नियम 2 : लागू होने की सीमा
विषय-सूची
1. मूल नियम का सम्पूर्ण पाठ
(i) उन समस्त व्यक्तियों पर जो 7 अप्रैल, 1949 को या उसके पश्चात् राजस्थान सरकार द्वारा, उसके प्रशासनिक नियंत्रण में हैं, के अथवा राजस्थान राज्य से सम्बन्धित पदों पर या सेवाओं में, नियुक्त किये गये हों।
(ii) उन समस्त व्यक्तियों पर जो उक्त तारीख को या उसके पश्चात्, प्रसंविदा करने वाले राज्यों की सेवाओं के राजस्थान राज्य में एकीकरण के फलस्वरूप, ऐसे पदों या सेवाओं पर नियुक्त किये गये हों, और
(iii) (क) उन समस्त व्यक्तियों पर जो राजस्थान सरकार अथवा किसी प्रसंविदा करने वाले राज्य की सरकार के साथ किन्हीं ऐसे मामलों के सम्बन्ध में की गयी किसी ऐसी संविदा के आधार पर किसी पद अथवा सेवा में नियुक्त किये गये हों जो इन नियमों के अन्तर्गत आते हों और जिनका उपबन्ध उनकी नियुक्ति की संविदा में विशेष रूप से नहीं किया गया हो।
(ख) उप-खण्ड (क) में किसी बात का उल्लेख होते हुए भी इन नियमों के उपबन्ध उन व्यक्तियों पर लागू होंगे जो आरम्भ में किसी पद या सेवा में संविदा के आधार पर नियुक्त किये गये हों किन्तु आगे चलकर नियमित आधार पर नियुक्त कर दिये गये हों एवं जो संविदा सेवाओं को पेन्शन योग्य सेवा की गणना में सम्मिलित कराना चाहते हों।
संविदा सेवा, जो आगे चलकर नियमित नियुक्ति में परिवर्तित हो जाती है, पेन्शन के प्रयोजनार्थ पेन्शन योग्य सेवा मान ली जायेगी, यदि सरकार द्वारा संविदा सेवा काल के बारे में अंशदायी भविष्य निधि में कोई अंशदान नहीं किया गया हो।
यदि सरकार द्वारा अंशदायी भविष्य निधि में अंशदान कर दिया गया हो तो ऐसी संविदा अवधि को पेन्शन योग्य सेवा उसी स्थिति में माना जायेगा जब सम्बन्धित कर्मचारी सरकार द्वारा किये गये अंशदान की सम्पूर्ण उस राशि को, तथा अंशदान के भुगतान की तारीख से राज्य के सामान्य राजस्व मद में जमा कराने की तारीख तक की अवधि के, 7% ब्याज के साथ जमा करा दे।
पाद-टिप्पणियाँ:
1. वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 35(2) आर/52, दिनांक 11.3.1953 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
2. वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(42) वि.वि.(ग्रुप-2)/89, दिनांक 15.2.1990 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।
2. पहला परन्तुक — सेवानिवृत्ति का विकल्प
परन्तु खण्ड (ii) में विनिर्दिष्ट श्रेणी के व्यक्ति इन नियमों के प्रारम्भ या उक्त एकीकरण के फलस्वरूप उनकी नियुक्ति से, जो भी बाद में हो, दो माह के भीतर सेवानिवृत्ति हेतु आवेदन कर सकेंगे तथा उन्हें पेन्शन एवं ग्रेच्युटी का भुगतान उन नियमों के अनुसार किया जायेगा जिनके द्वारा वे इन नियमों के प्रारम्भ या नियुक्ति से पूर्व शासित होते थे :
3. दूसरा परन्तुक — ये नियम किन पर लागू नहीं होंगे
(अ) उन अधिकारियों पर जो केन्द्रीय अथवा राजस्थान से भिन्न अन्य प्रदेशों की सरकारों से इस राज्य में प्रतिनियुक्ति पर आये हों। वे, उनकी अधिष्ठायी नियुक्ति में उन पर लागू सेवा नियमों द्वारा शासित होंगे,
(आ) राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर,
