राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958 Rajasthan Civil Services (Classification, Control and Appeal) Rules, 1958
| राजस्थान CCA नियम, 1958 Rajasthan CCA Rules, 1958 | |
| पूर्ण नाम | राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958 |
|---|---|
| अंग्रेजी नाम | Rajasthan Civil Services (Classification, Control & Appeal) Rules, 1958 |
| संक्षिप्त नाम | CCA Rules 1958 / CCA नियम 1958 |
| प्रभावी तिथि | 07 मई 1959 |
| प्रवर्तन क्षेत्र | सम्पूर्ण राजस्थान राज्य |
| लागू | राजस्थान के समस्त सिविल सेवक (कतिपय अपवादों सहित) |
| कुल भाग | 8 भाग (Part I – VIII) |
| कुल नियम | 37 नियम (नियम 1 से 37) |
| मूल भाषा | हिन्दी एवं अंग्रेजी |
| सम्बन्धित अनुच्छेद | संविधान अनुच्छेद 309, 311 |
| प्रमुख विषय | वर्गीकरण, निलम्बन, शास्तियाँ, अनुशासनिक जांच, अपील, पुनरीक्षण |
राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958 — जिसे सामान्यतः CCA नियम 1958 या CCA Rules 1958 कहा जाता है — राजस्थान राज्य के सिविल सेवकों से सम्बन्धित अनुशासनिक कार्यवाही, शास्तियों (दण्ड), निलम्बन, अपील एवं पुनरीक्षण का मूलभूत विधिक ढाँचा है। ये नियम दिनांक 07 मई 1959 से प्रभावी हुए और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 309 के अन्तर्गत राज्यपाल द्वारा निर्मित किये गये थे। यह नियम RAS, RPSC, RSMSSB तथा अन्य राजस्थान सरकार की प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग है।
- भाग-1 : सामान्य (नियम 1–5)
- भाग-2 : वर्गीकरण (नियम 6–11)
- भाग-3 : नियुक्ति प्राधिकारी (नियम 12)
- भाग-4 : निलम्बन (नियम 13)
- भाग-5 : अनुशासन (नियम 14–20)
- भाग-6 : अपीलें (नियम 21–31)
- भाग-7 : पुनरीक्षण एवं पुनर्विलोकन (नियम 32–34)
- भाग-8 : प्रकीर्ण तथा अस्थायी (नियम 35–37)
- शास्ति तुलना तालिका
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भाग-1 : सामान्य Part I – General (Rules 1–5)
नियम 1 – संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
नियम 1. (क) इन नियमों का संक्षिप्त नाम "राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958" है।
(ख) ये तुरंत प्रवृत्त होंगे।
नियम 2 – निर्वचन (परिभाषाएँ)
नियम 2. जब तक संदर्भ द्वारा अन्यथा अपेक्षित न हो, इन नियमों में –
(क) "नियुक्ति अधिकारी" (Appointing Authority)
किसी सरकारी कर्मचारी के संबंध में "नियुक्ति अधिकारी" से निम्नलिखित में से जो भी उच्चतम प्राधिकारी हो, वह अभिप्रेत है –
(i) जिस सेवा का राजकीय कर्मचारी उस समय सदस्य है, उस सेवा या श्रेणी में नियुक्तियाँ करने में सक्षम प्राधिकारी; या
(ii) जिस पद को राजकीय कर्मचारी उस समय धारण करता है उस पर नियुक्तियाँ करने में सशक्त प्राधिकारी; या
(iii) जिस प्राधिकारी ने राजकीय कर्मचारी को उस सेवा, श्रेणी या पद पर नियुक्ति किया था; या
(iv) जहाँ राज्य कर्मचारी किसी अन्य सेवा का स्थायी सदस्य होते हुए या अधिष्ठायी रूप से कोई अन्य स्थायी पद धारण करते हुये निरंतर सरकार के नियोजन में रहा है — वहाँ वह प्राधिकारी जिसने उसे उस सेवा/श्रेणी/पद पर नियुक्त किया था।
[अधिसूचना सं. F.16(2)Apptts.(A)/60 III, दिनांक 2-6-60 तथा 24-8-60 द्वारा निविष्ट]
(ख) "आयोग" (Commission)
राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) अभिप्रेत है।
(ग) "अनुशासनिक प्राधिकारी" (Disciplinary Authority)
किसी सरकारी कर्मचारी पर शास्ति लगाने के संबंध में ऐसा प्राधिकारी जो इन नियमों के अधीन उस पर शास्ति लगाने के लिये सक्षम हो।
(घ) "राजपत्र" (Gazette)
राजस्थान राजपत्र अभिप्रेत है।
(ड) "सरकार" (Government)
राजस्थान सरकार अभिप्रेत है।
(च) "राजकीय कर्मचारी" (Government Servant)
