संसाधन एवं विकास
कक्षा 10 • भूगोल • अध्याय 1
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विषय सूची
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परिचय
हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है और जिसे बनाने के लिए तकनीक उपलब्ध है, एक संसाधन है। हमारे पर्यावरण में उपलब्ध अनेक वस्तुएं आज भी मानव जाति की आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त नहीं हो सकती हैं क्योंकि हमारे पास उपयुक्त तकनीक नहीं है। ऐसी वस्तुओं को तटस्थ सामग्री कहा जाता है।
उदाहरण: दो शताब्दी पहले तक लोहा केवल एक चट्टान था, जब तक लोगों को गलाने की तकनीक नहीं मिली। तब यह एक महत्वपूर्ण संसाधन बन गया।
हमारे पर्यावरण में उपस्थित प्रत्येक वस्तु जो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है और जिसे बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, संसाधन कहलाती है। जब तक मानव की आवश्यकताएं, प्रौद्योगिकी एवं संस्थागत व्यवस्था समुचित रूप में उपलब्ध न हों, वह वस्तु संसाधन नहीं बन सकती।
संसाधन का अर्थ एवं परिभाषा
संसाधन पर्यावरण में उपलब्ध ऐसी सामग्री है जिसे प्रौद्योगिकी की सहायता से उपयोग किया जा सकता है और जो आर्थिक रूप से संभव एवं सांस्कृतिक रूप से मान्य है। संसाधन प्रकृति की देन हैं जिनका उपयोग मानव अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करता है। मानव की आवश्यकताएं असीमित हैं और संसाधन सीमित, इसलिए संसाधनों का नियोजित उपयोग आवश्यक है।
संसाधनों की विशेषताएं
- उपयोगिता: प्रत्येक संसाधन उपयोगी होता है और मानव की किसी न किसी आवश्यकता की पूर्ति करता है।
- मूल्य: संसाधन का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक मूल्य होता है।
- तकनीकी ज्ञान: संसाधनों का उपयोग करने के लिए तकनीकी ज्ञान आवश्यक है।
- समय और स्थान: संसाधनों का मूल्य समय और स्थान के अनुसार बदलता रहता है।
- विकासशीलता: मानव की आवश्यकताओं और तकनीकी विकास के साथ संसाधनों की संख्या बढ़ती जाती है।
ध्यान दें: मानव स्वयं सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है। मानव ही अपनी बुद्धि, कौशल और तकनीक से प्रकृति की वस्तुओं को संसाधनों में परिवर्तित करता है।
संसाधनों का वर्गीकरण
संसाधनों को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है। संसाधनों का वर्गीकरण उनकी उत्पत्ति, समाप्यता, स्वामित्व और विकास के स्तर के आधार पर किया जाता है।
1. उत्पत्ति के आधार पर
उत्पत्ति के आधार पर संसाधनों को दो भागों में बांटा गया है:
| संसाधन प्रकार | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|
| जैव संसाधन (Biotic Resources) |
जीवमंडल से प्राप्त संसाधन जो जैविक पदार्थों से बने हों और जिनमें जीवन हो | वन, वन्य जीव, मछली, पशुधन, मनुष्य, वनस्पति |
| अजैव संसाधन (Abiotic Resources) |
निर्जीव वस्तुओं से बने संसाधन | चट्टानें, धातुएं, खनिज, मिट्टी, जल, वायु |
2. समाप्यता के आधार पर
समाप्यता या नवीकरण के आधार पर संसाधनों को दो प्रकारों में विभाजित किया गया है:
| संसाधन प्रकार | विवरण |
|---|---|
| (क) नवीकरणीय संसाधन (Renewable Resources) |
वे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा नवीकृत या पुनः उत्पन्न किया जा सकता है। उदाहरण: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल, वन, वन्यजीव विशेषता: ये संसाधन निरंतर उपलब्ध रहते हैं लेकिन इनका अनियंत्रित उपयोग इनके नवीकरण को प्रभावित कर सकता है। |
| (ख) अनवीकरणीय संसाधन (Non-Renewable Resources) |
वे संसाधन जिनके बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं। इनके भंडार सीमित हैं और एक बार समाप्त होने पर पुनः प्राप्त नहीं किए जा सकते। उदाहरण: खनिज, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, धातु अयस्क विशेषता: इनके निर्माण में हजारों से लाखों वर्ष लगते हैं। |