(इ) राजस्थान उच्च न्यायालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 229(2) के साथ पठित अनुच्छेद 238 के अधीन बनाये गये सेवा नियमों द्वारा शासित होंगे, या
(ई) राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों पर, जिनकी सेवाओं का नियमन संविधान के अनुच्छेद 318 के अन्तर्गत बनाये विनियमों से होगा,
(उ) अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों पर, उन मामलों में जिनमें केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गये नियमों में उपबंध विद्यमान हों,
(ऊ) आकस्मिकता मद से भुगतान प्राप्त करने वाले व्यक्तियों पर,
(ए) कार्य-दत्त (वर्क-चार्ज्ड) कर्मचारीगण अर्थात् वे व्यक्ति जो नियमित संस्थापन पर नहीं हैं और जिन्हें निर्माण कार्यों अथवा उनके रख-रखाव के लिए या राजकीय व्यापार योजनाओं में अथवा ऐसी ही अन्य योजनाओं के लिये स्वीकृत प्रावधानों से भुगतान किया जाये। विनियोजन की बजट इकाई 'अधिकारियों का वेतन' और 'संस्थापन का वेतन' के अधीन के प्रावधानों से भिन्न प्रावधानों में से किया जाता है,
(ऐ) ऐसे व्यक्तियों पर जिनकी नियुक्ति एवं सेवा की शर्तों को नियमित करने के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 309 के परन्तुक अथवा किसी अन्य विधि या नियमों, जो उन पर तत्समय प्रभावी हों, के अन्तर्गत विशिष्ट या पृथक्-रूप से नियम बना दिये गये हों और जिनमें इन नियमों जैसी सेवा शर्तों का उल्लेख कर दिया गया हो,
(ओ) ऐसे व्यक्तियों पर जिनको वेतन राज्य की संचित निधि की विनियोजन की बजट इकाई "अधिकारियों का वेतन" और "संस्थापन का वेतन" में से भुगतान किया जाता हो किन्तु जिन्हें औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(एस) के अनुसार कामगार की परिभाषा में माना जाये।
केवल उपर्युक्त खण्ड (ऐ) के प्रावधानों में वर्णित व्यक्तियों के मामलों में निम्नलिखित नियमों को छोड़कर :
- (1) मानदेय की स्वीकृति के सम्बन्ध में नियम 43(सी) एवं (डी)।
- (2) अध्याय-6 — नियुक्तियों का संयोजन।
- (3) अध्याय-10 एवं 11 — अवकाश।
- (4) अध्याय-13 — वैदेशिक सेवा।
- (5) अध्याय-14 — स्थानीय निधि के अन्तर्गत सेवा।
1. वित्त विभाग के आदेश सं. 286/58 एफ. 7ए(30) विवि-ए (नियम)/57, दिनांक 11.3.1958 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
2. वित्त विभाग की अधिसूचना संख्या एफ. 1(84) विवि (नियम)/71, दिनांक 17.1.1972 द्वारा जोड़ा गया।
4. टिप्पणी
यदि कोई व्यक्ति जिस पर खण्ड (ii) लागू होता है, एकीकृत सेवा में अपनी नियुक्ति के लिए सरकार को अभ्यावेदन करता है तो सरकार, उस अभ्यावेदन के अन्तिम रूप से निपटारा होने पर, निदेश दे सकेगी कि परन्तुक में वर्णित दो माह की अवधि उस अभ्यावेदन के अन्तिम निपटारे की तारीख से या अन्य ऐसी तारीख से प्रारम्भ होगी जिसको राज्य सरकार किसी सामान्य या विशेष आदेश से विनिर्दिष्ट करे।
वित्त विभाग के आदेश संख्या एफ. 35(8) आर/51, दिनांक 22.8.1951 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
5. निर्देशन
वित्त विभाग की अधिसूचना संख्या एफ. 1(84)/एफ.डी. (रुल्स)/71, दिनांक 17 जनवरी 1972 की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है जिसमें उपबंधित किया गया है कि विशिष्ट श्रेणी के राज्य कर्मचारियों, जिन्हें औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(एस) के अनुसार कामगार माना जाता है और सामान्यतः सरकार के औद्योगिक कर्मचारी निर्दिष्ट किया जाता है, पर इन नियमों के बहुत से प्रावधान, विशेषकर अवकाश स्वीकृति के मामले में प्रभावी नहीं होते हैं।
