सरकारी खरीद में मेक इन इंडिया प्राथमिकता – राजस्थान परिपत्र 2026

📅 बुधवार, 17 जून 2026 📖 3-5 min read
सरकारी खरीद में मेक इन इंडिया प्राथमिकता – राजस्थान परिपत्र 2026 | सरकारी सर्विस प्रेप
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📋 परिपत्र विवरण — मेक इन इंडिया खरीद प्राथमिकता
जारीकर्ता विभागवित्त (वित्तीय नियम) विभाग, राजस्थान सरकार
क्रमांकप.2(3)वित्त/वित्तीय नियम–एसपीएफसी/2025
दिनांक15 जून 2026
विषयसरकारी विभागों में "मेक इन इंडिया" उत्पादों को प्राथमिकता
लागूसमस्त उपापन प्राधिकारी, राजस्थान
छोटी खरीद सीमा₹5.00 लाख से कम के उपापन में यह परिपत्र लागू नहीं
हस्ताक्षरकर्तामहेन्द्र मोहन, संयुक्त शासन सचिव
आधारPublic Procurement (Preference to Make in India) Order, 2017

सरकारी खरीद में "मेक इन इंडिया" प्राथमिकता — राजस्थान परिपत्र 2026

1. प्रस्तावना एवं पृष्ठभूमि

राजस्थान सरकार के वित्त (वित्तीय नियम) विभाग ने दिनांक 15 जून 2026 को एक महत्त्वपूर्ण परिपत्र जारी किया है। इसका उद्देश्य राजकीय विभागों द्वारा की जाने वाली समस्त सरकारी खरीद (Public Procurement) में "मेक इन इंडिया" के अंतर्गत देश में निर्मित वस्तुओं एवं सेवाओं को प्राथमिकता देना है।

यह परिपत्र वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी Public Procurement (Preference to Make in India) Order, 2017 तथा उसके समय-समय पर जारी संशोधनों को राजस्थान में लागू करता है।

📌 बजट घोषणा 2026-27 से जुड़ाव: इस परिपत्र का आधार बजट घोषणा वर्ष 2026-27 का पैरा संख्या 136 है, जो "Ease of Doing Business" की दृष्टि से सरकारी खरीद में पारदर्शिता, प्रतियोगिता एवं आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कार्य करने का निर्देश देता है।

राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता अधिनियम, 2012 की धारा 6(2) तथा राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता नियम, 2013 के नियम-33 के प्रावधानों के अंतर्गत घरेलू उद्योगों की अभिवृद्धि एवं केन्द्र/राज्य सरकार की सामाजिक व आर्थिक नीतियों को बढ़ावा देने हेतु यह अनिवार्य खरीद (Mandatory Procurement) नीति लागू की जाती है।

2. मूल पाठ (Original Circular Text)

राजस्थान सरकार, वित्त (वित्तीय नियम) विभाग
क्रमांक: प.2(3)वित्त/वित्तीय नियम–एसपीएफसी/2025     जयपुर, दिनांक: 15/06/2026

परिपत्र

विषय: राजकीय विभागों में किये जाने वाले माल एवं सेवाओं के उपापनों में "मेक–इन इंडिया" उत्पादों को प्राथमिकता प्रदान करने के संदर्भ में।

सभी उपापन प्राधिकारियों का ध्यान वित्त विभाग की समसंख्यक अधिसूचना संख्या प.2(3)वित्त/वित्तीय नियम–एसपीएफसी/2025 दिनांक 12.06.2026 की ओर आकर्षित किया जाता है, जिसके द्वारा बजट घोषणा वर्ष 2026-27 के पैरा संख्या 136 "Ease of Doing Business" की दृष्टि से सरकारी खरीद में पारदर्शिता एवं प्रतियोगिता सुनिश्चित किये जाने के साथ ही राजकोष के जनहित में सर्वोत्तम उपयोग के लिये आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कार्य करते हुए राज्य में किये जाने वाले Public Procurement में देश में निर्मित Goods & Services को प्राथमिकता दी जायेगी, के संबंध में सुसंगत प्रावधान किये गये हैं।

