RSR नियम 3: वित्त विभाग की सहमति लिया जाना | राजस्थान सेवा नियम — सम्पूर्ण मूल पाठ

📅 शनिवार, 25 जुलाई 2026 📖 पूरा लेख
RSR नियम 3: वित्त विभाग की सहमति लिया जाना | राजस्थान सेवा नियम — सम्पूर्ण मूल पाठ
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नियम 3 : वित्त विभाग की सहमति लिया जाना

राजस्थान सेवा नियम — सम्पूर्ण मूल पाठ एवं राजस्थान सरकार का निर्देश

1. मूल नियम का सम्पूर्ण पाठ

नियम 3. वित्त विभाग की सहमति लिया जाना :

वित्त विभाग के परामर्श के बिना इन नियमों में निहित किसी शक्ति/अधिकार का प्रयोग या प्रत्यायोजन नहीं किया जायेगा।

वित्त विभाग को यह अधिकार है कि वह किसी सामान्य अथवा विशेष आज्ञा द्वारा यह निर्धारित कर दे कि किन-किन मामलों में उसके द्वारा सहमति दी हुई मानी जायेगी तथा किन-किन मामलों में उसकी सहमति लेने के पश्चात् मामले प्रशासनिक विभाग द्वारा राज्यपाल को प्रस्तुत किये जायेंगे।

2. राजस्थान सरकार का निर्देश

राजस्थान सरकार का निर्देश

यह देखा गया है कि प्रशासनिक विभाग अपनी ओर से बिना समुचित परीक्षण किये ही मामलों को वित्त विभाग में भिजवा देते हैं। सामान्यतः केवल निम्नलिखित प्रकार के मामले ही वित्त (नियम) विभाग को प्रेषित किये जाने चाहिए :

  • (1) ऐसे मामले जिनमें वित्त विभाग की सहमति आवश्यक हो।
  • (2) ऐसे मामले जिनमें किन्हीं नियमों की व्याख्या करनी हो।

उपर्युक्त वर्णित मामलों के अतिरिक्त अन्य मामलों की राजस्थान सेवा नियमों के प्रावधानों के अनुसार प्रशासनिक विभागों द्वारा ही संवीक्षा की जानी चाहिये तथा उनके द्वारा ही उन पर, नियमों के अनुसार, अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए, निर्णय लिये जाने चाहिए। अतः ऐसे मामलों को वित्त विभाग को भेजना आवश्यक नहीं है, किन्तु इसका पालन नहीं किया जाता है।

परिणामस्वरूप बहुत सारे मामले वित्त विभाग को सलाह के लिए अनावश्यक रूप से भेज दिये जाते हैं। केवल इतना ही नहीं, मामले भेजते समय प्रशासनिक विभाग न तो वित्त विभाग की सलाह चाहने वाले बिन्दु उपदर्शित करते हुए स्व-अंतर्विष्ट टिप्पणी देता है और न ही उन पर अपनी टिप्पणियाँ। इस प्रकार वित्त विभाग को सलाह देने से पूर्व मामले की वास्तविक स्थिति का पता लगाने में पर्याप्त समय लगता है।

अब भविष्य में वित्त विभाग ऐसे किसी मामले पर विचार नहीं करेगा और न ही सहमति देगा जिसके साथ प्रशासनिक विभाग स्पष्ट रूप से निम्नलिखित सूचना नहीं भेजेगा :

  • 1. एक स्व-अंतर्विष्ट टिप्पणी जिसमें सम्पूर्ण तथ्यों का विवरण एवं वित्त विभाग द्वारा कार्यवाही हेतु बिन्दु बताये गये हों।
  • 2. सम्बन्धित नियमों का उल्लेख तथा पूर्व में निर्णीत ऐसे मामलों की जानकारी के साथ प्रशासनिक विभाग की टिप्पणी।
  • 3. जहाँ प्रशासनिक विभाग उसको दी गई शक्तियों के अधीन अपने स्तर पर ऐसे मामलों का निपटारा करने को सक्षम हो, तो ऐसे मामलों को वित्त विभाग में भेजने का औचित्य।

वित्त विभाग के परिपत्र सं. एफ. 1(48)/विवि/(नियम)/72, दिनांक 30.10.1972 द्वारा जोड़ा गया।

3. सरल भाषा में व्याख्या

नियम 1 ने नाम और प्रारम्भ तय किया, नियम 2 ने बताया कि नियम किन पर लागू होंगे। नियम 3 अब एक अलग प्रश्न उठाता है — इन नियमों में जो शक्तियाँ दी गई हैं, उनका प्रयोग कौन और कैसे कर सकता है।

नियम की दो पंक्तियाँ, दो अलग बातें

पहली बात — रोक। इन नियमों में जो भी शक्ति या अधिकार निहित है, उसका न तो प्रयोग किया जा सकता है और न ही किसी को प्रत्यायोजित (delegate) किया जा सकता है, जब तक वित्त विभाग से परामर्श न कर लिया जाये। यह एक निषेधात्मक प्रावधान है।