तदनुसार वे राज्य कर्मचारी, जो इन नियमों के नियम 2 के द्वितीय परन्तुक के खण्ड (i) के प्रावधानों से आवृत्त होते हैं, कारखाना अधिनियम, 1948 के अध्याय-8 के अनुसार वेतन सहित अवकाश प्राप्त करेंगे। राज्य सरकार ने राजस्थान कारखाना अधिनियम, 1951 बनाकर उक्त अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी कर दिया है और इन नियमों के अध्याय-8 में वेतन सहित अवकाश स्वीकृत करने तथा उनकी निर्धारित प्रपत्रों में पंजिका आदि रखने का विस्तृत उल्लेख कर दिया है।
विभागाध्यक्ष और कार्यालयाध्यक्ष जिन्हें किसी राजकीय औद्योगिक संस्थान की व्यवस्था का उत्तरदायित्व सौंपा गया है, जैसे राजस्थान राज्य केमिकल वर्क्स, डीडवाना; ऊन मिल, बीकानेर; राजकीय मुद्रणालय; आयुर्वेदिक रसायन शालायें; सार्वजनिक निर्माण (भवन एवं पथ) विभाग तथा जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग; भू-जल बोर्ड; कृषि विभाग एवं मोटर गैरेज विभाग की राजकीय कार्यशालाएँ; सिंचाई परियोजनाएँ जिनमें राजस्थान नहर परियोजना, चम्बल परियोजनाएँ, इत्यादि सम्मिलित हैं, तथा अन्य इसी प्रकार के राजकीय औद्योगिक प्रतिष्ठान — इनको राजस्थान कारखाना अधिनियम में 'अधिभोगी' (ओकुपायर) अथवा 'व्यवस्थापक' (मैनेजर) परिभाषित किया गया है।
ऐसे विभागाध्यक्षों अथवा कार्यालयाध्यक्षों से निवेदन है कि राजस्थान कारखाना नियम, 1951 के कामगारों को वेतन सहित अवकाश आदि देने सम्बन्धी प्रावधानों को क्रियान्वित करने के लिये तुरन्त कार्यवाही करें ताकि ऐसे राजकीय औद्योगिक संस्थानों के कर्मचारियों को वेतन सहित अवकाश प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं हो। जिन राजकीय प्रतिष्ठानों की व्यवस्था करने वाले विभागाध्यक्षों या कार्यालयाध्यक्षों को अभी तक कारखाना नियमों के अनुसार 'अधिभोगी' या 'व्यवस्थापक' घोषित नहीं किया गया है, उनको अपने प्रशासनिक विभागों को इस बारे में तुरन्त लिखना चाहिये।
जिन औद्योगिक विभागों में पूर्णकालिक श्रम कल्याण अधिकारी या कार्मिक अधिकारी हैं वहाँ पर यह काम उनको दिया जा सकता है ताकि वे नई प्रणाली को तुरन्त लागू कराने में सहायक हों। कारखाना अधिनियम तथा उसके अन्तर्गत बनाये नियम के प्रावधानों को क्रियान्वित करने में यदि कोई कठिनाई अथवा समस्या हो तो, मुख्य निरीक्षक, कारखाना एण्ड बायलर्स, राजस्थान, जयपुर अथवा कारखाना निरीक्षक अथवा श्रम-आयुक्त से, जैसी भी आवश्यकता हो, सहायता एवं मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सकता है।
वित्त विभाग के परिपत्र संख्या एफ. 1(84) विवि/(नियम)/71, दिनांक 17.1.1972 द्वारा जोड़ा गया।
6. राजस्थान सरकार का आदेश
राजस्थान उच्च न्यायालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर राजस्थान सेवा नियम दिनांक 1 अप्रैल, 1951 से प्रभावी किये गये हैं। इसका सन्दर्भ भारत के संविधान के अनुच्छेद 229(2) को अनुच्छेद 238 के साथ पठित करते हुए, से है।
