नियम 4, 4क एवं 4ख : संशोधन, शिथिलता एवं पुनर्विलोकन की शक्ति
विषय-सूची
1. मूल नियम का पाठ
सरकार इन नियमों के प्रावधानों को, अपने नियम बनाने या आदेश करने के अधिकारों की सीमाओं में रहते हुए, न्यायोचित व युक्तियुक्त प्रतीत होने पर, शिथिल कर सकेगी।
2. 16.7.1955 की अधिसूचना — कठिनाई निवारण
जहाँ सरकार इस बात से सन्तुष्ट हो कि राज्य कर्मचारी या ऐसे कर्मचारियों के किसी भी वर्ग की सेवा की शर्तों से सम्बन्धित किसी नियम को प्रभावी करने से किसी मामले में अनुचित कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं, तो सरकार एक विशिष्ट आज्ञा द्वारा उस नियम को उस सीमा तक एवं ऐसी शर्तों के साथ समाप्त कर सकती है या उसमें शिथिलता कर सकती है जो उस मामले को उचित एवं न्यायोचित ढंग से निपटाने के लिए आवश्यक समझा जाये।
वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 7(2) आर/55-ए, दिनांक 16.7.1955 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
3. "राज्य कर्मचारी" की परिभाषा
इस नियम में प्रयुक्त "राज्य कर्मचारी" शब्दों का तात्पर्य उन व्यक्तियों से है जिनकी सेवा की शर्तें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 309 के परन्तुक के अनुसार राजस्थान के राजप्रमुख द्वारा बनाये गये नियमों से शासित होती हैं।
4. स्पष्टीकरण — शक्ति का स्रोत एवं प्रक्रिया
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 309 के परन्तुक के अनुसार लोक सेवाओं में नियुक्त एवं राज्य के कार्यों में लगे व्यक्तियों की नियुक्ति एवं सेवा की शर्तों से सम्बन्धित नियम बनाने की शक्ति राज्यपाल में निहित है, या ऐसे अधिकारियों में है जिन्हें राज्यपाल प्राधिकृत करे। यह स्वतः सिद्ध है कि जो प्राधिकारी नियम बनाने के लिए सक्षम होता है वही उनमें संशोधन अथवा शिथिलन करने में भी सक्षम होता है।
उच्चतम राजकीय प्राधिकारी भी व्यक्तिगत मामलों में कठिनाई उत्पन्न होने पर इन सेवा नियमों के प्रावधानों में शिथिलता करने में सक्षम है, जहाँ ऐसा करना न्यायोचित हो। भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 241 की उप-धारा (5) में इस आशय के विशेष प्रावधान अन्तर्विष्ट हैं।
भारतीय संविधान में इस प्रकार के प्रावधानों को सम्मिलित नहीं किए जाने से सन्देह उत्पन्न हो गये कि इस अन्तर्निहित शक्ति का प्रयोग राज्यपाल कर सकते हैं या नहीं कर सकते। अतः किसी भी सन्देह को समाप्त करने के लिए तथा इससे सम्बन्धित स्थिति को पूर्णतया स्पष्ट करने के उद्देश्य से वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 7(5) आर/55-ए, दिनांक 16.7.1955 द्वारा एक नियम बनाया गया है जिसमें इस बारे में स्पष्ट प्रावधान किये गये हैं।
यह नियम किसी ऐसे नवीन सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं करता जो पूर्व में प्रचलित नहीं हो। केवल यह नियम उस स्थिति को ही स्पष्ट करता है जो पूर्व में प्रचलित मानी जाती रही है। राज्य सरकार को किसी विशेष मामले में न्यायोचित एवं विवेकपूर्ण ढंग से, आवश्यकता होने पर किसी नियम में शिथिलता करने की शक्ति का प्रयोग पूर्व में केवल बहुत ही कम मामलों में, अपवादस्वरूप ही, किये जाने की नीति थी।