वह व्यक्ति जो किसी सेवा का सदस्य है अथवा राजस्थान सरकार के अधीन कोई सिविल पद धारण किये हुए है। इसमें बाहरी सेवा में रत व्यक्ति, अस्थायी रूप से सौंपी गयी सेवा वाले, संविदा पर नियोजित, तथा पुनर्नियोजित सेवानिवृत्त कर्मचारी सम्मिलित हैं। किन्तु भारत संघ या अन्य राज्य सरकार से प्रतिनियुक्ति पर सेवारत व्यक्ति इसमें सम्मिलित नहीं हैं।
(छ) "विभागाध्यक्ष" (Head of Department)
वह प्राधिकारी जो अनुसूची 'क' में विनिर्दिष्ट है तथा अन्य कोई प्राधिकारी जो सरकार के आदेश से इस हेतु घोषित हो।
[अधि. सं. F.318)Karmik(A-III)/76 GSR 116, दिनांक 6-12-79 द्वारा प्रतिस्थापित]
(ज) "कार्यालयाध्यक्ष" (Head of Office)
सामान्य वित्तीय एवं लेखा नियमों के नियम 3 के अधीन विभागाध्यक्ष द्वारा इस रूप में घोषित अधिकारी।
[अधि. सं. F.3(3)Karmik(A-II)/79, GSR 46 दिनांक 16-8-1982 द्वारा प्रतिस्थापित]
(झ) "अनुसूची" (Schedule)
इन नियमों में संलग्न अनुसूची अभिप्रेत है।
(ञ) "सेवा" (Service)
राजस्थान राज्य की कोई सिविल सेवा अभिप्रेत है।
नियम 3 – नियमों का लागू होना
नियम 3(1). ये नियम निम्नांकित के सिवाय सभी राजकीय कर्मचारियों पर प्रभावी होंगे:
| क्रम | छूट प्राप्त श्रेणी |
|---|---|
| (क) | भारत सरकार या किन्हीं राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों से प्रतिनियुक्ति पर आये व्यक्ति |
| (ख) | अधिसूचित औद्योगिक संस्थानों के कर्मकार (औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत) |
| (ग) | राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश |
| (घ) | उच्च न्यायालय के अधिकारी और कर्मचारी (अनुच्छेद 229(2) के अधीन) |
| (ड) | RPSC के अध्यक्ष और सदस्य (अनुच्छेद 318 के अधीन) |
| (च) | जिनके लिये विशेष विधिक उपबंध किये गये हों |
| (छ) | आकस्मिक नियोजन में रत व्यक्ति |
| (ज) | एक महीने से कम नोटिस पर सेवामुक्त होने वाले व्यक्ति |
| (झ) | अखिल भारतीय सेवाओं (IAS, IPS, IFS) के सदस्य |
नियम 3(2). उपनियम (1) तथा अनुच्छेद 311 के उपबन्धों के अध्यधीन, सरकार आदेश द्वारा किसी सरकारी कर्मचारी या वर्ग को इन नियमों से अलग कर सकेगी।
नियम 3(3). संदेह उत्पन्न होने पर — (क) क्या ये नियम किसी व्यक्ति पर लागू होते हैं, या (ख) कोई व्यक्ति किस सेवा का सदस्य है — मामला सरकार के नियुक्ति विभाग को निर्दिष्ट किया जायेगा जिसका निर्णय अन्तिम होगा।
नियम 4 – करार द्वारा विशेष उपबंध
नियम 4. जहाँ किसी राजकीय कर्मचारी के संबंध में इन नियमों से असंगत विशेष उपबंध आवश्यक प्रतीत हो, तो नियुक्ति प्राधिकारी उस कर्मचारी के साथ करार (Agreement) द्वारा विशेष उपबंध कर सकेगा। ये नियम उस सीमा तक लागू नहीं होंगे जिस सीमा तक ऐसे उपबंध असंगत हों।
नियम 5 – अधिकारों एवं विशेषाधिकारों का संरक्षण
नियम 5. इन नियमों की कोई भी बात किसी सरकारी कर्मचारी को ऐसे अधिकार या विशेषाधिकार से वंचित नहीं करेगी जिसका वह हकदार है:
(क) उस समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन; या
(ख) इन नियमों के प्रारंभ के समय उस व्यक्ति और सरकार के बीच अस्तित्वयुक्त किसी करार की शर्तों द्वारा।
भाग-2 : वर्गीकरण Part II – Classification (Rules 6–11)
नियम 6 – सिविल सेवाओं का वर्गीकरण
नियम 6(1). सिविल सेवाओं का निम्नांकित रूप से वर्गीकरण किया जाएगा:
| क्रम | सेवा वर्ग | अनुसूची | नियुक्ति प्राधिकारी |
|---|---|---|---|
| (i) | राज्य सेवायें (State Services) | अनुसूची (1) | सरकार / सशक्त प्राधिकारी |
| (ii) | अधीनस्थ सेवायें (Subordinate Services) | अनुसूची (2) | विभागाध्यक्ष / सशक्त प्राधिकारी |
| (iii) | लिपिक वर्गीय सेवायें (Ministerial Services) | अनुसूची (3) | विभागाध्यक्ष / सशक्त प्राधिकारी |