विधि विभाग के पत्रांक एफ. 34(2) न्याय/51, दिनांक 29.5.1951 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
7. राजस्थान सरकार के निर्णय
वित्त विभाग की अधिसूचना संख्या एफ. 35(8) आर/51, दिनांक 22 अगस्त, 1951 (नियम 2 के नीचे की टिप्पणी) के साथ पठित, राजस्थान सेवा नियमों के नियम 2 के खण्ड (ii) और उसके परन्तुक की सीमा के बारे में संदेह व्यक्त किये गये हैं।
मामले पर सरकार द्वारा विचार किया गया है और यह अभिनिर्धारित किया गया है कि खण्ड (ii) में, राजस्थान के एकीकरण की तारीख के पश्चात्, ऐसे एकीकरण के परिणामस्वरूप राजस्थान राज्य के प्रशासनिक नियन्त्रण में, या उसके कार्य से सम्बन्धित किसी पद पर अनन्तिम नियुक्ति (या उस पर निरन्तर पदासीन रहना) सम्मिलित है — चाहे ऐसा पद किसी विभाग या सेवा के लिए एकीकरण व्यवस्था के अधीन या अन्यथा सृजित किया गया था या राजस्थान के एकीकरण-पूर्व की व्यवस्था में चला आ रहा था।
परन्तुक में अन्तर्विष्ट विकल्प सेवानिवृत्ति तक सीमित है और सेवा नियमों के अन्य पहलुओं से सम्बन्धित नहीं है। इस विकल्प का प्रयोग राजस्थान सेवा नियमों के प्रारम्भ या एकीकरण व्यवस्था में किसी पद, संवर्ग या सेवा में अधिष्ठायी नियुक्ति, जो भी बाद में हो, से दो मास के भीतर किया जा सकता था। यदि कोई सरकारी कर्मचारी सेवानिवृत्त होने का विकल्प देता है तो उसकी पेन्शन इस प्रकार अवधारित की जायेगी मानो यह मामला उन नियमों के अधीन क्षतिपूर्ति पेन्शन (या तदनुरूपी पेन्शन प्रवर्ग) का था जिनके द्वारा सरकारी कर्मचारी पूर्व में शासित होता था।
वित्त विभाग के ज्ञापन सं. एफ. 35(2) आर/52, दिनांक 12.2.1952 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
वित्त विभाग का ज्ञापन संख्या एफ. 35(2) आर/52, दिनांक 12 फरवरी, 1952 (राजस्थान सरकार का निर्णय संख्या 1) राजस्थान सेवा नियमों के नियम 2 के खण्ड (ii) की सीमा के बारे में स्थिति स्पष्ट करता है और उसका परन्तुक वित्त विभाग के आदेश संख्या एफ. 35(8) आर/51, दिनांक 22.8.1951 द्वारा उक्त नियम के नीचे अन्तःस्थापित की गयी टिप्पणी को रद्द नहीं करता है (नियम 2 के नीचे की टिप्पणी) — जो एकीकृत सेवा की उनकी किसी नियुक्ति के सम्बन्ध में सरकार को अभ्यावेदन देने के सम्बन्ध में है।
वित्त विभाग के ज्ञापन सं. एफ. 35(2) आर/52, दिनांक 29.2.1952 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
राजस्थान सेवा नियम 2(ii) के परन्तुक द्वारा दिये गये विकल्प को लागू करने के सम्बन्ध में और सन्देह व्यक्त किये गये हैं। राज्य सरकार ने इस पर विचार कर लिया है और निर्णय किया है कि इस परन्तुक को रखने का प्रयोजन राजस्थान सेवा नियमों को उन सब पर अनिवार्य रूप से लागू किया जाना है जो राज्य की सेवाओं में एकीकरण के फलस्वरूप मूल नियुक्ति स्वीकार करते हैं। जो कोई इन नियमों को स्वीकार करना नहीं चाहे, वह परन्तुक में दिये गये विकल्प का उपयोग कर, सेवानिवृत्ति प्राप्त करने का अधिकारी होगा।