यह उल्लेखनीय है कि राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता अधिनियम, 2012 की धारा 6(2) सपठित राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता नियम, 2013 के नियम-33 के प्रावधानों में घरेलू उद्योगों की अभिवृद्धि, केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार की सामाजिक एवं आर्थिक नीतियों को बढ़ावा देने की दृष्टि से किसी भी बोली लगाने वालों के प्रवर्ग को उपापन की विषयवस्तु के आज्ञापक उपापन (Mandatory Procurement) के लिये उपबंधित करने का प्रावधान किया गया है।

उक्त प्रावधानों के अन्तर्गत विभाग द्वारा अधिसूचना जारी कर, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा Public Procurement (Preference to Make in India) Order, 2017 एवं समय-समय पर जारी संशोधनों को समाहित करते हुए निम्न दिशा-निर्देश एतद्द्वारा जारी किये जाते हैं—

1. पूर्व अधिसूचना की निरंतरता

इस विभाग द्वारा जारी अधिसूचना क्र. एफ.1(8)वित्त/सावलेनि/2011 दिनांक 19.11.2015 के प्रावधान यथावत लागू रहेंगे तथा इसकी अनुसूची में वर्णित आइटम्स पूर्ववत राज्य की सूक्ष्म एवं लघु श्रेणी के इकाईयों के लिये आरक्षित रहेंगे।

2. उपापन प्रक्रिया में मात्रा का वितरण

उपापन प्रक्रिया के दौरान निम्न श्रेणी के किसी बोलीदाता फर्म के एल-1 घोषित होने पर उपापन की विषयवस्तु की मात्रा का विभाजन निम्न विवरणानुसार किया जायेगा:—

L-1 बोलीदाता की श्रेणी मात्रा का वितरण
राजस्थान की MSEs इस अधिसूचना के प्रावधानों के अधीन 100% मात्रा का आदेश L-1 बोलीदाता को।
राजस्थान के बाहर का Class-I स्थानीय आपूर्तिकर्ता • 20% मात्रा मूल L-1 बोलीदाता को।
• शेष 80% मात्रा — नीचे उल्लिखित प्रावधानों के अनुसार राजस्थान की MSEs को खरीद अधिमान।
राजस्थान का Non-MSE Class-I स्थानीय आपूर्तिकर्ता • 50% मात्रा मूल L-1 बोलीदाता को।
• शेष 50% मात्रा — राजस्थान की MSEs को खरीद अधिमान।
• Non-MSE Non-Class-I, राजस्थान का स्थानीय आपूर्तिकर्ता
• राजस्थान के बाहर का Non Class-I स्थानीय आपूर्तिकर्ता
• 20% मात्रा मूल L-1 बोलीदाता को।
• 40% मात्रा — राजस्थान की MSEs को खरीद अधिमान।
• 40% मात्रा — पात्र स्थानीय आपूर्तिकर्ता जिसकी दरें खरीद अधिमान की सीमा में हों।
3. स्थानीय उत्पादक को क्रय अधिमान (Purchase preference to the local suppliers)

संदर्भित अधिसूचना के अन्तर्गत स्थानीय उत्पादक के रूप में क्रय अधिमान (Purchase Preference) क्रमशः ऐसे बोलीदाताओं को प्रदान किया जायेगा जो L-1 घोषित फर्म की दरों को मैच करेंगे तथा जिनकी बोली L-1 घोषित फर्म की दरों से 20% की सीमा तक होगी।

पात्र बोलीदाताओं को खरीद अधिमान निम्न प्रकार दिया जायेगा, बशर्ते बोली की सभी आवश्यक विनिर्देशन एवं शर्तें पूर्ण हों:—