| (iv) | चतुर्थ श्रेणी सेवायें (Class IV Services) | अनुसूची (4) | कार्यालयाध्यक्ष |
नियम 6(2). यदि किसी सेवा में एक से अधिक ग्रेड हों, तो विभिन्न ग्रेडों को विभिन्न वर्गों में सम्मिलित किया जा सकेगा।
नियम 7 से 10 – विभिन्न सेवा वर्गों की संरचना
नियम 7 (राज्य सेवा) – अनुसूची (1) की सेवाओं के सदस्य, अधिष्ठायी हैसियत से कार्य करने वाले, तथा तदर्थ नियुक्त व्यक्ति।
नियम 8 (अधीनस्थ सेवा) – अनुसूची (2) की सेवाओं के सदस्य, अधिष्ठायी कार्यकर्ता, तथा तदर्थ नियुक्त व्यक्ति।
नियम 9 (लिपिक वर्गीय सेवा) – अनुसूची (3) की सेवाओं के सदस्य, अधिष्ठायी कार्यकर्ता, तथा तदर्थ नियुक्त व्यक्ति।
नियम 10 (चतुर्थ श्रेणी सेवा) – अनुसूची (4) की सेवाओं के सदस्य, अधिष्ठायी कार्यकर्ता, तथा तदर्थ नियुक्त व्यक्ति।
नियम 11 – पदों का वर्गीकरण
नियम 11. राज्य सरकार किसी ऐसे पद को जो किसी सेवा में सम्मिलित नहीं है और जिसे कोई ऐसा व्यक्ति धारण कर रहा हो जो नियम 7–10 की किसी सेवा का सदस्य नहीं है, आदेश द्वारा वर्गीकृत कर सकेगी।
[अधि. सं. F.3(8)Karmik(A-III)/76, GSR 136 दिनांक 6-12-1979 द्वारा निविष्ट]
भाग-3 : नियुक्ति प्राधिकारी Part III – Appointing Authority (Rule 12)
नियम 12 – नियुक्ति प्राधिकारी
| उपनियम | सेवा वर्ग | नियुक्ति प्राधिकारी |
|---|---|---|
| 12(1) | राज्य सेवा | सरकार या सरकार द्वारा सशक्त प्राधिकारी |
| 12(2) | अधीनस्थ एवं लिपिक वर्गीय सेवा | विभागाध्यक्ष या सरकार की स्वीकृति से सशक्त प्राधिकारी |
| 12(3) | चतुर्थ श्रेणी सेवा | कार्यालयाध्यक्ष (विभागाध्यक्ष के नियमों/अनुदेशों के अध्यधीन) |
भाग-4 : निलम्बन Part IV – Suspension (Rule 13)
नियम 13 – निलम्बन
नियम 13(1). नियुक्ति प्राधिकारी या उसके उच्चतर अधिकारी, या सरकार द्वारा सशक्त कोई अन्य प्राधिकारी किसी सरकारी कर्मचारी को निलम्बित कर सकेगा —
(क) जहाँ उसके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही करने का विचार है या लम्बित है; या
(ख) जहाँ उसके किसी फौजदारी अपराध के सम्बन्ध में अन्वेषण या विचारण हो रहा हो।
[विज्ञप्ति सं. F.3(9)नियुक्ति(क)/62 दिनांक 11-9-1962]
नियम 13(2). स्वतः निलम्बन (Deemed Suspension) – कोई राज्य कर्मचारी जो किसी फौजदारी अभियोजन या अन्यथा 48 घण्टों से अधिक हिरासत में रखा गया हो, हिरासत की तिथि से स्वतः निलम्बित माना जायेगा और आगामी आदेश तक निलम्बन में रहेगा।
नियम 13(3). जब बर्खास्तगी, सेवा से हटाया जाना या अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश अपील/पुनरीक्षण में निरस्त होकर मामला पुनः जांच हेतु लौटाया जाये — तो कर्मचारी का निलम्बन मूल आदेश की तिथि से पुनः जारी माना जायेगा।
नियम 13(4). जब उपरोक्त शास्ति न्यायालय द्वारा खारिज/शून्य घोषित हो और अनुशासनिक प्राधिकारी पुनः जांच तय करे — तो कर्मचारी मूल आदेश की तिथि से स्वतः निलम्बित माना जायेगा।
नियम 13(5). निलम्बन आदेश किसी भी समय — आदेश देने वाले प्राधिकारी या उसके उच्चतर प्राधिकारी द्वारा — निरस्त किया जा सकेगा।
भाग-5 : अनुशासन Part V – Discipline (Rules 14–20)
नियम 14 – शास्तियों (दण्ड) के प्रकार
नियम 14. निम्नांकित शास्तियाँ समुचित और पर्याप्त कारणों से किसी सरकारी कर्मचारी पर लगाई जा सकेंगी:
| खण्ड | शास्ति (Penalty) | श्रेणी | जांच प्रक्रिया |
|---|---|---|---|
| (i) | परिनिन्दा (Censure) | लघु शास्ति (Minor Penalty) नियम 17 | नियम 17 की सरल प्रक्रिया (नोटिस → अभ्यावेदन → आदेश) |
| (ii) | वेतन वृद्धि या पदोन्नति रोकना (Withholding of Increment/Promotion) | ||
| (iii) | आर्थिक हानि की वसूली (Recovery from Pay) | ||
| (iv) | अवनत करना / पेंशन में कमी (Reduction in Rank/Pension) | वृहद शास्ति (Major Penalty) नियम 16 | नियम 16 की विस्तृत जांच (आरोप-पत्र → लिखित बचाव → जांच प्राधिकारी → साक्ष्य → रिपोर्ट → आदेश) |