3. स्वामित्व के आधार पर
स्वामित्व के आधार पर संसाधनों को चार भागों में बांटा गया है:
- (क) व्यक्तिगत संसाधन (Individual Resources)
- निजी व्यक्तियों के स्वामित्व वाले संसाधन। उदाहरण: घर, भूमि, वृक्षारोपण, चरागाह, तालाब, कुएं आदि।
- (ख) सामुदायिक संसाधन (Community Owned Resources)
- किसी समुदाय के सभी सदस्यों द्वारा उपयोग किए जाने वाले संसाधन। उदाहरण: सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल, खेल के मैदान, सामुदायिक भवन, चरागाह, श्मशान भूमि आदि।
- (ग) राष्ट्रीय संसाधन (National Resources)
- देश की राजनीतिक सीमा के अंतर्गत सभी संसाधन (तटीय क्षेत्र से 12 समुद्री मील तक का सागरीय क्षेत्र)। राष्ट्र को इन पर पूर्ण अधिकार है परंतु व्यक्तिगत उपयोग के लिए सरकार की अनुमति आवश्यक है। उदाहरण: सड़कें, नहरें, रेलमार्ग, राजमार्ग आदि।
- (घ) अंतर्राष्ट्रीय संसाधन (International Resources)
- तटीय सीमा से 200 किलोमीटर दूर खुले सागरीय क्षेत्र के संसाधन जिन पर किसी भी देश का अधिकार नहीं है। इनका उपयोग अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति से किया जाता है।
4. विकास के स्तर के आधार पर
विकास के स्तर के अनुसार संसाधनों को निम्न भागों में बांटा गया है:
- संभावी संसाधन (Potential Resources): ऐसे संसाधन जो किसी प्रदेश में विद्यमान हैं परंतु इनका उपयोग नहीं किया गया है। उदाहरण: राजस्थान और गुजरात में पवन और सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं लेकिन उनका विकास पर्याप्त रूप से नहीं हुआ है।
- विकसित संसाधन (Developed Resources): ऐसे संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है और उनकी गुणवत्ता तथा मात्रा निर्धारित की जा चुकी है। इनका उपयोग वर्तमान में किया जा रहा है। इनका विकास प्रौद्योगिकी और संभाव्यता स्तर पर निर्भर करता है।
- भंडार (Stock): पर्यावरण में उपलब्ध ऐसी सामग्री जो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती है परंतु उपयुक्त तकनीक के अभाव में उसे उपयोग में नहीं लाया जा सकता। उदाहरण: जल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन ऊर्जा के संभावित स्रोत हैं लेकिन उपयुक्त तकनीक के अभाव में इनका उपयोग संभव नहीं है।
- संचित कोष (Reserves): भंडार का वह भाग जिसे प्रचलित तकनीक की सहायता से प्रयोग में लाया जा सकता है परंतु इसका उपयोग अभी आरंभ नहीं हुआ है। इसे भावी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संचित रखा जाता है। उदाहरण: जल विद्युत या बांधों में जल, वन संपदा आदि।
महत्वपूर्ण तथ्य: संसाधनों का उचित उपयोग और संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है। अनियंत्रित दोहन से संसाधनों की कमी हो सकती है।
संसाधनों का विकास
संसाधन विकास का अर्थ संसाधनों का नियोजन, प्रबंधन और सतत उपयोग है। विकास की प्रक्रिया में मानव ही सबसे महत्वपूर्ण घटक है। मानव ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया है, जिससे अनेक पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हुई हैं।
संसाधन विकास की आवश्यकता
संसाधनों के अनियंत्रित दोहन से निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न हुई हैं:
- संसाधनों का अत्यधिक उपयोग से कुछ स्थानों पर संसाधनों की कमी हो गई है।
- संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से प्रदूषण, भूमि निम्नीकरण, मरुस्थलीकरण जैसी पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न हुई हैं।
- समाज के कुछ वर्गों द्वारा संसाधनों के संचयन से समाज के अन्य वर्गों में संसाधनों की कमी हो गई है।
- संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से वैश्विक पारिस्थितिकीय संकट उत्पन्न हुआ है जैसे भूमंडलीय तापन, ओजोन परत अवक्षय, पर्यावरण प्रदूषण आदि।
सतत पोषणीय विकास
सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development) वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं से समझौता किए बिना करता है। इसका उद्देश्य संसाधनों का संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग है।
रियो डी जेनेरियो पृथ्वी सम्मेलन, 1992: 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन (UNCED) में एजेंडा 21 को अपनाया गया। इसमें सतत पोषणीय विकास को लागू करने के लिए वैश्विक स्तर पर कदम उठाने का आह्वान किया गया।
एजेंडा 21
एजेंडा 21 एक घोषणा पत्र है जिस पर 1992 में रियो डी जेनेरियो (ब्राजील) में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन में हस्ताक्षर किए गए। इसका उद्देश्य वैश्विक सतत विकास प्राप्त करना है। यह 21वीं सद```html
एजेंडा 21 एक घोषणा पत्र है जिस पर 1992 में रियो डी जेनेरियो (ब्राजील) में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन में हस्ताक्षर किए गए। इसका उद्देश्य वैश्विक सतत विकास प्राप्त करना है। यह 21वीं सदी में संधारणीय विकास के लिए एक कार्य योजना है।
संसाधन नियोजन
संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें संसाधनों की पहचान, उनका सर्वेक्षण, गुणवत्ता और मात्रा का निर्धारण तथा उनके उपयोग की रणनीति बनाई जाती है। भारत जैसे विशाल देश में जहां संसाधनों की उपलब्धता में क्षेत्रीय विभिन्नता है, संसाधन नियोजन अत्यंत आवश्यक है।
संसाधन नियोजन की आवश्यकता
भारत में संसाधनों के वितरण में भारी असमानता है। कुछ क्षेत्रों में संसाधनों की प्रचुरता है जबकि अन्य क्षेत्रों में इनकी कमी है। इसलिए संसाधन नियोजन आवश्यक है:
- राष्ट्रीय, प्रादेशिक, राज्य और स्थानीय स्तर पर संसाधनों का नियोजन आवश्यक है।
- संसाधनों की क्षेत्रीय असमानता को दूर करना।
- संसाधनों का समुचित एवं संधारणीय उपयोग सुनिश्चित करना।
- संसाधनों के अत्यधिक उपयोग और उनके ह्रास को रोकना।
संसाधन नियोजन के चरण
भारत में संसाधन नियोजन निम्नलिखित चरणों में किया जाता है:
- पहचान और सूचीकरण: देश के विभिन्न क्षेत्रों में संसाधनों की पहचान और सूचीकरण करना। इसके लिए क्षेत्रीय और भौगोलिक सर्वेक्षण, मानचित्रण और संसाधनों की गुणात्मक एवं मात्रात्मक अनुमान लगाना।
- संसाधन विकास योजना: संसाधन विकास की उपयुक्त तकनीक, कौशल और संस्थागत नियोजन तैयार करना।
- योजनाओं का क्रियान्वयन: राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ संसाधन विकास योजनाओं और नीतियों को लागू करना।
नोट: संसाधन नियोजन के लिए संस्थागत ढांचा भी आवश्यक है। संसाधनों के नियोजन में केवल उपलब्धता ही नहीं बल्कि संसाधनों का उपयोग करने की तकनीक और संस्थागत व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।
भारत में संसाधन नियोजन की समस्याएं
- संसाधनों के अनियंत्रित दोहन से पर्यावरणीय समस्याएं।
- कुछ व्यक्तियों के हाथों में संसाधनों का संकेंद्रण और समाज में विभाजन।
- संसाधनों की क्षेत्रीय असमानता।
- उपयुक्त तकनीक और संस्थागत ढांचे का अभाव।
भारत में भूमि संसाधन
भूमि एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। यह सभी प्रकार की मानवीय क्रियाओं का आधार है। भूमि ही हमारी बुनियादी आवश्यकताओं जैसे भोजन, वस्त्र, आश्रय आदि की पूर्ति करती है। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर है जो विश्व के भू-क्षेत्र का लगभग 2.4% है।
भूमि उपयोग प्रतिरूप