परन्तुक के अधीन विकल्प का लाभ राजस्थान सेवा नियमों के प्रारम्भ, या एकीकरण व्यवस्था में अधिष्ठायी नियुक्ति, जो भी बाद में हो, के दो मास के भीतर लिया जा सकता था। उक्त पैरा 1 के संदर्भ में इसका अभिप्राय यह है कि उन मामलों में, जिनमें राजस्थान सेवा नियमों के जारी होने के पूर्व ही अधिष्ठायी नियुक्ति हो चुकी हो, विकल्प नियमों के जारी होने के केवल दो मास तक उपलब्ध था। अन्य मामलों में विकल्प का प्रयोग अधिष्ठायी नियुक्ति के पश्चात् दो मास की समाप्ति तक किसी भी समय किया जा सकता था। यदि कोई सरकारी कर्मचारी इन नियमों के प्रवर्तन के अधीन नहीं आना चाहता है तो अधिष्ठायी नियुक्ति होने के पूर्व भी सेवानिवृत्त होने के विकल्प का प्रयोग करने का वर्जन नहीं है।
जो किसी एकीकृत व्यवस्था में अपनी नियुक्ति के सम्बन्ध में सरकार को अभ्यावेदन देते हैं, उनके मामले में परन्तुक में विनिर्दिष्ट दो मास की अवधि अभ्यावेदन के अन्तिम निपटारे की तारीख से या ऐसी तारीख से प्रारम्भ होगी जो सरकार द्वारा विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट की जाये — जैसा कि वित्त विभाग के आदेश संख्या एफ. 35(8) आर/51, दिनांक 22.8.1951 (नियम 2 के नीचे की टिप्पणी) में पहले ही अधिकथित किया जा चुका है।
वित्त विभाग के ज्ञापन सं. एफ. 35(2) आर/51, दिनांक 17.9.1952 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
वित्त विभाग के ज्ञापन संख्या एफ. 35(2) आर/52, दिनांक 12.2.1952 (राजस्थान सरकार का निर्णय संख्या 1) में अधिकथित किया गया था कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी राजस्थान सेवा नियमों के नियम 2 के अधीन सेवानिवृत्त होने का विकल्प देता है तो उसकी पेन्शन इस प्रकार अवधारित की जायेगी मानो यह मामला उन नियमों के अधीन क्षतिपूर्ति पेंशन (या तदनुरूपी पेंशन प्रवर्ग) का था जिनके द्वारा सरकारी कर्मचारी पूर्व में शासित होता था। इस बारे में एक प्रश्न उत्पन्न हुआ है कि पेंशन के स्थान पर जोधपुर अंशदायी भविष्य निधि नियमों द्वारा शासित होने वाले समान परिस्थितियों वाले सरकारी कर्मचारियों के साथ क्या रुख अपनाया जाये।
मामले पर विचार किया गया है और यह अभिनिर्धारित किया गया है कि ऐसे मामलों पर अंशदायी भविष्य निधि द्वारा शासित नियमों के अधीन उसी आधार पर विचार किया जायेगा मानो वे सेवानिवृत्ति या संस्थापन में कमी के कारण पदमुक्ति के मामले हों।
वित्त विभाग के ज्ञापन सं. डी. 9412 एफ. 10(28) आर/53, दिनांक 25.11.1955 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
पूर्व जोधपुर राज्य के कुछ सरकारी कर्मचारी राजस्थान सेवा नियमों के जारी होने की तारीख 1.4.1951 को या उसके पश्चात् किन्तु विभाग के अंतिम रूप से एकीकरण के पूर्व, अधिवर्षिता आयु प्राप्त करने पर (रा.से.नि. 2 के परन्तुक के अनुसार अनुज्ञेय विकल्प के अधीन नहीं) सेवानिवृत्त हो गये। यह संदेह उत्पन्न हुआ है कि क्या ऐसे व्यक्तियों के पेंशन दावों को इकाई नियमों के अधीन विनियमित किया जाना चाहिए या राजस्थान सेवा नियमों के अधीन।
यह अभिनिर्धारित किया गया कि क्योंकि सरकारी कर्मचारियों ने इकाई नियमों के अधीन सेवानिवृत्ति का विकल्प नहीं दिया था, इसलिए उनके मामले राजस्थान सेवा नियमों के अधीन विनियमित किये जाने चाहिए।
वित्त विभाग के ज्ञापन सं. डी. 718 एफ. 11/53, दिनांक 15.5.1953 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
8. सरल भाषा में व्याख्या