ऐसे मामलों को निपटाते समय निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही कार्यवाही की जानी होती है। किसी भी मामले में, शिथिलता सम्बन्धी कोई भी कार्यवाही करने से पूर्व सम्बन्धित प्रशासनिक विभाग द्वारा अन्य विभागों — जैसे कार्मिक विभाग / सामान्य प्रशासन विभाग और/एवं वित्त विभाग से — तथ्यों एवं परिस्थितियों के अनुसार विषयों का उल्लेख करते हुए, परामर्श एवं राय प्राप्त कर लेनी चाहिये। उसके अतिरिक्त शासन सचिवालय में इस सम्बन्ध में जो भी नियम प्रभावी हों उनकी भी अनुपालना की जानी चाहिये।
किसी भी मामले में यदि सम्बन्धित विभाग एक मत हो जाये कि यह उचित मामला है जिसमें नियमों में शिथिलता करने की शक्ति का प्रयोग सरकार द्वारा किया जाना चाहिये, तब इस प्रकार शिथिलता के कारणों को सम्बन्धित पत्रावली पर अंकित किया जाना चाहिए — किन्तु इस सम्बन्ध में सरकार द्वारा जो औपचारिक आज्ञा जारी की जाये उसमें इन कारणों का उल्लेख नहीं किया जाये।
यह भी ध्यान में रखा जाये कि सरकार द्वारा कोई भी आज्ञा, जो किसी विशिष्ट मामले में किसी नियम को निरस्त या उसमें शिथिलता देने के लिए जारी की जाती है, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 166 एवं 238 के प्रावधानों के अनुरूप राज्यपाल की आज्ञा के रूप में प्रसारित की जानी चाहिए।
राज्य कर्मचारियों की सेवा शर्तों से सम्बन्धित भविष्य में प्रसारित किये जाने वाले विशिष्ट नियमों में सामान्य रूप से यह प्रावधान रखा जाये कि इन नियमों में किसी विशेष मामले में नियमों के प्रावधानों में शिथिलता करने की शक्ति राज्यपाल को है। किन्तु शर्त यह है कि किसी भी मामले का निर्णय वर्तमान प्रावधानों के प्रतिकूल अन्य प्रकार से नहीं किया जायेगा।
वित्त विभाग के कार्यालय ज्ञापन सं. एफ. 7(5) आर/55-बी, दिनांक 16.7.1955 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
5. राजस्थान सरकार का निर्णय — अधिसूचना की सीमा
यह निर्णय किया गया है कि उपर्युक्त अधिसूचना केवल राजस्थान सेवा नियमों और यात्रा भत्ता नियम, एकीकृत वेतनमान नियम एवं समानीकृत वेतनमान नियम आदि पर ही लागू होगी, क्योंकि ये नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 309 के अन्तर्गत वित्त विभाग द्वारा जारी किए गए हैं। एवं यह अधिसूचना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 309 के अन्तर्गत सरकार के कार्मिक एवं प्रशासनिक विभागों द्वारा प्रसारित विभिन्न सेवा नियमों, जो नियुक्ति, पदोन्नति, वरिष्ठता आदि से सम्बन्धित हैं, पर प्रभावी नहीं होगी।
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 7ए(7) विवि/आर/57, दिनांक 1.7.1957 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
6. सेवानिवृत्ति आयु से जुड़े निर्णय (1967–1969)
नियम 4 की शक्ति का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रयोग सेवानिवृत्ति आयु 58 से 55 वर्ष किये जाने के समय हुआ। नीचे वे निर्णय मूल रूप में दिये गये हैं।