भारत में भूमि का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है। भूमि उपयोग को निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
| क्र.सं. | भूमि उपयोग की श्रेणी | विवरण |
|---|---|---|
| 1 | वन | भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 23.41% भाग |
| 2 | कृषि योग्य भूमि | लगभग 45.64% भाग कृषि कार्य के लिए |
| 3 | चरागाह एवं चारागाह | लगभग 3.73% भाग पशुओं के चरने के लिए |
| 4 | परती भूमि | कृषि के लिए छोड़ी गई भूमि |
| 5 | बंजर एवं कृषि अयोग्य भूमि | कृषि के लिए अनुपयुक्त भूमि |
| 6 | बाग एवं बगीचे | फल, फूल एवं सब्जी उत्पादन के लिए |
| 7 | बंजर भूमि | कृषि उत्पादन के अयोग्य भूमि |
| 8 | अन्य उपयोग | भवन, सड़क, उद्योग आदि के लिए |
महत्वपूर्ण तथ्य: भारत में विश्व की जनसंख्या का लगभग 16% निवास करती है जबकि भूमि क्षेत्र केवल 2.4% है। इससे भूमि संसाधन पर अत्यधिक दबाव है।
भूमि उपयोग में परिवर्तन
भारत में भूमि उपयोग प्रतिरूप में निरंतर परिवर्तन हो रहा है। जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण, शहरीकरण आदि के कारण कृषि योग्य भूमि में कमी आ रही है। वन क्षेत्र में कमी एक गंभीर समस्या है।
मृदा संसाधन
मृदा पृथ्वी की सबसे महत्वपूर्ण नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है। यह पौधों के विकास का माध्यम है और पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीवों को आश्रय प्रदान करती है। मृदा निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है। 1 सेंटीमीटर मोटी मृदा परत के निर्माण में सैकड़ों से हजारों वर्ष लग जाते हैं।
मृदा निर्माण
मृदा का निर्माण चट्टानों के अपक्षय और अपरदन से होता है। मृदा निर्माण में निम्नलिखित कारकों की भूमिका होती है:
- मातृ पदार्थ या जनक चट्टान: मृदा का रंग, गठन और खनिज संरचना
- जलवायु: तापमान, वर्षा आदि मृदा निर्माण की दर को प्रभावित करते हैं
- उच्चावच: भूमि की ढाल मृदा संचयन को प्रभावित करती है
- वनस्पति एवं जीवधारी: जैविक पदार्थ मृदा की उर्वरता बढ़ाते हैं
- समय: मृदा निर्माण में लंबा समय लगता है
भारत में मृदा के प्रकार
भारत में विभिन्न प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भारत की मिट्टियों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया है:
1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)
| विस्तार | भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 45.64% भाग। उत्तरी मैदान, नदी घाटियां, डेल्टा क्षेत्र |
| रंग | हल्के धूसर से राख धूसर |
| प्रकार | खादर (नई जलोढ़) और बांगर (पुरानी जलोढ़) |
| विशेषताएं | उपजाऊ, पोटाश, फास्फोरिक अम्ल और चूना युक्त, नाइट्रोजन और जैविक पदार्थ कम |
| फसलें | गेहूं, धान, गन्ना, दालें, तिलहन, कपास |
| क्षेत्र | पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल |
2. काली मिट्टी (Black Soil)
| अन्य नाम | रेगुर मिट्टी या कपासी मिट्टी |
| निर्माण | बेसाल्ट चट्टानों के अपक्षय से |
| रंग | गहरा काला से हल्का भूरा |
| विशेषताएं | चिकनी, जल धारण क्षमता अधिक, कैल्शियम, पोटाश, मैग्नीशियम युक्त, नाइट्रोजन और फास्फोरस कम |
| फसलें | कपास, गन्ना, तंबाकू, सूरजमुखी, मिर्च |
| क्षेत्र | महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु |
3. लाल और पीली मिट्टी (Red and Yellow Soil)
| निर्माण | क्रिस्टलीय और रूपांतरित चट्टानों के अपक्षय से |
| रंग | लाल रंग (आयरन की उपस्थिति), पीला रंग (जलयोजित रूप में) |
| विशेषताएं | रेतीली, बलुई दोमट, उर्वरता कम, अम्लीय, लौह युक्त |
| फसलें | मोटे अनाज, दालें, तिलहन, मूंगफली |
| क्षेत्र | तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल |
4. लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil)