| (v) | अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) | ||
| (vi) | सेवा से हटाया जाना (Removal from Service) — पुनर्नियोजन योग्य | ||
| (vii) | सेवा से पदच्युति (Dismissal from Service) — सामान्यतः पुनर्नियोजन अयोग्य |
नियम 15 – अनुशासनिक प्राधिकारी
| सेवा वर्ग | अनुशासनिक प्राधिकारी |
|---|---|
| राज्य सेवा | सरकार या सरकार द्वारा सशक्त प्राधिकारी |
| अधीनस्थ एवं लिपिक वर्गीय सेवा | विभागाध्यक्ष या सरकार के अनुमोदन से सशक्त प्राधिकारी |
| चतुर्थ श्रेणी सेवा | कार्यालयाध्यक्ष |
नियम 15(2). जिन सेवाओं में नियुक्ति शक्ति किसी प्राधिकारी को नहीं सौंपी गयी हो — परिनिन्दा तथा वेतन वृद्धि रोकने के अतिरिक्त शास्ति लगाने से पहले लोक सेवा आयोग से परामर्श अनिवार्य है।
नियम 16 – वृहद दंड के लिए जांच की प्रक्रिया
नियम 16(1). नियम 14 के खण्ड (iv) से (vii) की कोई शास्ति तब तक नहीं लगाई जाएगी जब तक विहित प्रक्रिया से जांच न कर ली जाए।
चरण 1: अनुशासनिक प्राधिकारी निश्चित आरोप तैयार करेगा → लिखित रूप में कर्मचारी को ससूचित करेगा।
चरण 2: कर्मचारी लिखित बचाव (Written Statement of Defence) प्रस्तुत करेगा।
चरण 3: कर्मचारी को सरकारी अभिलेखों के निरीक्षण का अधिकार होगा।
चरण 4: अस्वीकृत आरोपों पर जांच प्राधिकारी/जांच बोर्ड नियुक्त किया जाएगा।
चरण 5: दोषी अभिवचन (Plea of Guilty) पर अभिलेख तैयार होगा।
चरण 6: साक्षियों/दस्तावेजों की सूची → मुख्य परीक्षा → प्रतिपरीक्षा → पुनः परीक्षा।
चरण 7: जांच प्राधिकारी प्रत्येक आरोप पर निष्कर्ष सहित रिपोर्ट तैयार करेगा।
चरण 8: रिपोर्ट की प्रति कर्मचारी को → अभ्यावेदन का अवसर (15 दिन)।
चरण 9: अनुशासनिक प्राधिकारी अन्तिम आदेश → आयोग से परामर्श (जहाँ आवश्यक)।
नियम 16(2). आरोप, अभिकथनों के विवरण सहित लिखित रूप में संसूचित किये जायेंगे। कर्मचारी से लिखित कथन माँगा जायेगा जिसमें — आरोप स्वीकृति/अस्वीकृति, स्पष्टीकरण, बचाव, तथा व्यक्तिगत सुनवाई की इच्छा दर्शित होगी।
नियम 16(3). कर्मचारी को बचाव की तैयारी हेतु सरकारी अभिलेखों का निरीक्षण एवं उद्धरण लेने की अनुज्ञा दी जायेगी। लोकहित के विरुद्ध होने पर कारण अभिलिखित कर अनुज्ञा अस्वीकार की जा सकेगी।
नियम 16(4). अनुशासनिक प्राधिकारी स्वयं जांच कर सकेगा या "जांच बोर्ड" या "जांच प्राधिकारी" नियुक्त कर सकेगा।
नियम 16(4-क). दोषी अभिवचन (Plea of Guilty) होने पर जांच प्राधिकारी उसे अभिलिखित करेगा, स्वयं तथा कर्मचारी हस्ताक्षर करेंगे, और दोषी पाये जाने का निष्कर्ष भेजेगा।
नियम 16(5). कर्मचारी अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित किसी दूसरे राज्य कर्मचारी (या सेवानिवृत्त कर्मचारी) की सहायता ले सकेगा। विधि व्यवसायी की नियुक्ति तभी हो सकेगी जब अभियोजन पक्ष का प्रतिनिधि भी विधि व्यवसायी हो, या अनुशासनिक प्राधिकारी अनुज्ञा दे।
नियम 16(6)(क). साक्ष्य प्रक्रिया – उपस्थापक अधिकारी 10 दिन में साक्षियों/दस्तावेजों की सूची → कर्मचारी को प्रति → कर्मचारी 10 दिन में अपनी अपेक्षित अभिलेख सूची → दोनों पक्षों के अभिलेख मंगवाना → स्वीकार/अस्वीकार → मुख्य परीक्षा → प्रतिपरीक्षा → पुनः परीक्षा → बचाव साक्षी → तर्क प्रस्तुति।
नियम 16(6)(क-1). शपथ पत्र द्वारा औपचारिक साक्ष्य स्वीकार्य है। व्यक्तिगत परीक्षा आवश्यक समझी जाये तो व्यवस्था की जायेगी।
नियम 16(6)(ख). जांच प्राधिकारी आंशिक रूप से सुने मामलों में साक्षियों को पुनः बुला सकेगा।
नियम 16(6)(ग). अतिरिक्त अभिलेखों की खोज/प्रस्तुतीकरण हेतु 10+10 दिन का नोटिस।
नियम 16(6)(घ). कर्मचारी बिना पर्याप्त कारण अनुपस्थित रहे तो जांच प्राधिकारी एकपक्षीय (Ex-parte) कार्यवाही कर सकेगा।