दूसरी बात — छूट देने का अधिकार। वित्त विभाग स्वयं सामान्य या विशेष आज्ञा जारी करके यह तय कर सकता है कि किन मामलों में उसकी सहमति पहले से दी हुई मानी जाएगी — यानी हर बार फाइल भेजने की ज़रूरत नहीं। साथ ही वह यह भी तय कर सकता है कि किन मामलों में उसकी सहमति के बाद फाइल राज्यपाल तक जाएगी।

सार: पहली पंक्ति सामान्य नियम है — वित्त विभाग की सहमति अनिवार्य। दूसरी पंक्ति उस नियम में लचीलापन देती है — वित्त विभाग स्वयं तय कर सकता है कि कहाँ सहमति स्वतः मानी जाए।

1972 का निर्देश क्यों जारी हुआ

नियम 3 के लागू होने के बाद व्यवहार में एक समस्या पैदा हुई। प्रशासनिक विभाग सुरक्षित रास्ता चुनते हुए लगभग हर मामला वित्त विभाग को भेजने लगे — चाहे उसमें वित्त विभाग की सहमति आवश्यक हो या न हो। इससे वित्त विभाग पर अनावश्यक भार बढ़ा और फाइलें अटकने लगीं।

1972 के परिपत्र ने इसे दो तरह से ठीक किया — पहले यह स्पष्ट किया कि केवल दो प्रकार के मामले ही भेजे जाने चाहिए, और फिर यह शर्त लगाई कि जो मामले भेजे भी जाएँ उनके साथ तीन चीज़ें अनिवार्य रूप से होंगी, वरना वित्त विभाग उन पर विचार ही नहीं करेगा।

4. विस्तृत व्याख्या

"शक्ति का प्रयोग" और "प्रत्यायोजन" — दोनों पर रोक

नियम की भाषा पर ध्यान दें — इसमें दो क्रियाएँ हैं : प्रयोग और प्रत्यायोजन। यह महत्वपूर्ण है। यदि केवल "प्रयोग" पर रोक होती, तो कोई विभाग अपनी शक्ति किसी अधीनस्थ अधिकारी को सौंपकर परोक्ष रूप से वही काम करवा सकता था। दोनों को एक साथ रखकर यह रास्ता बंद कर दिया गया।

वित्त विभाग की भूमिका — नियंत्रक नहीं, समन्वयक

नियम 3 वित्त विभाग को हर मामले में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं देता। दूसरी पंक्ति उसे यह शक्ति देती है कि वह स्वयं अपने कार्यक्षेत्र को परिभाषित करे — "इन-इन मामलों में मेरी सहमति स्वतः मानी जाए।" यह प्रशासनिक व्यवहार्यता के लिए आवश्यक था, क्योंकि 251 नियमों वाली संहिता में हर छोटे निर्णय के लिए वित्त विभाग की फाइल-यात्रा असम्भव होती।

राज्यपाल तक कौन-से मामले जाएँगे

नियम की अंतिम पंक्ति एक तीसरा स्तर बनाती है। कुछ मामलों में वित्त विभाग की सहमति पर्याप्त नहीं होती — उसके बाद प्रशासनिक विभाग को फाइल राज्यपाल के समक्ष रखनी होती है। कौन-से मामले इस श्रेणी में आएँगे, यह भी वित्त विभाग ही सामान्य या विशेष आज्ञा द्वारा तय करता है।

तीन अनिवार्य शर्तें — व्यावहारिक अर्थ

स्व-अंतर्विष्ट टिप्पणी (self-contained note) का अर्थ है ऐसी टिप्पणी जो अपने आप में पूर्ण हो — पढ़ने वाले को पुरानी फाइलें मँगवाने की ज़रूरत न पड़े। इसमें पूरे तथ्य हों और यह स्पष्ट लिखा हो कि वित्त विभाग से किस बिन्दु पर कार्यवाही अपेक्षित है।

नियमों का उल्लेख और पूर्व-निर्णय — प्रशासनिक विभाग को यह बताना होगा कि मामला किस नियम से जुड़ा है और इससे मिलते-जुलते मामलों में पहले क्या निर्णय हुए। इससे परस्पर विरोधी निर्णयों की सम्भावना घटती है।

औचित्य (justification) — यह तीसरी शर्त सबसे कड़ी है। यदि प्रशासनिक विभाग स्वयं उस मामले को निपटाने में सक्षम है, तो उसे लिखित में बताना होगा कि फिर भी वह मामला वित्त विभाग को क्यों भेज रहा है। यही वह शर्त है जो अनावश्यक फाइलों को रोकती है।