राजस्थान सेवा नियमों के नियम 4 द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए, राज्यपाल महोदय ने आज्ञा दी है कि राज्य कर्मचारी जो 55 वर्ष या इससे अधिक आयु के हैं एवं जो 58 के स्थान पर 55 वर्ष की आयु पर सेवानिवृत्त किये जाने के परिणामस्वरूप 1.7.1967 से सेवानिवृत्त होते हों, उनकी निम्नलिखित रूप में काल्पनिक (नोशनल) सेवा के अतिरिक्त वर्षों को ध्यान में रखकर 1.7.1967 को प्रभावी नियमों के अनुसार सेवानिवृत्ति के लाभों को स्वीकृत किया जायेगा :
(1) सेवानिवृत्ति के लाभों को पेंशन योग्य सेवा में तीन वर्ष काल्पनिक सेवा के रूप में जोड़कर बढ़ाया जाना चाहिए।
(2) काल्पनिक सेवा की उक्त वृद्धि को जोड़ने पर कर्मचारी की कुल सेवा अवधि किसी भी दशा में उस सेवा अवधि से अधिक नहीं होगी जिसका सम्बन्धित कर्मचारी 58 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होने पर अधिकारी हो सकता था।
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 1(42) विवि (व्यय-नियम)/67-III, दिनांक 13.6.1967 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
जहाँ उक्त अनुच्छेद 1 के अनुसार सेवानिवृत्ति लाभों के लिए पेंशन योग्य सेवा बढ़ा दी गई है, वहाँ नियम 250 के साथ पठित नियम 250 में परिभाषित कुल पारिश्रमिक — जो राज्य कर्मचारियों को 1.7.1967 से तुरन्त पूर्व प्राप्त हो रहे थे — अतिरिक्त काल्पनिक सेवा की अवधि में उनके द्वारा प्राप्त की हुई समझी जायेगी (यद्यपि उन्होंने वास्तव में वह प्राप्त नहीं किया), तथा नियम 251 के अनुसार औसत कुल पारिश्रमिक की राशि इस प्रकार बताई गई काल्पनिक कुल पारिश्रमिक की राशि के आधार पर की जायेगी।
उक्त अनुच्छेद 2 में वर्णित किसी प्रावधान के होते हुए भी राज्य कर्मचारी की पेंशन 1.7.1967 से पूर्व उसकी सेवा के अन्तिम तीन वर्षों में उसके द्वारा वास्तव में प्राप्त 'पारिश्रमिक' के आधार पर निश्चित की जायेगी, यदि वे पारिश्रमिक उपरोक्त अनुच्छेद 2 के अनुसार परिकलित की गई पारिश्रमिक की राशि से अधिक हों।
यह आज्ञा दिनांक 1.7.1967 से प्रभावी होगी। अन्य प्रकार से निर्णय किये गये मामलों पर भी पुनः विचार किया जायेगा तथा उन पर इस आज्ञा के आधार पर ही निर्णय लिया जायेगा।
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 1(42) विवि (व्यय-नियम)/67-I, दिनांक 30.9.1967 द्वारा प्रतिस्थापित।
यह आज्ञा दी जाती है कि जो कर्मचारी 1.7.1967 को या उसके पश्चात् किन्तु 30.6.1970 के पूर्व 55 वर्ष की आयु के हो जाने पर सेवानिवृत्त होते हैं / हो गये हैं, उनको राजस्थान सेवा नियमों के सामान्य प्रावधानों के अनुसार भुगतान होने वाली पेंशन राशि अथवा ग्रेच्युटी की राशि, यदि उन पेंशन सम्बन्धी लाभों की राशि से कम आती हो जो — यदि वह कर्मचारी दिनांक 1.7.1967 को सेवानिवृत्त होता तो — उसे यथासंशोधित वित्त विभाग के आदेश दिनांक 13.6.1967 के अधीन स्वीकार होती, तो उसे यथासंशोधित आदेश के अनुसार पेंशन एवं ग्रेच्युटी के लाभ का लाभ दिया जाय।
इस आज्ञा के जारी किये जाने से पूर्व अन्यथा प्रकार से निपटाये गये पेंशन के मामलों पर पुनः विचार किया जायेगा तथा उन्हें इस आज्ञा के अनुसार तय किया जायेगा।