| निर्माण | उच्च तापमान और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में गहन निक्षालन से |
| रंग | लाल रंग |
| विशेषताएं | अम्लीय, जैविक पदार्थ कम, लौह और एल्युमीनियम की प्रचुरता, उर्वरता कम |
| उपयोग | ईंट बनाने में उपयोगी | ```html
| फसलें | चाय, कॉफी, रबर, काजू, नारियल (उर्वरक के साथ) |
| क्षेत्र | केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, असम, ओडिशा |
5. शुष्क मिट्टी (Arid Soil)
| अन्य नाम | मरुस्थलीय मिट्टी |
| रंग | लाल से भूरा |
| विशेषताएं | रेतीली, लवणीय, क्षारीय, जल धारण क्षमता कम, जैविक पदार्थ कम |
| फसलें | सिंचाई से बाजरा, जौ, मक्का, दालें, तिलहन |
| क्षेत्र | राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात |
6. वनीय और पर्वतीय मिट्टी (Forest and Mountain Soil)
| निर्माण | पर्वतीय क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की चट्टानों से |
| विशेषताएं | परत गहराई अलग-अलग, ऊपरी ढाल पर उथली, घाटी तल में गहरी, जैविक पदार्थ युक्त |
| फसलें | चाय, कॉफी, मसाले, फल (उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में) |
| क्षेत्र | हिमालय क्षेत्र, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट |
7. दलदली मिट्टी (Peaty and Marshy Soil)
| निर्माण | अधिक आर्द्रता और जल जमाव वाले क्षेत्रों में कार्बनिक पदार्थों के जमाव से |
| रंग | काला |
| विशेषताएं | भारी मात्रा में कार्बनिक पदार्थ और जैविक अवशेष युक्त, जल जमाव के कारण अपर्याप्त वायु संचार |
| क्षेत्र | उत्तरी बिहार, उत्तराखंड, तटीय क्षेत्र (केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल) |
8. लवणीय मिट्टी (Saline Soil)
| अन्य नाम | रेह, कल्लर, ऊसर, राकर, थूर, कारी |
| निर्माण | शुष्क जलवायु और खराब जल निकास से लवणों का संचय |
| विशेषताएं | अधिक लवणीय और क्षारीय, सोडियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम युक्त, कृषि के लिए अनुपयुक्त |
| सुधार | जल निकास, सिंचाई, जिप्सम या अन्य रासायनिक उर्वरकों का उपयोग |
| क्षेत्र | पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र |
स्मरणीय तथ्य: भारत में सर्वाधिक क्षेत्र में जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है और यह सबसे उपजाऊ मिट्टी है। काली मिट्टी कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम है।
मृदा अपरदन एवं संरक्षण
मृदा अपरदन एक गंभीर समस्या है जिसमें मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत जल, वायु या अन्य कारकों द्वारा हटा दी जाती है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है लेकिन मानवीय क्रियाकलापों ने इसे तीव्र कर दिया है।
मृदा अपरदन के प्रकार
- 1. परत अपरदन (Sheet Erosion)
- पानी की पतली परत द्वारा मिट्टी की ऊपरी परत का समान रूप से कटाव। यह धीरे-धीरे होता है और आसानी से दिखाई नहीं देता।
- 2. अवनालिका अपरदन (Gully Erosion)
- तेज बहते जल द्वारा गहरी नालियों या खाइयों का निर्माण। ये नालिकाएं इतनी गहरी होती हैं कि सामान्य जुताई से भरी नहीं जा सकतीं। यह चंबल नदी घाटी में सामान्य है।
- 3. वायु अपरदन (Wind Erosion)
- तेज हवाओं द्वारा शुष्क और बालू भूमि से मिट्टी का उड़ना। यह राजस्थान और गुजरात के शुष्क क्षेत्रों में प्रमुख है।
- 4. नदी तट अपरदन (River Bank Erosion)
- नदियों द्वारा अपने तटों का कटाव। यह असम और बिहार में ब्रह्मपुत्र और गंगा नदी के किनारे गंभीर समस्या है।
- 5. सागरीय तट अपरदन (Coastal Erosion)
- समुद्री लहरों द्वारा तटीय क्षेत्रों का कटाव।
- 6. हिमानी अपरदन (Glacial Erosion)
- हिमनदों द्वारा मिट्टी और चट्टानों का कटाव। यह हिमालय क्षेत्र में होता है।