नियम 16(7). जांच की समाप्ति पर — प्रत्येक आरोप पर निष्कर्ष कारणों सहित अभिलिखित → जांच रिपोर्ट तैयार। भिन्न आरोप स्थापित होने पर भी निष्कर्ष अभिलिखित हो सकेंगे, यदि कर्मचारी ने तथ्य स्वीकार किये हों या बचाव का अवसर मिला हो।
नियम 16(8). जांच अभिलेख में सम्मिलित होगा: (i) आरोप-पत्र व अभिकथन, (ii) बचाव का कथन, (iii) मौखिक साक्ष्य, (iv) अभिलेखीय साक्ष्य, (v) प्राधिकारियों के आदेश, (vi) निष्कर्ष सहित रिपोर्ट।
नियम 16(9). अनुशासनिक प्राधिकारी (जब स्वयं जांच प्राधिकारी न हो) अभिलेख पर विचार कर प्रत्येक आरोप पर निष्कर्ष अभिलिखित करेगा। आवश्यकता हो तो पुनः जांच या नये सिरे से जांच का आदेश दे सकेगा।
नियम 16(10). जांच रिपोर्ट की प्रति कर्मचारी को अग्रेषित → 15 दिन में अभ्यावेदन का अवसर।
नियम 16(10-क). निष्कर्षों से असहमत होने पर अनुशासनिक प्राधिकारी कारण अभिलिखित कर स्वयं के निष्कर्ष देगा और कर्मचारी को अभ्यावेदन हेतु भेजेगा।
नियम 16(11). लघु शास्ति का निर्णय – यदि खण्ड (i) से (iii) की शास्ति उपयुक्त हो — आदेश करेगा। आयोग परामर्श जहाँ आवश्यक।
नियम 16(11-क). वृहद शास्ति का निर्णय – यदि खण्ड (iv) से (vii) की शास्ति उपयुक्त हो — आदेश करेगा। प्रस्तावित शास्ति पर अलग अभ्यावेदन आवश्यक नहीं। आयोग परामर्श जहाँ आवश्यक।
नियम 16(12). आदेश कर्मचारी को संसूचित किये जायेंगे। जांच रिपोर्ट, निष्कर्ष, असहमति कारण, तथा आयोग की सलाह की प्रति दी जायेगी।
नियम 17 – लघु शास्तियाँ लगाने की प्रक्रिया
नियम 17(1). नियम 14 के खण्ड (i) से (iii) की शास्ति तब तक नहीं लगाई जाएगी जब तक:
(क) कर्मचारी को कार्यवाही का प्रस्ताव एवं अभिकथन लिखित में सूचित न हो और अभ्यावेदन का अवसर न मिले।
(कक) जहाँ वेतन वृद्धि 3 वर्ष से अधिक या संचयी प्रभाव से रोकी जानी हो, या पेंशन पर प्रतिकूल प्रभाव हो — वहाँ नियम 16 के अनुसार जांच अनिवार्य है।
(ख) अभ्यावेदन एवं जांच अभिलेख (यदि कोई हो) पर अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा विचार हो।
(ग) कर्मचारी को इच्छानुसार व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया जाये।
(घ) जहाँ आवश्यक, आयोग से परामर्श लिया जाये।
नियम 18 – संयुक्त परीक्षण (Joint Inquiry)
नियम 18(1). जहाँ दो या अधिक कर्मचारी सम्बन्धित हों — सरकार या सक्षम प्राधिकारी सबके विरुद्ध एक साथ अनुशासनिक कार्यवाही का आदेश दे सकेगा।
नियम 18(2). आदेश में — (i) अनुशासनिक अधिकारी का पद, (ii) लगाई जा सकने वाली शास्तियाँ, (iii) नियम 16 या 17 की प्रक्रिया — का निर्देश होगा।
नियम 18-क – यौन उत्पीड़न मामलों में विशेष प्रक्रिया
नियम 18-क. राजस्थान सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1971 के नियम 25-कक के अन्तर्गत यौन उत्पीड़न की शिकायत पर — विभाग/कार्यालय में स्थापित शिकायत समिति को जांच प्राधिकारी तथा उसकी रिपोर्ट को जांच रिपोर्ट माना जायेगा।
नियम 19 – कतिपय प्रकरणों में विशेष प्रक्रिया
नियम 19. नियम 16, 17 तथा 18 के होते हुए भी, निम्न परिस्थितियों में अनुशासनिक प्राधिकारी सीधे आदेश दे सकेगा:
(i) कर्मचारी किसी फौजदारी आरोप पर सिद्धदोष हो;
(ii) अनुशासनिक प्राधिकारी सन्तुष्ट हो कि विहित प्रक्रिया का अनुसरण युक्तियुक्त रूप से साध्य नहीं है; या
(iii) राज्यपाल सन्तुष्ट हों कि राज्य की सुरक्षा के हित में प्रक्रिया का अनुसरण समीचीन नहीं है।
नियम 19-क – उधार दिये गये अधिकारियों के सम्बन्ध में उपबंध
नियम 19-क. जहाँ कर्मचारी की सेवाएं केन्द्रीय सरकार, पब्लिक सेक्टर कम्पनी, या स्वशासी निकाय (उधारग्रहीता प्राधिकारी) को उधार दी गई हों:
• उधारग्रहीता को निलम्बन तथा अनुशासनिक कार्यवाही की शक्ति होगी।
• लघु शास्ति — उधारदायी प्राधिकारी से परामर्श कर लगा सकेगा। मतभेद पर सेवाएं लौटाई जायेंगी।