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 1(42) विवि (व्यय-नियम)/67-II, दिनांक 30.9.1967 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
विलोपित।
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 1(99) विवि/नियम/66, दिनांक 27.12.1969 द्वारा अन्तःस्थापित; एवं वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(50) विवि/ग्रुप-2/75, दिनांक 27.9.1975 द्वारा विलोपित — 2.9.1975 से प्रभावी।
यह आदेश दिया जाता है कि चतुर्थ श्रेणी सेवा के किसी सरकारी कर्मचारी को, जो अधिवार्षिता आयु प्राप्त करने पर 1.12.1969 को या उसके पश्चात् किन्तु 31.12.1971 तक सेवानिवृत्त होता है, निम्नलिखित रूप में काल्पनिक सेवा के अतिरिक्त वर्षों को विचार में लेने के पश्चात्, सेवानिवृत्ति के समय विद्यमान नियमों के अनुसार संगणित सेवानिवृत्ति फायदे अनुदान किये जायेंगे :—
I. पेंशन नियमों द्वारा नियमित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के लिए
(1) सेवानिवृत्ति लाभों के लिए पेंशन योग्य सेवा में दो वर्ष की वृद्धि की जानी चाहिए।
(2) उक्त प्रकार काल्पनिक सेवा जोड़ने पर सेवा की कुल अवधि किसी भी स्थिति में उस अवधि से अधिक नहीं होगी जो सम्बन्धित राज्य कर्मचारी 60 वर्ष की आयु का होने पर सेवानिवृत्त होने के कारण गणना करा सकता था।
(3) जहाँ सेवानिवृत्ति के लाभों के लिये पेंशन योग्य सेवा उक्त (1) अथवा (2) के अनुसार बढ़ाई जाये, वहाँ राजस्थान सेवा नियम 250-ख में परिभाषित कुल वेतनादि की राशि — जो कर्मचारी अपनी सेवानिवृत्ति से तुरन्त पूर्व प्राप्त कर रहा था — को उक्त नियमों के नियम 251 के अनुसार अतिरिक्त काल्पनिक सेवा की अवधि में कर्मचारी द्वारा प्राप्त की गई मानी जायेगी (यद्यपि वास्तव में वह प्राप्त नहीं की गई), तथा नियम 251 के अनुसार औसत वेतनादि की राशि उक्त काल्पनिक वेतनादि की राशि के आधार पर परिकलित की जायेगी।
(4) उपर्युक्त (3) में किसी प्रावधान के होते हुए भी सम्बन्धित राज्य कर्मचारी को पेंशन, सेवानिवृत्ति से पूर्व उसकी सेवा के अन्तिम तीन वर्षों की अवधि में उसके द्वारा वास्तव में प्राप्त पारिश्रमिक की राशि के आधार पर निश्चित की जायेगी, यदि वह उपर्युक्त (3) के अनुसार स्वीकार्य पेंशन से अधिक होती हो।
II. अंशदायी भविष्य निधि स्कीम द्वारा नियमित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए
इस सेवा के राज्य कर्मचारी को उसकी सेवानिवृत्ति के दिन जोधपुर भविष्य निधि एवं उपदान नियमों के अनुसार उसके काल्पनिक सेवा के अतिरिक्त वर्षों को जोड़ने के उपरान्त भविष्य निधि के लाभ निम्न प्रकार दिये जायेंगे :
(1) राजकीय अंशदान (लाभांश एवं विशेष अंशदान) उस राशि तक बढ़ाया जाना चाहिए जो दो वर्षों की अतिरिक्त काल्पनिक सेवा जोड़े जाने के पश्चात् देय होती।
(2) उपर्युक्त प्रक्रिया के अनुसार की गई वृद्धि किसी भी दशा में उस अंशदान (लाभांश एवं विशेष अंशदान) से अधिक नहीं होगी जो वह कर्मचारी 60 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर अपने भविष्य निधि लेखे में जमा करा सकता था।
(3) काल्पनिक अंशदान, सेवानिवृत्ति से तुरन्त पूर्व की अंशदान की राशि पर, उसकी सेवानिवृत्ति के दिनांक को या उसके पश्चात् तक भविष्य निधि में अंशदान किए बिना ही बढ़ाया जायेगा।
