। हम लौटेंगे तभी जब स्वराज प्राप्त कर लेंगे।" — महात्मा गांधी, साबरमती आश्रम (11 मार्च 1930)
दांडी पहुँचने पर (6 अप्रैल 1930)
गांधीजी ने समुद्र तट पर नमक उठाकर नमक कानून तोड़ा। सरोजिनी नायडू ने उद्घोष किया: "जय हो, मुक्तिदाता!" (Hail, Deliverer!)
"इसके साथ, मैं ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला रहा हूँ।" — महात्मा गांधी, नमक कानून तोड़ते हुए
आंदोलन का प्रसार
- गांधीजी की गिरफ्तारी: 4-5 मई 1930 की मध्यरात्रि
- देश भर में 60,000+ लोग गिरफ्तार
- धरासना नमक कारखाने पर छापा: 21 मई 1930
- टाइम मैगज़ीन ने गांधीजी को 1930 का "Man of the Year" चुना
गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931)
- सभी राजनीतिक बंदी रिहा
- समुद्र तट पर नमक बनाने की अनुमति
- गांधीजी दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में भाग लेंगे
- दांडी मार्च: 12 मार्च - 6 अप्रैल 1930 (24 दिन, 385 किमी, 78 सहयात्री)
- गांधी-इरविन समझौता: 5 मार्च 1931
11. भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम और सबसे शक्तिशाली जन-आंदोलन था। 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान (अब अगस्त क्रांति मैदान) में कांग्रेस ने यह प्रस्ताव पारित किया।
भारत छोड़ो आंदोलन के कारण
- क्रिप्स मिशन की असफलता (मार्च 1942)
- द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों की बिना सहमति के भागीदारी
- जापानी सेना का भारत की सीमाओं तक पहुँचना
- युद्ध के कारण आर्थिक संकट और महँगाई
"करो या मरो" (Do or Die)
"हम या तो भारत को आज़ाद करेंगे या आज़ादी की कोशिश में मर जाएँगे। हम अपनी गुलामी का स्थायित्व देखने के लिए जीवित नहीं रहेंगे।" — महात्मा गांधी, 8 अगस्त 1942
प्रमुख घटनाएँ
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 8 अगस्त 1942 | भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित; "करो या मरो" का नारा |
| 9 अगस्त 1942 | गांधीजी सहित सभी प्रमुख नेता गिरफ्तार |
| 1942-43 | समानांतर सरकारें स्थापित (बलिया, सतारा, तामलुक) |
| 1944 | गांधीजी रिहा (बीमारी के कारण) |
भूमिगत नेता
प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, अरुणा आसफ अली ने भूमिगत रहकर आंदोलन का नेतृत्व किया।
- भारत छोड़ो प्रस्ताव: 8 अगस्त 1942
- स्थान: ग्वालिया टैंक मैदान, मुंबई
- नारा: "करो या मरो" (Do or Die)
- समानांतर सरकार: बलिया (यूपी), सतारा (महाराष्ट्र), तामलुक (बंगाल)
12. विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी
किसान आंदोलन
| क्षेत्र | नेता | मुद्दे |
|---|---|---|
| अवध (यूपी) | बाबा रामचंद्र | भारी लगान, बेगार, तालुकदारों का अत्याचार |
| आंध्र (गुडेम पहाड़ियाँ) | अल्लूरी सीताराम राजू | वन कानूनों का विरोध, आदिवासी अधिकार |
आदिवासी आंदोलन
अल्लूरी सीताराम राजू ने आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में आदिवासियों को संगठित किया। उन्होंने गांधीजी को महान माना और अहिंसा में विश्वास किया, लेकिन गुरिल्ला युद्ध का रास्ता अपनाया। 1924 में अंग्रेज़ों द्वारा मारे गए।
महिलाओं की भागीदारी
- सरोजिनी नायडू: दांडी मार्च में शामिल; "भारत की कोकिला"
- कस्तूरबा गांधी: गांधीजी की पत्नी; आंदोलनों में सक्रिय
- कमला नेहरू: जवाहरलाल नेहरू की पत्नी
- अरुणा आसफ अली: भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिगत नेता
दलित और पिछड़े वर्ग
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। 1932 में पूना पैक्ट के तहत गांधीजी और अंबेडकर के बीच समझौता हुआ जिसमें दलितों को आरक्षित सीटें दी गईं।
13. 🏜️ राजस्थान विशेष: स्वतंत्रता संग्राम
1857 का विद्रोह राजस्थान में
राजस्थान में 1857 के विद्रोह का प्रथम केंद्र नसीराबाद (अजमेर) था जहाँ 28 मई 1857 को विद्रोह हुआ - मेरठ के 18 दिन बाद।
| स्थान | तिथि | विशेष |
|---|---|---|
| नसीराबाद (अजमेर) | 28 मई 1857 | राजस्थान में प्रथम विद्रोह |
| देवली (टोंक) | जून 1857 | 15वीं नेटिव इन्फैंट्री का विद्रोह |
| एरिनपुरा (पाली) | अगस्त 1857 | ठाकुर कुशाल सिंह ने बिथोला में अंग्रेज़ों को हराया |
| कोटा | अक्टूबर 1857 | मेजर बर्टन और दो पुत्रों की हत्या |
बिजोलिया किसान आंदोलन (1897-1941)
