संविधान सभा (Constituent Assembly) – भारत का संविधान बनाने वाली संस्था
संविधान सभा का गठन और पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारत में सत्ता हस्तांतरण के लिए 1946 में कैबिनेट मिशन भेजा। इस मिशन में तीन ब्रिटिश कैबिनेट सदस्य थे - लॉर्ड पैथिक लॉरेंस (भारत सचिव), सर स्टेफर्ड क्रिप्स (व्यापार बोर्ड के अध्यक्ष), और ए.वी. अलेक्जेंडर (नौसेना मंत्री)।
कैबिनेट मिशन के मुख्य उद्देश्य:
• भारतीय नेताओं के साथ संविधान निर्माण पर सहमति बनाना
• एक निर्विवाद संविधान सभा का गठन करना
• शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण के उपाय तलाशना
• भारत की एकता को बनाए रखना
संविधान सभा की संरचना और सदस्यता
प्रारंभिक सदस्य संख्या
389
विभाजन के बाद
299
हस्ताक्षरकर्ता
284
महिला सदस्य
15 (बाद में 12)
संविधान सभा में प्रारंभ में 389 सदस्य थे, जिनमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि और 4 चीफ कमिश्नर क्षेत्रों के प्रतिनिधि थे। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद भारत में केवल 299 सदस्य रह गए, जिनमें 229 निर्वाचित और 70 मनोनीत थे।
सदस्यता का वितरण (विभाजन के बाद):
• प्रांतीय प्रतिनिधि: 229 सदस्य
• देशी रियासतों के प्रतिनिधि: 70 सदस्य
• अनुसूचित जाति के सदस्य: 26
• अनुसूचित जनजाति के सदस्य: 33
• महिला सदस्य: 12 (विभाजन के बाद)
संविधान सभा के पदाधिकारी और नेतृत्व
महत्वपूर्ण तिथियां और पदाधिकारी:
9 दिसंबर 1946: संविधान सभा की पहली बैठक, डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष बनाया गया
11 दिसंबर 1946: डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित
11 दिसंबर 1946: हरेन्द्र कुमार मुखर्जी उपाध्यक्ष निर्वाचित
13 दिसंबर 1946: जवाहरलाल नेहरू द्वारा उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत
प्रमुख व्यक्तित्व
डॉ. राजेंद्र प्रसाद (अध्यक्ष): बिहार के सिवान जिले में जन्मे डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे बाद में भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने और इस पद पर लगातार दो कार्यकाल पूरे करने वाले एकमात्र राष्ट्रपति थे।
संविधान सभा के प्रमुख सदस्य:
• डॉ. भीमराव अम्बेडकर - प्रारूप समिति के अध्यक्ष
• जवाहरलाल नेहरू - उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुतकर्ता
• सरदार वल्लभभाई पटेल - मौलिक अधिकार समिति के अध्यक्ष
• मौलाना अबुल कलाम आजाद - शिक्षा मंत्री
• डॉ. राजेंद्र प्रसाद - संविधान सभा के अध्यक्ष
संविधान निर्माण की प्रक्रिया
संविधान सभा ने संविधान निर्माण का कार्य लगभग तीन वर्ष (दो वर्ष, ग्यारह माह और सत्रह दिन) में पूरा किया। इस अवधि के दौरान कुल 165 दिनों में 11 सत्र आयोजित किए गए, जिनमें से 114 दिन संविधान के प्रारूप पर विचार में व्यतीत हुए।
संविधान निर्माण की मुख्य घटनाएं:
22 जनवरी 1947: उद्देश्य प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत
29 अगस्त 1947: प्रारूप समिति का गठन, डॉ. भीमराव अम्बेडकर अध्यक्ष बनाए गए
4 नवंबर 1948: डॉ. अम्बेडकर द्वारा संविधान का अंतिम प्रारूप प्रस्तुत
26 नवंबर 1949: संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान को स्वीकार किया गया
26 जनवरी 1950: भारतीय संविधान लागू
प्रारूप समिति और अन्य समितियां
29 अगस्त 1947 को गठित प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर थे। समिति के अन्य सदस्य थे: कन्हैयालाल मुंशी, मोहम्मद सादुल्लाह, अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर, गोपाल स्वामी अय्यंगार, एन. माधव राव, और टी.टी. कृष्णामचारी।
संविधान सभा की प्रमुख समितियां:
• प्रारूप समिति - डॉ. भीमराव अम्बेडकर (अध्यक्ष)
• प्रक्रिया समिति - डॉ. राजेंद्र प्रसाद
• राज्य समिति - जवाहरलाल नेहरू
• राष्ट्रीय ध्वज समिति - डॉ. राजेंद्र प्रसाद
• भाषा समिति - मोटूरि सत्यनारायण
संविधान सभा की कार्यप्रणाली
संविधान निर्माण के आंकड़े:
• कुल समय: 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन
• कुल सत्र: 11 सत्र
• कुल बैठकें: 165 दिन
• संविधान पर चर्चा: 114 दिन
• संशोधन प्रस्ताव: 7,653 (चर्चा में आए: 2,473)
संविधान पर तीन वाचन हुए। पहला वाचन 4 नवंबर 1948 से शुरू हुआ, दूसरा वाचन 15 नवंबर 1948 से 17 अक्टूबर 1949 तक चला, और तीसरा वाचन 14 नवंबर 1949 से शुरू हुआ।
संविधान का अंतिम स्वीकरण
26 नवंबर 1949 को संविधान सभा के 299 सदस्यों में से 284 सदस्यों ने संविधान पर हस्ताक्षर किए। इस दिन को भारत में संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है।
मूल संविधान की विशेषताएं:
मूल संविधान में 395 अनुच्छेद थे जो 22 भागों में विभाजित थे और इसमें 8 अनुसूचियां थीं। वर्तमान में संविधान में 470 अनुच्छेद, 25 भाग और 12 अनुसूचियां हैं।
संविधान सभा का ऐतिहासिक महत्व
भारतीय संविधान सभा का योगदान केवल संविधान निर्माण तक सीमित नहीं था। 15 अगस्त 1947 के बाद यह भारत की अंतरिम संसद के रूप में भी कार्य करती थी। इसने न केवल विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान बनाया बल्कि एक बहुलतावादी और लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला भी रखी।
संविधान सभा की विशेष उपलब्धियां:
• विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान का निर्माण
• सभी वर्गों का उचित प्रतिनिधित्व
• व्यापक विचार-विमर्श और लोकतांत्रिक प्रक्रिया
• राष्ट्रीय एकता और अखंडता का मार्ग प्रशस्त
• मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों का समावेश
संविधान सभा के सदस्यों का सामाजिक प्रतिनिधित्व
संविधान सभा में भारतीय समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व था। इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी और अन्य धर्मों के लोग शामिल थे। महिला सदस्यों में सरोजिनी नायडू जैसी प्रतिष्ठित व्यक्तित्व शामिल थीं।
संविधान सभा की विरासत
भारतीय संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान आज भी देश का मार्गदर्शन कर रहा है। इसने न केवल एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा प्रदान किया बल्कि भारत को एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की दिशा भी दी।
निष्कर्ष
भारतीय संविधान सभा एक अनूठी संस्था थी जिसने न केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र का संविधान बनाया, बल्कि यह भी दिखाया कि कैसे विविधताओं से भरे देश में सर्वसम्मति से निर्णय लिए जा सकते हैं। आज जब भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में उभरा है, तो हमें संविधान सभा के सदस्यों की दूरदर्शिता और समर्पण को नमन करना चाहिए।
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