वित्त विभाग का आदेश सं. एफ. 1(80) विवि (नियम)/69-I, दिनांक 27.12.1969 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
7. नियम 4 की व्याख्या
अध्याय 1 के पहले तीन नियम ढाँचा खड़ा करते हैं — नाम, दायरा, और वित्त विभाग की सहमति। नियम 4 उस ढाँचे में लचीलापन डालता है।
कोई भी नियम-संहिता चाहे कितनी सावधानी से बनी हो, कुछ मामले ऐसे निकल आते हैं जहाँ नियम का अक्षरशः पालन अन्याय कर देता है। नियम 4 उन्हीं मामलों के लिए है।
तीन शर्तें जो नियम स्वयं लगाता है
- अधिकारों की सीमा में — सरकार वही शिथिलता कर सकती है जो उसके नियम बनाने की शक्ति के भीतर हो।
- न्यायोचित — निर्णय न्याय के अनुरूप हो।
- युक्तियुक्त — निर्णय तर्कसंगत हो, मनमाना न हो।
यह शक्ति नई नहीं है
1955 का स्पष्टीकरण एक रोचक बात कहता है — यह नियम कोई नया सिद्धान्त नहीं गढ़ रहा, केवल पहले से मानी जा रही स्थिति को लिखित कर रहा है। तर्क सरल है: जो प्राधिकारी नियम बना सकता है, वही उसमें संशोधन या शिथिलता भी कर सकता है। यह शक्ति भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 241(5) में स्पष्ट लिखी थी; संविधान में वैसा स्पष्ट प्रावधान न होने से सन्देह उठे, और उन्हें मिटाने के लिए 16.7.1955 को यह नियम बनाया गया।
प्रक्रिया — चार चरण
- प्रशासनिक विभाग तथ्य एवं परिस्थितियाँ स्पष्ट करते हुए कार्मिक/सामान्य प्रशासन विभाग तथा वित्त विभाग से परामर्श ले।
- सहमति बनने पर शिथिलता के कारण पत्रावली पर अंकित किये जाएँ।
- औपचारिक आज्ञा में वे कारण न लिखे जाएँ।
- आज्ञा अनुच्छेद 166 एवं 238 के अनुरूप राज्यपाल की आज्ञा के रूप में प्रसारित हो।
कारण पत्रावली पर, आज्ञा में नहीं — ऐसा क्यों?
यदि औपचारिक आज्ञा में कारण लिख दिये जाएँ, तो वह आज्ञा एक नज़ीर (precedent) बन जाती है — और सैकड़ों कर्मचारी उसी आधार पर समान छूट माँगने लगते हैं। शिथिलता अपने स्वभाव से व्यक्ति-विशेष एवं परिस्थिति-विशेष होती है, अतः उसे नज़ीर बनने से रोका जाता है। दूसरी ओर कारण पत्रावली पर अंकित होने से जवाबदेही बनी रहती है — लेखा परीक्षा तथा न्यायिक पुनर्विलोकन के समय यह देखा जा सकता है कि निर्णय मनमाना नहीं था।
1967 के निर्णय — नियम 4 का ऐतिहासिक प्रयोग
1967 में राज्य ने सेवानिवृत्ति आयु 58 से घटाकर 55 वर्ष कर दी। इससे उन कर्मचारियों को सीधा नुकसान होता जो 55 पार कर चुके थे — उनकी पेंशन योग्य सेवा अचानक तीन वर्ष घट जाती। नियमों में इसका कोई उपचार नहीं था।
यहीं नियम 4 काम आया। राज्यपाल ने नियम 4 की शक्ति से आदेश दिया कि ऐसे कर्मचारियों की पेंशन योग्य सेवा में तीन वर्ष काल्पनिक (नोशनल) सेवा जोड़ी जाए — यानी वे वर्ष जो उन्होंने वास्तव में सेवा नहीं की, पर पेंशन गणना हेतु किये हुए माने जाएँ। 1969 में यही सिद्धान्त चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों पर लागू किया गया, जहाँ अधिवर्षिता आयु 60 वर्ष थी — उन्हें दो वर्ष काल्पनिक सेवा दी गई।