  1. पात्र बोलीदाताओं को प्रस्तावित मात्रा की आपूर्ति करने का अवसर दिया जायेगा। राजस्थान की सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों से उपापन हेतु प्रस्तावित मात्रा में से 4% मात्रा अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के स्वामित्व वाली राजस्थान की सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों से उपापन के लिये आरक्षित रखी जायेगी।
  2. खरीद अधिमान का यह विकल्प अपनाने के लिये पात्र बोलीदाता, जिसने पात्र बोलीदाताओं में न्यूनतम दर उद्धृत की है, उसे समग्र निम्नतम (L-1) दर के मिलान हेतु काउन्टर ऑफर दिया जायेगा।
  3. यदि निम्नतम पात्र बोलीदाता उक्त उपधारा (ii) के अनुसार काउन्टर ऑफर से सहमत नहीं है अथवा उसके पास सम्पूर्ण बोली मात्रा की आपूर्ति की क्षमता नहीं है, तो उसी काउन्टर ऑफर को अगले निम्नतम पात्र बोलीदाता को क्रम में आपूर्ति की जाने वाली मात्रा पूरी होने तक दिया जायेगा।
  4. यदि उपापन की विषय-वस्तु अविभाज्य प्रकृति की है, तो संविदा मूल निम्नतम बोलीदाता को दी जायेगी।
4. स्थानीय सामग्री (Local Content) के संबंध में स्पष्टीकरण
  1. यदि किसी उपापन में एक से अधिक वस्तुओं का क्रय किया जाना है तथा प्रत्येक की दर अलग-अलग है एवं सभी वस्तुओं की दरों के योग के आधार पर न्यूनतम दरदाता का निर्धारण होना है तो ऐसी स्थिति में स्थानीय विक्रेता फर्म, उस फर्म को माना जायेगा जिसके न्यूनतम 50 प्रतिशत आइटम भारत में निर्मित है।
  2. पुनर्निर्माण (Refurbishing) का अर्थ आयातित उत्पाद की मरम्मत या पुनः स्थिति में सुधार करना है, लेकिन यह निर्माण के समान नहीं है, क्योंकि इसमें कोई नया माल अस्तित्व में नहीं आता है। इसे स्थानीय सामग्री में नहीं माना जायेगा।
  3. पुनिर्वक्रेता (Re-seller) वितरक से स्थानीय स्तर पर प्राप्त आयातित (Imported) वस्तुओं की स्थानीय सामग्री में गणना नहीं की जायेगी।
  4. पुनः पैक किये गये (Re-pack) / नवीनीकृत (Refurbished) एवं पुनः ब्राण्डेड (Rebranded) उत्पादों को स्थानीय उत्पाद की गणना से बाहर रखा जायेगा।
  5. न्यूनतम स्थानीय सामग्री (Minimum local content): किसी आपूर्तिकर्ता को प्रथम श्रेणी के स्थानीय आपूर्तिकर्ता के रूप में वर्गीकृत करने के लिये स्थानीय सामग्री की न्यूनतम आवश्यकता 50 प्रतिशत है। स्थानीय सामग्री का संबंध फर्म की राष्ट्रीयता से नहीं है; एक विदेशी स्वामित्व वाली फर्म भी स्थानीय मूल्यवर्धन (local value addition) करके प्रथम श्रेणी की स्थानीय आपूर्तिकर्ता बन सकती है।
5. स्थानीय सामग्री का सत्यापन (Verification of Local Content)
  1. बोलीदाता द्वारा बोली प्रस्तुत करते समय यह स्वघोषणा प्रस्तुत करनी होगी कि उसके द्वारा जिस सामग्री हेतु बोली प्रस्तुत की गई है वह न्यूनतम स्थानीय सामग्री (Minimum Local Content) की पात्रता को पूर्ण करता है।
  2. राशि रुपये 10.00 करोड़ से अधिक मूल्य के उपापनों में आपूर्तिकर्ता फर्म को फर्म के वैधानिक अंकेक्षक या लागत लेखा अंकेक्षक या किसी कार्यरत सनदी लेखाकार (Chartered Accountant) से स्थानीय सामग्री की मात्रा का प्रमाण पत्र प्राप्त कर प्रस्तुत करना होगा।
  3. समस्त उपापन संस्थाएं बोलीदाताओं द्वारा इस संबंध में प्रस्तुत स्वघोषणा (Self Declaration) एवं अंकेक्षकों/लेखाकारों द्वारा प्रस्तुत प्रमाण पत्रों की पूर्ण रूप से जांच करेंगी।
  4. यदि कोई स्वघोषणा या प्रमाण पत्र असत्य पाये जाते हैं तो ऐसी स्थिति में संबंधित बोलीदाताओं के विरुद्ध सत्यनिष्ठा की संहिता (Code of Integrity) का उल्लंघन मानते हुए राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता अधिनियम, 2012 एवं नियम, 2013 के सुसंगत प्रावधानों के अन्तर्गत कार्यवाही की जावेगी, जिसमें बोलीदाता फर्म को दो साल तक की अवधि के लिये विवर्जित (Debar) किया जाना भी शामिल है।
  5. इस आदेश के प्रावधानों के उल्लंघन के कारण किसी उपापन संस्था द्वारा विवर्जित कोई आपूर्तिकर्ता अन्य उपापन संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले उपापनों में प्राथमिकता प्राप्त करने हेतु विवर्जन अवधि के दौरान अयोग्य होगा।
6. बोली की शर्तों में आवश्यक प्रावधान
  1. उपापन की जाने वाली विषय-वस्तु के संबंध में न्यूनतम स्थानीय सामग्री अवयव (Local content) सामान्यतः 50 प्रतिशत होगा तथा मेक इन इंडिया को वरीयता देने की प्रक्रिया का उल्लेख बोली आमंत्रण सूचना तथा बोली प्रपत्र में किया जाये तथा बोली प्रक्रिया के दौरान इस संबंध में कोई परिवर्तन नहीं किया जाये।
  2. उपापन संस्थाएं उपापन प्रक्रिया में टर्नओवर, उत्पादन क्षमता तथा वित्तीय क्षमता इस प्रकार निर्धारित करें जिससे कि स्थानीय उत्पादक बोली प्रक्रिया से अनावश्यक रूप से बाहर नहीं हो जावे।
  3. बोली दस्तावेज में विदेशी प्रमाण-पत्रों, अनुचित तकनीकी विशिष्टियों/ब्रांड/मॉडल इत्यादि का उल्लेख करना स्थानीय कंपनियों के विरुद्ध प्रतिबंधात्मक और भेदभावपूर्ण होगा। यदि किसी स्थिति में भारतीय मानकों (Indian Standards) की अनुपलब्धता होती है तो विदेशी प्रमाण पत्रों (foreign certification) का प्रावधान सक्षम अनुमोदन के उपरांत रखा जावे।
  4. स्वदेशी उत्पादकों/आपूर्तिकर्ताओं के विरुद्ध बोली दस्तावेज में प्रतिबंधात्मक एवं भेदभावपूर्ण शर्तें नहीं रखी जावे। इसके बावजूद भी यदि ऐसा किया जाता है तो इस हेतु दोषी अधिकारियों के विरुद्ध प्रशासनिक विभाग के स्तर पर उचित कार्यवाही की जाना सुनिश्चित किया जावे।
7. छोटी खरीद (Small Purchase)