बिजोलिया किसान आंदोलन भारत का सबसे लंबा अहिंसक किसान आंदोलन था जो 44 वर्षों तक चला। यह मेवाड़ रियासत के बिजोलिया जागीर (वर्तमान भीलवाड़ा ज़िला) में हुआ।
84 प्रकार के कर
बिजोलिया के किसानों पर 84 प्रकार के अत्याचारी कर लगे थे:
- लाग: विभिन्न अवसरों पर वसूला जाने वाला कर
- बाग: बागों पर कर
- बेगार: मुफ्त श्रम
- चवरी (₹5): बेटी की शादी पर कर
- तलवार बंधाई: उत्तराधिकार कर
आंदोलन के तीन चरण
| चरण | काल | नेता | विशेषताएँ |
|---|---|---|---|
| प्रथम | 1897-1915 | साधु सीताराम दास, फतेह करण चारण | स्थानीय नेतृत्व; 1897 में नानजी और ठाकरी पटेल ने महाराणा से मिलने का असफल प्रयास |
| द्वितीय | 1916-1923 | विजय सिंह पथिक | संगठित आंदोलन; 1916 में बिजोलिया किसान पंचायत का गठन; राष्ट्रीय ध्यान; तिलक का समर्थन |
| तृतीय | 1923-1941 | माणिक्यलाल वर्मा | अंतिम समझौता; मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना |
- 1913: 15,000 किसानों ने "कर नहीं देंगे" अभियान चलाया; खेत खाली छोड़े
- बाल गंगाधर तिलक ने महाराणा फतेह सिंह को पत्र लिखकर किसानों का समर्थन किया
- गांधीजी ने महादेव देसाई को आंदोलन का अध्ययन करने भेजा
राजस्थान के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी
प्रजामंडल आंदोलन
| रियासत | प्रजामंडल | स्थापना | संस्थापक |
|---|---|---|---|
| जयपुर | जयपुर प्रजामंडल | 1931 | कपूरचंद पाटनी |
| मेवाड़ | मेवाड़ प्रजामंडल | 1938 | माणिक्यलाल वर्मा |
| मारवाड़ | मारवाड़ प्रजामंडल | 1934 | जयनारायण व्यास |
| बीकानेर | बीकानेर प्रजामंडल | 1936 | वैद्य मघाराम |
- बिजोलिया आंदोलन: भारत का सबसे लंबा अहिंसक किसान आंदोलन (44 वर्ष)
- नसीराबाद: राजस्थान में 1857 विद्रोह का प्रथम केंद्र (28 मई)
- विजय सिंह पथिक: "राष्ट्रीय पथिक", गांधीजी से पहले सत्याग्रह का प्रयोग
- सागरमल गोपा: जेल में जलाकर मारे गए (4 अप्रैल 1946)
- 84 कर: बिजोलिया के किसानों पर लगे करों की संख्या
14. महत्वपूर्ण तिथियाँ (1915-1947)
15. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) - बोर्ड परीक्षा 2025
RBSE विशेष प्रश्न
16. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)
प्रश्न 1: असहयोग आंदोलन के कारण और कार्यक्रम का वर्णन करें।
उत्तर के मुख्य बिंदु: रॉलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग, खिलाफत मुद्दा → कार्यक्रम: उपाधियाँ लौटाना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्कूल-कॉलेज छोड़ना, खादी अपनाना → चौरी-चौरा कांड के कारण वापसी
प्रश्न 2: सविनय अवज्ञा आंदोलन और असहयोग आंदोलन में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर के मुख्य बिंदु: असहयोग = सरकार से सहयोग न करना; सविनय अवज्ञा = कानून तोड़ना → माँग: स्वराज vs पूर्ण स्वराज → उदाहरण: स्कूल छोड़ना vs नमक कानून तोड़ना
प्रश्न 3: दांडी मार्च का ऐतिहासिक महत्व बताइए।
उत्तर के मुख्य बिंदु: 12 मार्च से 6 अप्रैल 1930 → 385 किमी, 78 सहयात्री → नमक कानून = सबके लिए मुद्दा → अंतर्राष्ट्रीय ध्यान → 60,000+ गिरफ्तारियाँ → गांधी-इरविन समझौता
प्रश्न 4: जलियाँवाला बाग हत्याकांड के कारण और परिणाम लिखिए।
उत्तर के मुख्य बिंदु: रॉलेट एक्ट का विरोध, बैसाखी का दिन → 1,650 गोलियाँ, 379+ मृत → टैगोर ने नाइटहुड लौटाई → असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि → उधम सिंह का प्रतिशोध
प्रश्न 5 (RBSE): बिजोलिया किसान आंदोलन के तीन चरणों का वर्णन करें।
उत्तर के मुख्य बिंदु: प्रथम (1897-1915): साधु सीताराम दास, स्थानीय → द्वितीय (1916-1923): विजय सिंह पथिक, संगठित → तृतीय (1923-1941): माणिक्यलाल वर्मा, सफलता → 84 कर, 44 वर्ष, भारत का सबसे लंबा अहिंसक किसान आंदोलन
संदर्भ स्रोत
- NCERT History Textbook - Class 10 "India and the Contemporary World - II"
- RBSE History Textbook - Class 10
- Gandhi Heritage Portal - gandhiheritageportal.org
- National Gandhi Museum - gandhimuseum.org
- The Collected Works of Mahatma Gandhi (CWMG)
- Rajasthan Government Foundation - foundation.rajasthan.gov.in
- Kim Wagner - "Amritsar 1919: An Empire of Fear" (Yale University Press)


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