दोनों निर्णयों में एक समान सुरक्षा-कवच है — यदि काल्पनिक पारिश्रमिक के आधार पर बनने वाली पेंशन, वास्तविक अन्तिम तीन वर्षों के पारिश्रमिक से बनने वाली पेंशन से कम बैठे, तो अधिक वाली ही दी जाएगी।
8. नियम 4क का मूल पाठ
राज्य सरकार वेतन एवं भत्ते, अवकाश और पेंशन सम्बन्धी नियमों में समय-समय पर संशोधन करने का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखती है।
किसी अधिकारी के वेतन एवं भत्ते उन्हें अर्जित करते समय प्रभावी नियमों से शासित होंगे।
इसी प्रकार अवकाशों का अधिकार अवकाश हेतु आवेदन करने एवं उनकी स्वीकृति के समय प्रभावी नियमों से शासित होगा।
पेंशन का अधिकार कर्मचारी/अधिकारी द्वारा सेवा से मुक्त होने की दिनांक को प्रभावी नियमों से नियमित होगा।
वित्त विभाग के आदेश सं. 4068/एफ. 1(99) आर/56, दिनांक 31.8.1956 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
9. राजस्थान सरकार का निर्णय
किसी विशिष्ट कार्यालय या विभाग में की गई सेवा पेंशन के योग्य है अथवा नहीं, यह प्रश्न उन्हीं नियमों द्वारा तय किया जायेगा जो उसके द्वारा की गई सेवा के समय प्रभावी थे। उसके पश्चात् जिस सेवा को पेंशन योग्य नहीं माने जाने के आदेश प्रसारित हुए हैं, वे आदेश उससे पूर्व में की गई सेवा पर लागू नहीं होंगे।
राजस्थान राज्य में विलीन देशी रियासतों के कर्मचारी जो राजस्थान सरकार की सेवा में एकीकृत हो चुके हैं, उनके द्वारा एकीकरण से पूर्व देशी राज्य में स्थायी एवं अस्थायी रूप में की गई सेवा को राजस्थान सेवा नियमों के अन्तर्गत स्थायी/अस्थायी सेवा माना जायेगा। राजस्थान सरकार द्वारा ठिकानों से लिये गये कर्मचारियों के मामले सरकार की पृथक् आज्ञा से नियमित होंगे।
वित्त विभाग के आदेश सं. 4068/एफ. 1(99) आर/56, दिनांक 31.8.1956 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
10. स्पष्टीकरण
जहाँ किसी देशी राज्य के नियमों के अनुसार किसी कर्मचारी का कोई सेवा काल विशेष रूप से पेंशन योग्य नहीं समझा गया एवं सरकार की किसी विशिष्ट आज्ञा द्वारा उसे पेंशन के योग्य घोषित कर दिया हो, तो वह सेवा निम्न प्रकार पेंशन के योग्य समझी जायेगी :
(i) जहाँ देशी राज्य के नियमों के अनुसार कोई पद पेंशन के योग्य नहीं था, किन्तु यदि वही पद राजस्थान सेवा नियमों के अनुसार पेंशन के योग्य घोषित कर दिया गया हो, तो दिनांक 1.4.1951 से पूर्व की सेवा अवधि को राजस्थान सेवा नियमों के अनुसार पेंशन के योग्य नहीं समझा जायेगा।
(ii) जहाँ देशी राज्य के नियमों के अनुसार कोई सेवा पेंशन योग्य थी, किन्तु मत्स्य राज्य अथवा पूर्व राजस्थान के सिविल सेवा नियमों के अनुसार पेंशन के अयोग्य कर दी गई तथा पुनः राजस्थान सेवा नियमों के अनुसार पेंशन के योग्य हो गई हो, तो दोनों पेंशन योग्य सेवाओं के मध्य की सेवा को पेंशन योग्य ही माना जाना चाहिए — क्योंकि मध्यवर्ती सरकारों की ऐसी मंशा नहीं हो सकती थी कि उन कर्मचारियों को उनकी पेंशन की सुविधाओं से वंचित कर दिया जाये।
11. नियम 4क की व्याख्या
नियम 4क एक ऐसे प्रश्न का उत्तर देता है जो सेवा-विधि में लगातार उठता है — जब नियम बदलते रहते हैं, तो किसी अधिकार पर कौन-सा नियम लागू होगा? पुराना, जो नियुक्ति के समय था? या नया, जो आज है?