नियम 1 ने बताया कि इन नियमों का नाम क्या है और वे कब से लागू हुए। नियम 2 अगला सवाल हल करता है — ये नियम किन-किन लोगों पर लागू होंगे और किन पर नहीं।
तीन श्रेणियाँ जिन पर नियम लागू होते हैं
पहली — सीधी नियुक्ति। जो भी व्यक्ति 7 अप्रैल 1949 को या उसके बाद राजस्थान सरकार द्वारा किसी पद पर नियुक्त हुआ, वह इन नियमों के दायरे में है।
दूसरी — एकीकरण से आये कर्मचारी। जो लोग रियासतों के राजस्थान में विलय के फलस्वरूप राज्य सेवा में आये, वे भी इसी दायरे में हैं।
तीसरी — संविदा पर नियुक्त। संविदा (contract) पर नियुक्त लोगों पर भी नियम लागू होते हैं — बशर्ते उनकी संविदा में उस विषय का अलग से उल्लेख न किया गया हो। यदि संविदा में कोई बात विशेष रूप से लिखी है, तो वही चलेगी।
संविदा सेवा और पेन्शन (खण्ड iii-ख)
यह भाग 1990 में जोड़ा गया और व्यावहारिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। इसका सार यह है —
- यदि कोई पहले संविदा पर था और बाद में नियमित हो गया, तो वह अपनी संविदा अवधि को पेन्शन योग्य सेवा में जुड़वा सकता है।
- यदि उस अवधि में सरकार ने अंशदायी भविष्य निधि (CPF) में कोई अंशदान नहीं किया — तो वह अवधि सीधे पेन्शन योग्य मान ली जाएगी।
- यदि सरकार ने अंशदान कर दिया था — तो कर्मचारी को वह पूरी राशि, अंशदान की तारीख से जमा कराने की तारीख तक 7% ब्याज सहित राज्य के राजस्व में लौटानी होगी। तभी वह अवधि पेन्शन योग्य मानी जाएगी।
दो माह वाला विकल्प (पहला परन्तुक)
यह प्रावधान केवल खण्ड (ii) वालों के लिए था — यानी एकीकरण से आये कर्मचारी। उन्हें छूट दी गई थी कि यदि वे राजस्थान सेवा नियमों को स्वीकार नहीं करना चाहते, तो दो माह के भीतर सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन कर सकते हैं, और उनकी पेन्शन-ग्रेच्युटी पुराने (रियासत के) नियमों से मिलेगी।
नौ श्रेणियाँ जिन पर नियम लागू नहीं होते
दूसरा परन्तुक अपवाद गिनाता है। मोटे तौर पर ये वे लोग हैं जिनके लिए कोई दूसरा कानूनी ढाँचा पहले से मौजूद है — इसलिए दोहरा नियमन न हो। जैसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश (संविधान द्वारा शासित), RPSC के अध्यक्ष-सदस्य (अनुच्छेद 318), अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी (केन्द्रीय नियम), प्रतिनियुक्ति पर आये अधिकारी (मूल कैडर के नियम), इत्यादि।
9. विस्तृत व्याख्या
7 अप्रैल 1949 का महत्व
नियम 1951 में बने, पर लागू होने की सीमा 1949 से रखी गई। इसका कारण ऐतिहासिक है — यही वह समय है जब वृहत्तर राजस्थान का गठन हो रहा था और विभिन्न रियासतों की सेवाएँ एक राज्य में मिल रही थीं। यदि सीमा 1951 रखी जाती, तो 1949–51 के बीच नियुक्त हजारों कर्मचारी किसी भी नियम-ढाँचे के बाहर रह जाते। इसलिए नियम को भूतलक्षी (retrospective) प्रभाव दिया गया।
"प्रसंविदा करने वाले राज्य" का अर्थ
"प्रसंविदा करने वाले राज्य" (Covenanting States) से आशय उन रियासतों से है जिन्होंने राजस्थान के गठन हेतु प्रसंविदा (Covenant) पर हस्ताक्षर किये — जैसे जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर, कोटा, बूँदी, अलवर, भरतपुर आदि। इनकी सेवाओं का राजस्थान में विलय ही खण्ड (ii) का विषय है।
संविदा बनाम नियम — कौन ऊपर?