मृदा अपरदन के कारण
| कारण प्रकार | विवरण |
|---|---|
| प्राकृतिक कारण |
|
| मानवीय कारण |
|
चेतावनी: भारत में प्रतिवर्ष लगभग 5334 मिलियन टन मिट्टी अपरदन द्वारा नष्ट हो जाती है। यह एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या है।
मृदा संरक्षण के उपाय
मृदा अपरदन को रोकने और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
1. वनीकरण और वृक्षारोपण
वृक्ष और वनस्पति मिट्टी को जड़ों द्वारा बांधे रखते हैं और वर्षा की बूंदों के सीधे प्रभाव को कम करते हैं। वनीकरण मृदा संरक्षण का सबसे प्रभावी उपाय है।
2. समोच्च जुताई (Contour Ploughing)
ढालू भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानांतर जुताई करना। इससे जल का बहाव धीमा होता है और मिट्टी का कटाव कम होता है।
3. सोपान कृषि या सीढ़ीनुमा खेती (Terrace Farming)
पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर खेती करना। यह पश्चिमी और पूर्वी घाट, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में प्रचलित है।
4. पट्टी खेती (Strip Cropping)
बड़े खेतों को पट्टियों में बांटकर बारी-बारी से विभिन्न फसलों की खेती करना। एक पट्टी में घास या फलीदार फसलें और दूसरी में अन्य फसलें उगाई जाती हैं।
5. आश्रय पेटी (Shelter Belts)
वायु अपरदन को रोकने के लिए खेतों के चारों ओर वृक्षों की पंक्तियां लगाना। यह राजस्थान और गुजरात में प्रभावी है।
6. अवनालिका नियंत्रण (Gully Control)
अवनालिकाओं को रोकने के लिए उनमें पत्थर, मिट्टी और चूना भरना या बांध बनाना। चंबल घाटी में इसका प्रयोग किया जाता है।
7. पशुचारण नियंत्रण (Controlled Grazing)
अत्यधिक पशुचारण से मिट्टी ढीली हो जाती है। नियंत्रित चराई और चरागाह प्रबंधन आवश्यक है।
8. फसल चक्र (Crop Rotation)
एक ही खेत में विभिन्न फसलों को बारी-बारी से उगाना। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।
9. जैविक खेती (Organic Farming)
रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खाद का उपयोग करना। इससे मिट्टी की संरचना और उर्वरता में सुधार होता है।
10. बांध और तटबंध निर्माण
नदी के बहाव को नियंत्रित करने और बाढ़ को रोकने के लिए बांध और तटबंध बनाना।
महत्वपूर्ण: मृदा संरक्षण केवल सरकार का कार्य नहीं है। प्रत्येक नागरिक को मिट्टी के संरक्षण में योगदान देना चाहिए। यह हमारी भावी पीढ़ियों के लिए आवश्यक है।
निष्कर्ष
संसाधन हमारे विकास की नींव हैं। परंतु इनका अंधाधुंध दोहन पर्यावरणीय असंतुलन और संसाधनों की कमी उत्पन्न कर रहा है। सतत पोषणीय विकास ही एकमात्र विकल्प है। हमें संसाधनों का संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इनका लाभ उठा सकें।
भूमि और मृदा संसाधन कृषि प्रधान देश भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मृदा अपरदन एक गंभीर समस्या है जिसका समाधान संसाधन नियोजन, वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों और जन जागरूकता के माध्यम से संभव है।
अभ्यास प्रश्न
बहुविकल्पीय प्रश्न
- निम्नलिखित में से किस मिट्टी में स्वतः जुताई की क्षमता होती है?
(क) काली मिट्टी
(ख) लाल म```html - निम्नलिखित में से किस मिट्टी में स्वतः जुताई की क्षमता होती है?
(क) काली मिट्टी
(ख) लाल मिट्टी
(ग) जलोढ़ मिट्टी
(घ) लैटेराइट मिट्टी
उत्तर: (क) काली मिट्टी - भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का कितना प्रतिशत वन क्षेत्र है?
(क) 33%
(ख) 23.41%
(ग) 45%
(घ) 15%
उत्तर: (ख) 23.41% - निम्नलिखित में से कौन सा संसाधन नवीकरणीय है?
(क) कोयला
(ख) खनिज तेल
(ग) सौर ऊर्जा
(घ) प्राकृतिक गैस
उत्तर: (ग) सौर ऊर्जा - रियो डी जेनेरियो पृथ्वी सम्मेलन कब आयोजित हुआ था?