राशि रुपये 5.00 लाख से कम मूल्य के उपापन प्रकरणों में इस परिपत्र में उल्लिखित प्रावधान लागू नहीं होंगे।

उपरोक्त दिशा निर्देशों की पालना सुनिश्चित की जावे।

(महेन्द्र मोहन)
संयुक्त शासन सचिव

3. सरल भाषा में सारांश

इस परिपत्र को आसान भाषा में समझें:

🎯 मुख्य उद्देश्य क्या है?

राजस्थान सरकार के सभी विभाग जब कोई सामान या सेवाएं खरीदें, तो भारत में बना हुआ सामान (Make in India) खरीदने को प्राथमिकता दी जाए। इससे देश के स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा।

📊 स्थानीय सामग्री (Local Content) 50% क्यों जरूरी है?

किसी भी फर्म या कंपनी को "प्रथम श्रेणी की स्थानीय आपूर्तिकर्ता" (Class-I Local Supplier) माना जाएगा यदि उसके उत्पाद/सेवाओं में कम से कम 50% सामग्री भारत में निर्मित हो। यह किसी भी कंपनी — चाहे भारतीय हो या विदेशी — पर लागू होती है।

💰 खरीद में छूट (Purchase Preference Margin)

यदि कोई स्थानीय उत्पादक की बोली L-1 (सबसे कम बोली) से 20% तक अधिक है, तो भी उसे L-1 की दर पर सामान देने का मौका मिलेगा।

🏭 राजस्थान की MSE (सूक्ष्म एवं लघु उद्यम) को विशेष लाभ

  • यदि L-1 फर्म राजस्थान की MSE है — पूरी 100% खरीद उसी को।
  • राजस्थान की MSE को SC/ST के स्वामित्व वाली MSE के लिए 4% अतिरिक्त आरक्षण।
  • बड़ी कंपनी L-1 हो तो राजस्थान की MSE को 40% से 80% तक खरीद अधिमान।

❌ क्या Local Content में नहीं गिना जाएगा?