5. सारांश तालिका

बिन्दुप्रावधान
मूल रोकवित्त विभाग के परामर्श बिना नियमों की किसी शक्ति का प्रयोग या प्रत्यायोजन नहीं
छूट का अधिकारवित्त विभाग सामान्य/विशेष आज्ञा द्वारा तय कर सकता है कि कहाँ सहमति स्वतः मानी जाए
राज्यपाल स्तरवित्त विभाग तय करेगा कि किन मामलों में उसकी सहमति के बाद फाइल राज्यपाल को जाएगी
वित्त विभाग को भेजे जाने योग्य मामलेकेवल दो — (1) जहाँ सहमति आवश्यक हो, (2) जहाँ नियम की व्याख्या करनी हो
शेष मामलेप्रशासनिक विभाग स्वयं संवीक्षा कर, अपने अधिकारों से निर्णय ले
अनिवार्य शर्त 1स्व-अंतर्विष्ट टिप्पणी — पूरे तथ्य + कार्यवाही हेतु बिन्दु
अनिवार्य शर्त 2सम्बन्धित नियमों का उल्लेख + पूर्व-निर्णीत मामलों की जानकारी + विभाग की टिप्पणी
अनिवार्य शर्त 3यदि विभाग स्वयं सक्षम है, तो भेजने का औचित्य
पालन न होने परवित्त विभाग न विचार करेगा, न सहमति देगा

6. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: नियम 3 का मूल आशय क्या है?
कि राजस्थान सेवा नियमों में निहित कोई भी शक्ति या अधिकार वित्त विभाग के परामर्श के बिना न तो प्रयोग किया जा सकता है और न ही किसी अन्य को प्रत्यायोजित किया जा सकता है।
प्रश्न 2: क्या हर मामले में वित्त विभाग की सहमति लेनी ही पड़ेगी?
नहीं। नियम 3 की दूसरी पंक्ति वित्त विभाग को यह अधिकार देती है कि वह सामान्य या विशेष आज्ञा द्वारा उन मामलों को चिन्हित कर दे जिनमें उसकी सहमति पहले से दी हुई मानी जाएगी।
प्रश्न 3: "प्रत्यायोजन" शब्द का यहाँ क्या अर्थ है?
किसी शक्ति या अधिकार को अपने अधीनस्थ अधिकारी या किसी अन्य प्राधिकारी को सौंपना। नियम 3 इसे भी वित्त विभाग के परामर्श के अधीन रखता है, ताकि परोक्ष रूप से नियम की अवहेलना न हो सके।
प्रश्न 4: वित्त विभाग को कौन-से मामले भेजे जाने चाहिए?
1972 के निर्देश के अनुसार सामान्यतः केवल दो प्रकार के — (1) जिनमें वित्त विभाग की सहमति आवश्यक हो, और (2) जिनमें किन्हीं नियमों की व्याख्या करनी हो।
प्रश्न 5: शेष मामलों का क्या होगा?
उनकी संवीक्षा प्रशासनिक विभाग स्वयं राजस्थान सेवा नियमों के प्रावधानों के अनुसार करेगा और अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए निर्णय लेगा। ऐसे मामलों को वित्त विभाग भेजना आवश्यक नहीं है।
प्रश्न 6: "स्व-अंतर्विष्ट टिप्पणी" क्या होती है?
ऐसी टिप्पणी जो अपने आप में पूर्ण हो — जिसमें मामले के सम्पूर्ण तथ्यों का विवरण हो और यह भी स्पष्ट हो कि वित्त विभाग द्वारा किस बिन्दु पर कार्यवाही अपेक्षित है।
प्रश्न 7: यदि तीनों शर्तें पूरी न हों तो क्या होगा?
निर्देश स्पष्ट है — वित्त विभाग ऐसे मामले पर न विचार करेगा और न ही सहमति देगा।
प्रश्न 8: तीसरी शर्त — "औचित्य" — क्यों जोड़ी गई?
क्योंकि प्रशासनिक विभाग ऐसे मामले भी भेज रहे थे जिन्हें वे स्वयं निपटा सकते थे। अब यदि विभाग स्वयं सक्षम है, तो उसे लिखित में यह बताना होगा कि फिर भी मामला वित्त विभाग को क्यों भेजा जा रहा है।
प्रश्न 9: क्या नियम 3 के तहत कोई मामला राज्यपाल तक भी जाता है?
हाँ। नियम की अंतिम पंक्ति के अनुसार वित्त विभाग यह भी निर्धारित कर सकता है कि किन मामलों में उसकी सहमति लेने के बाद प्रशासनिक विभाग द्वारा मामले राज्यपाल को प्रस्तुत किये जायेंगे।
प्रश्न 10: यह निर्देश कब और किस आदेश से जोड़ा गया?
वित्त विभाग के परिपत्र संख्या एफ. 1(48)/विवि/(नियम)/72, दिनांक 30 अक्टूबर 1972 द्वारा।

7. संदर्भ

✍️ लेखक: सुरेंद्र सिंह चौहान
पूर्व शिक्षा अधिकारी, राजस्थान · 1991–2025 · शिक्षण, प्रशिक्षण एवं प्रशासन · परिचय
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