नियम 4क तीनों विषयों के लिए तीन अलग-अलग "प्रासंगिक तिथि" तय करता है :
| विषय | कौन-सा नियम लागू होगा |
|---|---|
| वेतन एवं भत्ते | जो उन्हें अर्जित करते समय प्रभावी था |
| अवकाश | जो आवेदन एवं स्वीकृति के समय प्रभावी था |
| पेंशन | जो सेवा से मुक्त होने की दिनांक को प्रभावी था |
यह व्यवस्था तार्किक क्यों है
वेतन प्रत्येक माह अर्जित होता है, इसलिए उस माह का नियम चलता है। अवकाश एक घटना है — आवेदन और स्वीकृति; उस घटना के समय का नियम चलता है। पेंशन सेवा के अन्त में एक बार निर्धारित होती है, इसलिए सेवामुक्ति की तिथि का नियम चलता है।
पेंशन योग्यता — भूतलक्षी प्रभाव पर रोक
नियम 4क के अन्तर्गत निर्णय एक महत्वपूर्ण संरक्षण देता है। कोई सेवा पेंशन योग्य है या नहीं, यह उसी समय के नियमों से तय होगा जब वह सेवा की गई थी। यदि बाद में कोई आदेश आकर किसी सेवा को पेंशन-अयोग्य घोषित कर दे, तो वह आदेश पीछे जाकर पहले की सेवा पर लागू नहीं होगा।
यह सिद्धान्त रियासतों के विलय के सन्दर्भ में विशेष महत्वपूर्ण था। स्पष्टीकरण का खण्ड (ii) एक ऐसी ही उलझन सुलझाता है — जहाँ किसी सेवा को देशी राज्य में पेंशन योग्य माना गया, बीच में मत्स्य राज्य या पूर्व राजस्थान के नियमों से अयोग्य कर दिया गया, और फिर RSR में पुनः योग्य हो गया — वहाँ बीच की अवधि भी पेंशन योग्य मानी जाएगी। तर्क यह है कि मध्यवर्ती सरकारों की मंशा कर्मचारियों को पेंशन से वंचित करने की नहीं हो सकती थी।
12. नियम 4ख का मूल पाठ
(क) सरकार लोक हित में इन नियमों के अन्तर्गत की गयी किसी कार्रवाई का या इन नियमों के अधीन पारित किसी आदेश का पुनर्विलोकन करने तथा अपने अधीनस्थ प्राधिकारियों को इस सम्बन्ध में निदेश देने की शक्ति अपने स्वयं के पास आरक्षित रखती है। साधारणतया, पुनर्विलोकन तथ्यों के सरकार के ध्यान में आने की तारीख से 90 दिनों के भीतर किया जाएगा।
(ख) पुनर्विलोकन ऐसे कुछ नये / महत्त्वपूर्ण तथ्य (तथ्यों) / साक्ष्य (साक्ष्यों) पर किया जाएगा जो ऐसी कार्रवाई करने के या ऐसा आदेश पारित करने के समय सरकार के ध्यान में नहीं थे; या जब गलत तथ्यों पर ऐसी कार्रवाई-आदेश की गयी थी / पारित किया गया था; या ऐसा पुनर्विलोकन करने के लिए कोई अन्य पर्याप्त कारण हों।
वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(5) विवि/नियम/96, दिनांक 26.2.2002 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया।
13. राजस्थान सरकार का निर्णय — फायदा प्रत्याहरण से पूर्व सुनवाई
हमारे ध्यान में यह आया है कि कई बार किसी सरकारी कर्मचारी को मंजूर किया गया फायदा — विधिक स्थिति या नीति में परिवर्तन, या सुसंगत नियमों के प्रावधानों के गलत लागू हो जाने के कारण — तत्पश्चात् प्रत्याहत किये जाने के आदेश दिये जाते हैं। कई बार ऐसे फायदे भूतलक्षी प्रभाव से प्रत्याहत किये जाते हैं।