• वृहद शास्ति — सेवाएं पुनः उधारदायी प्राधिकारी के अधीन कर दी जायेंगी; वही अन्तिम आदेश देगा।
नियम 19-ख – भिन्न विभाग में पदस्थापित कर्मचारी
नियम 19-ख. जहाँ अधीनस्थ/लिपिक वर्गीय/चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, नियुक्ति प्राधिकारी के विभाग से भिन्न विभाग (उधार लेने वाला विभाग) में पदस्थापित हो — उधार लेने वाले विभाग के विभागाध्यक्ष को निलम्बन तथा अनुशासनिक शक्तियाँ होंगी। प्रक्रिया नियम 19-क के समान होगी।
नियम 20 – आदेशों की संसूचना
नियम 20. अधीनस्थ, लिपिक वर्गीय और चतुर्थ सेवा में सरकार से भिन्न अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश अपील प्राधिकारी को संसूचित किये जायेंगे।
भाग-6 : अपीलें Part VI – Appeals (Rules 21–31)
नियम 21 – सरकार के आदेश अनपीलनीय
नियम 21. नियम 14 में विनिर्दिष्ट शास्तियों में से कोई शास्ति लगाने वाले सरकार द्वारा दिये गये आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी।
नियम 22 – निलम्बन आदेश के विरुद्ध अपील
नियम 22. कर्मचारी निलम्बन आदेश के विरुद्ध, आदेश देने वाले प्राधिकारी के ठीक उच्चतर प्राधिकारी को अपील कर सकेगा।
नियम 23 – शास्ति आदेश के विरुद्ध अपील
| सेवा वर्ग | अपील प्राधिकारी |
|---|---|
| अधीनस्थ सेवा | प्रशासनिक विभाग में सरकार को |
| लिपिक वर्गीय सेवा | प्रशासनिक विभाग में सरकार को |
| चतुर्थ श्रेणी सेवा | विभागाध्यक्ष को |
| राज्य सेवा (सरकार के अतिरिक्त प्राधिकारी का आदेश) | सरकार को |
| न्यायिक सेवा (पदच्युति/सेवामुक्ति के अतिरिक्त) | मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामजद तीन न्यायाधीशों की समिति |
| नियम 18 – संयुक्त कार्यवाही | अनुशासनिक प्राधिकारी के ठीक उच्चतर प्राधिकारी |
नियम 23(4). जहाँ अपील सरकार को हो — लोक सेवा आयोग से परामर्श के बाद विनिश्चय किया जायेगा।
नियम 24 – आदेश की प्रमाणित प्रति
नियम 24. अपील योग्य आदेश पारित करने वाला प्राधिकारी, युक्तियुक्त समय में आदेश की प्रमाणित प्रति निःशुल्क देगा।
नियम 25 – अपील की परिसीमा (Limitation)
नियम 25. अपील, आदेश की प्रति प्राप्त होने से 3 माह (तीन महीने) के भीतर प्रस्तुत होनी चाहिए।
नियम 26 – अपील का रूप एवं अन्तर्वस्तु
नियम 26(1). प्रत्येक व्यक्ति पृथक रूप से और अपने नाम से अपील करेगा।
नियम 26(2). अपील आदेश देने वाले प्राधिकारी को भेजी जायेगी। इसमें समस्त सारवान विवरण तथा तर्क अन्तर्विष्ट होंगे, अनादरपूर्ण भाषा नहीं होगी, और अपील स्वयं में पूर्ण होगी।
नियम 27 – अपील प्रस्तुतीकरण
अपील उस प्राधिकारी को प्रस्तुत की जायेगी जिसके आदेश के विरुद्ध अपील हो। अपील की प्रति सीधे अपील प्राधिकारी को भी प्रस्तुत की जा सकेगी।
नियम 28 – अपीलों को रोके रखना
नियम 28(1). अपील रोकी जा सकेगी यदि: (i) अनपीलनीय आदेश के विरुद्ध हो, (ii) नियम 26 का पालन न हो, (iii) समय सीमा में न हो और विलम्ब का कारण न बताया हो, (iv) पूर्व निश्चित अपील की पुनरावृत्ति हो।
नियम 28(2). रोकी गई अपील का कारण सहित सूचना दी जाएगी।
नियम 28(3). रोकी गई अपीलों की सूची प्रत्येक तिमाही के प्रारम्भ में अपील प्राधिकारी को प्रस्तुत की जाएगी।
नियम 29 – अपीलों का पारेषण
नियम 29(1). जिसके विरुद्ध अपील हो, वह प्राधिकारी अविलम्ब — स्वयं की टिप्पणी और अभिलेखों सहित — अपील अपील प्राधिकारी को पारेषित करेगा।
नियम 29(2). अपील प्राधिकारी रोकी गई अपील भी अपने पास पारेषित करने का निर्देश दे सकेगा।
नियम 30 – अपीलों पर विचार
नियम 30(1). निलम्बन अपील – अपील प्राधिकारी विचार करेगा कि नियम 13 के प्रकाश में निलम्बन न्यायसंगत है या नहीं, और आदेश को पुष्ट या निरस्त करेगा।
नियम 30(2). शास्ति अपील – अपील प्राधिकारी विचार करेगा:
(क) क्या विहित प्रक्रिया का अनुपालन हुआ; यदि नहीं, तो क्या संवैधानिक उपबन्धों का अतिक्रमण हुआ;
(ख) क्या तथ्य सिद्ध किये गये;
(ग) क्या सिद्ध तथ्यों पर आदेश का पर्याप्त औचित्य है;
(घ) क्या शास्ति अत्याधिक, पर्याप्त या अपर्याप्त है।
कर्मचारी को व्यक्तिगत सुनवाई तथा आयोग परामर्श (जहाँ आवश्यक) के बाद अपील प्राधिकारी — (i) शास्ति अपास्त, कम, पुष्ट या बढ़ा सकेगा; या (ii) मामला विप्रेषित कर सकेगा।
नियम 31 – अपील आदेशों का कार्यान्वयन
नियम 31. अपील प्राधिकारी के आदेशों को मूल प्राधिकारी क्रियान्वित करेगा।
भाग-7 : पुनरीक्षण एवं पुनर्विलोकन Part VII – Revision & Review (Rules 32–34)
नियम 32 – पुनरीक्षण (Revision)
नियम 32. अपील प्राधिकारी — यदि अपील न की गई हो — स्वेच्छा से या अन्यथा अधीनस्थ प्राधिकारी की अनुशासनिक कार्यवाही का अभिलेख मंगवा सकेगा, परीक्षण कर सकेगा, तथा आयोग परामर्श (जहाँ आवश्यक) के बाद:
(क) आदेश को पुष्ट, संशोधित या निरस्त कर सकेगा;
(ख) शास्ति लगा, अपास्त, कम, पुष्ट या वर्धित कर सकेगा;
(ग) मामला विप्रेषित कर सकेगा;
(घ) उपयुक्त आदेश पारित कर सकेगा।
नियम 33 – राज्य सेवाओं का पुनर्विलोकन (Review)
नियम 33. सरकार स्वेच्छा से या अन्यथा — राज्य सेवा के किसी सदस्य पर शास्ति लगाने वाले आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगी और आयोग परामर्श के बाद:
(क) आदेश की पुष्टि, उपान्तरण या अपास्त कर सकेगी;
(ख) शास्ति अधिरोपित, अपास्त, कम या वर्धित कर सकेगी।
नियम 34 – राज्यपाल की पुनर्विलोकन शक्तियाँ
नियम 34. राज्यपाल स्वेच्छा से या अन्यथा, इन नियमों या निरसित नियमों के अधीन दिये गये किसी आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेंगे:
(क) आदेश पुष्ट, उपान्तरित या अपास्त कर सकेंगे;
(ख) शास्ति लगा, अपास्त, कम या पुष्ट कर सकेंगे;
(ग) मामला विप्रेषित कर सकेंगे;
(घ) अन्य उपयुक्त आदेश पारित कर सकेंगे।
भाग-8 : प्रकीर्ण तथा अस्थायी Part VIII – Miscellaneous & Transitory (Rules 35–37)
नियम 35 – निरसन तथा व्यावृत्ति
नियम 35(1). पूर्व के CCA नियम तथा उनके अधीन अधिसूचनाएं/आदेश, जहाँ तक ये नियम लागू हों, निरस्त किये जाते हैं।
नियम 35(2). इन नियमों से पहले प्रोद्भूत अपील के अधिकार से कोई वंचित नहीं होगा।
नियम 35(3). इन नियमों के प्रारम्भ से पूर्व लम्बित अपीलों पर इन नियमों के अनुसार विचार किया जायेगा।
नियम 36 – संदेहों का निवारण
नियम 36. कार्यालयाध्यक्ष कौन है, कोई प्राधिकारी अधीनस्थ है या उच्चतर — किसी भी संदेह पर मामला सरकार के नियुक्ति विभाग को निर्दिष्ट किया जायेगा, जिसका विनिश्चय अन्तिम होगा।
नियम 37 – कतिपय अधिकारियों हेतु विशेष उपबंध
नियम 37. जो अधिकारी एकीकरण योजनाओं में किसी पद पर नियुक्त नहीं हुआ — वह राजस्थान में सम्मिलित उसी इकाई के उस पर लागू नियमों से शासित होता रहेगा जिसमें उसने अन्तिम नियुक्ति धारण की हो।
शास्ति तुलना तालिका Penalty Comparison Table
| पैरामीटर | लघु शास्ति (Minor Penalty) | वृहद शास्ति (Major Penalty) |
|---|---|---|
| खण्ड | नियम 14 (i) से (iii) | नियम 14 (iv) से (vii) |
| शास्तियाँ | परिनिन्दा, वेतन वृद्धि/पदोन्नति रोकना, आर्थिक वसूली | अवनत करना, अनिवार्य सेवानिवृत्ति, सेवा से हटाना, पदच्युति |
| प्रक्रिया | नियम 17 (सरल) | नियम 16 (विस्तृत जांच) |
| जांच | सामान्यतः आवश्यक नहीं (3 वर्ष+ वेतन वृद्धि रोकने पर आवश्यक) | अनिवार्य (नियम 19 के अपवाद सहित) |
| विधि व्यवसायी | सामान्यतः नहीं | शर्तों के अधीन |
| अपील | नियम 23 के अनुसार | नियम 23 के अनुसार |
| पुनर्नियोजन | प्रभावित नहीं | हटाना — योग्य; पदच्युति — सामान्यतः अयोग्य |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: CCA Rules 1958 क्या है और कब से प्रभावी है?
राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958 राजस्थान के सिविल सेवकों के लिए अनुशासनिक कार्यवाही, शास्तियाँ, निलम्बन, अपील एवं पुनरीक्षण का मूलभूत विधिक ढाँचा है। ये नियम 07 मई 1959 से प्रभावी हैं तथा संविधान के अनुच्छेद 309 के अन्तर्गत निर्मित किये गये।
प्रश्न 2: CCA नियम 1958 में कुल कितने भाग और नियम हैं?
इसमें 8 भाग (Part I–VIII) एवं 37 नियम हैं: भाग-1 सामान्य (नियम 1–5), भाग-2 वर्गीकरण (6–11), भाग-3 नियुक्ति (12), भाग-4 निलम्बन (13), भाग-5 अनुशासन (14–20), भाग-6 अपील (21–31), भाग-7 पुनरीक्षण (32–34), भाग-8 प्रकीर्ण (35–37)।
प्रश्न 3: नियम 14 में कितनी शास्तियाँ हैं? लघु और वृहद में क्या अन्तर है?
कुल 7 शास्तियाँ हैं। लघु शास्ति (i–iii): परिनिन्दा, वेतन वृद्धि रोकना, आर्थिक वसूली। वृहद शास्ति (iv–vii): अवनत करना, अनिवार्य सेवानिवृत्ति, सेवा से हटाना, पदच्युति। लघु शास्ति में सरल प्रक्रिया (नियम 17) तथा वृहद शास्ति में विस्तृत जांच (नियम 16) अपेक्षित है।
प्रश्न 4: स्वतः निलम्बन (Deemed Suspension) कब होता है?
नियम 13(2) के अनुसार, कोई कर्मचारी 48 घण्टों से अधिक हिरासत में रखा जाये तो हिरासत की तिथि से स्वतः निलम्बित माना जाता है। नियम 13(3) व 13(4) में अपील/न्यायालय द्वारा शास्ति निरस्ति के बाद पुनः जांच की स्थिति में भी स्वतः निलम्बन का प्रावधान है।
प्रश्न 5: ये नियम किन पर लागू नहीं होते?
नियम 3(1) के अनुसार — प्रतिनियुक्ति पर आये व्यक्ति, औद्योगिक कर्मकार, उच्च न्यायालय न्यायाधीश/कर्मचारी, RPSC अध्यक्ष/सदस्य, विशेष विधिक उपबंध वाले, आकस्मिक नियोजित, एक माह से कम नोटिस वाले, तथा AIS सदस्य।
प्रश्न 6: अपील की समय सीमा क्या है?
नियम 25 — आदेश की प्रति प्राप्ति से 3 माह। विलम्ब पर भी पर्याप्त कारण होने पर अपील प्राधिकारी ग्रहण कर सकता है।
प्रश्न 7: पुनरीक्षण (Revision) और पुनर्विलोकन (Review) में क्या अन्तर है?
पुनरीक्षण (नियम 32): अपील प्राधिकारी द्वारा, आदेश की तिथि से 6 माह में। पुनर्विलोकन (नियम 33–34): सरकार/राज्यपाल द्वारा; राज्यपाल की समय सीमा 3 वर्ष।
प्रश्न 8: नियम 19 में बिना जांच शास्ति कब लगाई जा सकती है?
तीन परिस्थितियों में: (i) फौजदारी आरोप पर सिद्धदोष होने पर, (ii) अनुशासनिक प्राधिकारी सन्तुष्ट हो कि प्रक्रिया का अनुसरण असाध्य है, (iii) राज्यपाल राज्य सुरक्षा के हित में प्रक्रिया अनुचित मानें।
प्रश्न 9: "सेवा से हटाना" और "पदच्युति" में क्या अन्तर है?
सेवा से हटाना (Removal) – नियम 14(vi): भावी नियोजन के लिए निरर्हता नहीं, पुनः नियुक्ति सम्भव। पदच्युति (Dismissal) – नियम 14(vii): सामान्यतः भावी नियोजन के लिए निरर्हता होगी।
प्रश्न 10: CCA Rules 1958 किस परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है?
यह RAS/RTS (राजस्थान प्रशासनिक सेवा), RPSC प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी भर्ती, RSMSSB, राजस्थान पटवारी, LDC/UDC, विभागीय परीक्षा, तथा राजस्थान न्यायिक सेवा परीक्षा सहित समस्त राजस्थान सरकार की प्रतियोगी एवं विभागीय परीक्षाओं के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है।


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