  • Refurbishing (पुरानी चीज की मरम्मत/सुधार) — यह निर्माण नहीं है।
  • Re-seller से आयातित माल — यह भारत में बना नहीं है।
  • Re-pack / Refurbished / Rebranded उत्पाद — ये स्थानीय उत्पाद नहीं हैं।

📝 सत्यापन — कागजी प्रक्रिया

  • हर बोलीदाता को Self Declaration (स्वघोषणा) देनी होगी।
  • ₹10 करोड़ से अधिक की खरीद में CA/Cost Accountant का प्रमाण पत्र जरूरी।
  • झूठी घोषणा पर 2 साल तक Debar (विवर्जन) की कार्रवाई।

🚫 छोटी खरीद पर लागू नहीं

⚠️ ध्यान दें: ₹5 लाख से कम की खरीद पर यह पूरा परिपत्र लागू नहीं होगा।

📌 विभागों को क्या करना होगा?

  • बोली दस्तावेजों में Local Content 50% और Make in India प्राथमिकता का उल्लेख अनिवार्य।
  • Turnover/Production Capacity इस तरह तय करें कि स्थानीय उत्पादक बेवजह बाहर न हों।
  • विदेशी ब्रांड/मॉडल का उल्लेख करना भेदभावपूर्ण माना जाएगा।
  • ऐसा करने वाले अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई होगी।

4. मात्रा वितरण — एक नजर में

L-1 घोषित होने वाली फर्म की श्रेणी के आधार पर खरीद मात्रा का विभाजन:

L-1 फर्म की श्रेणी L-1 को मात्रा राजस्थान MSE को अन्य पात्र स्थानीय को
राजस्थान MSE 100%
राजस्थान के बाहर का Class-I 20% 80%
राजस्थान का Non-MSE Class-I 50% 50%
Non-MSE Non-Class-I (राजस्थान)
Non-Class-I (राजस्थान के बाहर)
20% 40% 40%
✅ SC/ST MSE विशेष प्रावधान: राजस्थान की MSE को आवंटित मात्रा में से 4% अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के स्वामित्व वाली MSE के लिए आरक्षित रहेगी।

5. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

यह परिपत्र राजस्थान सरकार के समस्त उपापन प्राधिकारियों (Procurement Authorities) पर लागू होता है — अर्थात् वे सभी सरकारी विभाग, कार्यालय और संस्थाएं जो ₹5 लाख से अधिक मूल्य की वस्तुएं या सेवाएं खरीदती हैं। ₹5 लाख से कम की खरीद इस परिपत्र के दायरे से बाहर है।
वह फर्म या कंपनी जिसके उत्पाद/सेवाओं में कम से कम 50% Local Content (स्थानीय सामग्री) हो, यानी 50% सामग्री भारत में निर्मित हो। यह फर्म भारतीय या विदेशी किसी भी राष्ट्रीयता की हो सकती है — शर्त केवल 50% भारत निर्मित सामग्री की है।
यदि किसी स्थानीय उत्पादक की बोली, L-1 (सबसे कम बोली लगाने वाली फर्म) की दर से 20% तक अधिक है, तो भी उसे L-1 की दर पर सामान देने का काउन्टर ऑफर दिया जाएगा।