खण्ड (iii)(क) का अंतिम वाक्यांश महत्वपूर्ण है: "जिनका उपबन्ध उनकी नियुक्ति की संविदा में विशेष रूप से नहीं किया गया हो।" इसका सीधा अर्थ है कि संविदा में जो विषय स्पष्ट रूप से तय है, उस विषय पर संविदा चलेगी; जो विषय संविदा में मौन है, उस पर ये नियम लागू होंगे। यानी संविदा विशेष प्रावधान है और नियम सामान्य प्रावधान।
निर्णय 1 का व्यावहारिक महत्व
निर्णय 1 यह स्पष्ट करता है कि खण्ड (ii) में अनन्तिम (provisional) नियुक्ति भी शामिल है — और पुराने पद पर निरन्तर बने रहना भी। यह विवाद इसलिए उठा था कि एकीकरण के समय बहुत से कर्मचारी औपचारिक नियुक्ति-आदेश के बिना ही पुराने पदों पर काम करते रहे थे। सरकार ने तय किया कि वे भी नियम 2 के दायरे में आएँगे।
निर्णय 4 — जोधपुर CPF वालों का मामला
पूर्व जोधपुर राज्य में पेन्शन के बजाय अंशदायी भविष्य निधि (CPF) की व्यवस्था थी। सवाल उठा कि जब पेन्शन वालों को "क्षतिपूर्ति पेन्शन" का लाभ मिल रहा है, तो CPF वालों का क्या होगा। सरकार ने तय किया कि उनके मामलों को CPF नियमों के अधीन ऐसे देखा जाएगा मानो वे सेवानिवृत्ति या संस्थापन में कमी के कारण पदमुक्ति (discharge on reduction of establishment) के मामले हों।
10. सारांश तालिका
| श्रेणी | स्थिति | आधार |
|---|---|---|
| 7.4.1949 के बाद सीधे नियुक्त | लागू ✓ | खण्ड (i) |
| एकीकरण के फलस्वरूप नियुक्त | लागू ✓ | खण्ड (ii) |
| संविदा पर नियुक्त (जहाँ संविदा मौन हो) | लागू ✓ | खण्ड (iii)(क) |
| संविदा से नियमित हुए (पेन्शन गणना हेतु) | लागू ✓ | खण्ड (iii)(ख) |
| प्रतिनियुक्ति पर आये अधिकारी | लागू नहीं ✗ | परन्तुक (अ) |
| राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश | लागू नहीं ✗ | परन्तुक (आ) |
| उच्च न्यायालय के अधिकारी/कर्मचारी | लागू नहीं ✗ | परन्तुक (इ) |
| RPSC अध्यक्ष एवं सदस्य | लागू नहीं ✗ | परन्तुक (ई) |
| अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी | लागू नहीं ✗ | परन्तुक (उ) |
| आकस्मिकता मद से भुगतान पाने वाले | लागू नहीं ✗ | परन्तुक (ऊ) |
| कार्य-दत्त (वर्क-चार्ज्ड) कर्मचारी | लागू नहीं ✗ | परन्तुक (ए) |
| पृथक् सेवा नियमों से शासित व्यक्ति | लागू नहीं ✗ | परन्तुक (ऐ) |
| औद्योगिक विवाद अधिनियम के "कामगार" | लागू नहीं ✗ | परन्तुक (ओ) |
11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
12. संदर्भ
- राजस्थान सेवा नियम — वित्त विभाग, राजस्थान सरकार (PDF)
- भारतीय संविधान, अनुच्छेद 309 — Indian Kanoon
- वित्त विभाग, राजस्थान सरकार — आधिकारिक वेबसाइट
- राजस्थान सरकार — rajasthan.gov.in

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