(क) 1990
(ख) 1992
(ग) 1995
(घ) 2000
उत्तर: (ख) 1992 - भारत में सबसे अधिक विस्तार किस मिट्टी का है?
(क) काली मिट्टी
(ख) लाल मिट्टी
(ग) जलोढ़ मिट्टी
(घ) लैटेराइट मिट्टी
उत्तर: (ग) जलोढ़ मिट्टी
लघु उत्तरीय प्रश्न
- संसाधन से आप क्या समझते हैं?
- संसाधनों के वर्गीकरण के विभिन्न आधार बताइए।
- सतत पोषणीय विकास क्या है?
- संसाधन नियोजन से क्या तात्पर्य है?
- भूमि निम्नीकरण के क्या कारण हैं?
- भारत में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की मिट्टियों के नाम बताइए।
- मृदा अपरदन क्या है? इसके प्रकार बताइए।
- मृदा संरक्षण के उपाय बताइए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
- संसाधनों के वर्गीकरण को उदाहरण सहित समझाइए।
- भारत में भूमि उपयोग प्रतिरूप की विवेचना कीजिए।
- भारत में पाई जाने वाली प्रमुख मिट्टियों का वर्णन कीजिए।
- मृदा अपरदन के कारणों एवं संरक्षण के उपायों की विस्तार से व्याख्या कीजिए।
- संसाधन नियोजन क्यों आवश्यक है? भारत में संसाधन नियोजन की समस्याओं पर चर्चा कीजिए।
महत्वपूर्ण तथ्य एवं आंकड़े
| विषय | तथ्य |
|---|---|
| भारत का कुल क्षेत्रफल | 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर (विश्व का 2.4%) |
| भारत की जनसंख्या | विश्व की जनसंख्या का लगभग 16% |
| वन क्षेत्र | कुल क्षेत्रफल का 23.41% |
| कृषि योग्य भूमि | कुल क्षेत्रफल का लगभग 45.64% |
| जलोढ़ मिट्टी का विस्तार | भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 45.64% |
| रियो पृथ्वी सम्मेलन | 1992, ब्राजील |
| 1 सेमी मृदा निर्माण | सैकड़ों से हजारों वर्ष |
| वार्षिक मृदा अपरदन | लगभग 5334 मिलियन टन |
मुख्य शब्दावली
- संसाधन (Resource)
- पर्यावरण में उपलब्ध वह सामग्री जो मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।
- सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development)
- वह विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति भावी पीढ़ी से समझौता किए बिना करता है।
- संसाधन नियोजन (Resource Planning)
- संसाधनों की पहचान, सर्वेक्षण और विकास की योजना तैयार करना।
- मृदा अपरदन (Soil Erosion)
- मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत का जल, वायु या अन्य कारकों द्वारा कटाव।
- एजेंडा 21 (Agenda 21)
- 1992 में रियो डी जेनेरियो में अपनाया गया घोषणा पत्र जो 21वीं सदी के सतत विकास का कार्यक्रम है।
- खादर (Khadar)
- नई जलोढ़ मिट्टी जो बाढ़ के मैदानों में पाई जाती है।
- बांगर (Bangar)
- पुरानी जलोढ़ मिट्टी जो बाढ़ क्षेत्र से ऊपर पाई जाती है।
- रेगुर (Regur)
- काली मिट्टी का दूसरा नाम।
- समोच्च जुताई (Contour Ploughing)
- ढालू भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानांतर जुताई करना।
- सोपान कृषि (Terrace Farming)
- पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर खेती करना।
संदर्भ एवं अध्ययन सामग्री
- NCERT भूगोल पाठ्यपुस्तक: समकालीन भारत - II, कक्षा 10
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
- भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI)
- राष्ट्रीय भू-भौतिकीय अनुसंधान संस्थान (NGRI)
- पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार
🌍 "हमें पृथ्वी अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं मिली है, बल्कि हमने इसे अपने बच्चों से उधार लिया है।"
- भारतीय कहावत
लेख की श्रेणियां: भूगोल | संसाधन प्रबंधन | कक्षा 10 | NCERT | भारतीय भूगोल
सम्बंधित विषय: जल संसाधन | वन एवं वन्य जीव संसाधन | खनिज संसाधन | ऊर्जा संसाधन | कृषि
अंतिम अद्यतन: दिसंबर 2025 | स्रोत: NCERT, भारत सरकार के आधिकारिक प्रकाशन


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