उदाहरण: यदि L-1 दर ₹100 है, तो ₹120 तक बोली लगाने वाले स्थानीय उत्पादक को ₹100 पर सामान देने का अवसर मिलेगा। यदि वह इनकार करे, तो अगले पात्र स्थानीय बोलीदाता को यह ऑफर दिया जाएगा।
राजस्थान की सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों (MSE) को निम्न विशेष लाभ हैं:
  • यदि MSE खुद L-1 है — 100% खरीद आदेश उसे मिलेगा।
  • यदि L-1 राजस्थान के बाहर की Class-I फर्म है — MSE को 80% तक खरीद अधिमान।
  • यदि L-1 राजस्थान की Non-MSE Class-I है — MSE को 50% अधिमान।
  • अन्य स्थिति में — MSE को 40% अधिमान।
  • SC/ST स्वामित्व वाली MSE के लिए MSE हिस्से में से 4% अतिरिक्त आरक्षण
निम्नलिखित को Local Content नहीं माना जाएगा:
  1. Refurbishing: आयातित सामान की मरम्मत/पुनः स्थिति में सुधार — यह निर्माण नहीं है।
  2. Re-seller से आयातित माल: वितरक से स्थानीय स्तर पर मिला आयातित सामान।
  3. Re-pack/Rebranded उत्पाद: केवल पैकिंग या ब्रांड बदलना स्थानीय निर्माण नहीं है।
जब एक उपापन में कई वस्तुएं शामिल हों और सबकी दरें अलग हों, तो स्थानीय विक्रेता वह माना जाएगा जिसके न्यूनतम 50% आइटम भारत में निर्मित हों। यह गणना वस्तुओं की कुल दरों के योग पर नहीं, बल्कि आइटम की संख्या के आधार पर होगी।
₹10 करोड़ से अधिक मूल्य की खरीद में बोलीदाता को निम्न में से किसी एक का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा:
  • फर्म के वैधानिक अंकेक्षक (Statutory Auditor)
  • लागत लेखा अंकेक्षक (Cost Auditor)
  • कार्यरत सनदी लेखाकार (Chartered Accountant/CA)
₹10 करोड़ से कम की खरीद में केवल Self Declaration (स्वघोषणा) पर्याप्त है।
यदि Self Declaration या CA प्रमाण पत्र असत्य पाया जाए तो:
  • Code of Integrity (सत्यनिष्ठा संहिता) का उल्लंघन माना जाएगा।
  • राजस्थान लोक उपापन पारदर्शिता अधिनियम 2012 व नियम 2013 के तहत कार्रवाई।
  • फर्म को 2 साल तक Debar (विवर्जित) किया जा सकता है।
  • Debar अवधि में उस फर्म को किसी भी अन्य सरकारी खरीद में प्राथमिकता नहीं मिलेगी।
हां। Class-I Local Supplier का दर्जा फर्म की राष्ट्रीयता पर नहीं बल्कि उसके स्थानीय मूल्यवर्धन (Local Value Addition) पर निर्भर है। यदि कोई विदेशी स्वामित्व वाली कंपनी भारत में 50% से अधिक सामग्री का उत्पादन/मूल्यवर्धन करे, तो वह भी प्रथम श्रेणी की स्थानीय आपूर्तिकर्ता मानी जाएगी।
सरकारी विभागों को बोली दस्तावेज तैयार करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना होगा:
  • 50% Local Content और Make in India प्राथमिकता का उल्लेख अनिवार्य है।
  • विदेशी ब्रांड, मॉडल या प्रमाण-पत्र निर्दिष्ट नहीं करें — यह भेदभावपूर्ण है।
  • Turnover, क्षमता की शर्तें इतनी कठोर न हों कि स्थानीय उत्पादक बाहर हो जाएं।
  • यदि जानबूझकर स्थानीय उत्पादकों के विरुद्ध शर्तें रखी जाएं — दोषी अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई।
  • बोली प्रक्रिया के दौरान Make in India शर्तों में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।
नहीं। इस परिपत्र की धारा 1 के अनुसार, वित्त विभाग की पुरानी अधिसूचना क्र. एफ.1(8)वित्त/सावलेनि/2011 दिनांक 19.11.2015 के प्रावधान यथावत लागू रहेंगे। उस अधिसूचना की अनुसूची में वर्णित वस्तुएं पूर्ववत राज्य की सूक्ष्म एवं लघु श्रेणी की इकाईयों के लिए आरक्षित रहेंगी। वर्तमान परिपत्र उन प्रावधानों के अतिरिक्त नई व्यवस्था जोड़ता है।
यदि खरीद की विषय-वस्तु ऐसी है जिसे टुकड़ों में नहीं बांटा जा सकता (जैसे एक मशीन, एक सिस्टम), तो संपूर्ण संविदा मूल L-1 बोलीदाता को ही दी जाएगी। ऐसी स्थिति में मात्रा-विभाजन का नियम लागू नहीं होगा।
इस परिपत्र का आधार हैं:
  • वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार का Public Procurement (Preference to Make in India) Order, 2017
  • राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता अधिनियम, 2012 की धारा 6(2)
  • राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता नियम, 2013 का नियम-33
  • बजट घोषणा 2026-27, पैरा 136

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