ऐसी कार्रवाई से प्रभावित कर्मचारी को कई आधारों पर शिकायत होती है। किन्तु एक अत्यधिक सामान्य आधार, जो कई न्यायालय निर्णयों और अधिकरण निर्णयों से सामने आया है, उस मनमानी रीति से संबंधित होता है जिससे फायदे प्रत्याहत किये जाते हैं। न्यायालयों ने संप्रेक्षित किया है कि ऐसा फायदा प्रत्याहत करने का आदेश करने से पूर्व न तो कर्मचारी को नोटिस दिया गया है और न ही उसको अपनी बात कहने का अवसर प्रदान किया गया है।
इसलिए सभी नियंत्रक प्राधिकारियों को व्यादिष्ट किया जाता है कि किसी कर्मचारी को सही या गलत मंजूर किया गया कोई भी फायदा उसको सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् ही प्रत्याहत किया जाये — जो न्याय के सिद्धान्त की मांग भी है। इसमें ऐसे फायदों का प्रत्याहरण भी सम्मिलित होगा जो संपरीक्षा आक्षेप के कारण आदिष्ट किया जा सकता है, या सरकार द्वारा नये परिपत्र या नीतिगत विनिश्चय में संशोधन के कारण आदिष्ट किया जा सकता है।
यदि नियंत्रक अधिकारी की ओर से किसी गलती के कारण सरकार को वित्तीय हानि होती है, तो ऐसे अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराया जायेगा।
14. नियम 4ख की व्याख्या
नियम 4ख अध्याय 1 का सबसे नया प्रावधान है — 26.2.2002 को जोड़ा गया। इसका उद्देश्य नियम 4 से भिन्न है। नियम 4 भविष्य के लिए छूट देता है; नियम 4ख बीत चुके निर्णयों को दुबारा देखने की शक्ति सुरक्षित रखता है।
पुनर्विलोकन के तीन आधार
- नये या महत्त्वपूर्ण तथ्य/साक्ष्य — जो निर्णय के समय सरकार के सामने नहीं थे।
- गलत तथ्यों पर आदेश — यदि निर्णय ही ग़लत आधार पर हुआ था।
- कोई अन्य पर्याप्त कारण — यह अवशिष्ट श्रेणी है, जो सरकार को विवेकाधिकार देती है।
90 दिन की समय-सीमा
नियम "साधारणतया" शब्द के साथ 90 दिन की सीमा देता है। यह शब्द महत्वपूर्ण है — सीमा निर्देशात्मक है, अनिवार्य नहीं। साथ ही ध्यान दें कि यह 90 दिन मूल आदेश की तारीख से नहीं, बल्कि तथ्य सरकार के ध्यान में आने की तारीख से गिने जाते हैं। इससे उन मामलों में भी पुनर्विलोकन सम्भव रहता है जहाँ ग़लती वर्षों बाद सामने आई।
निर्णय का व्यावहारिक महत्व — कर्मचारी के लिए सुरक्षा
नियम 4ख का जुड़ा निर्णय व्यवहार में इस पूरे नियम का सबसे उपयोगी हिस्सा है। यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्त को स्पष्ट शब्दों में सेवा-प्रशासन में उतारता है। इसका सार तीन बिन्दुओं में :
- कोई भी मंजूर किया गया फायदा वापस लेने से पूर्व कर्मचारी को नोटिस और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।
- यह बात तब भी लागू है जब फायदा ग़लती से दिया गया था — निर्णय स्पष्ट कहता है "सही या गलत मंजूर किया गया कोई भी फायदा"।
- यह संपरीक्षा (ऑडिट) आक्षेप तथा नीतिगत परिवर्तन दोनों स्थितियों में लागू है।
15. सारांश तालिका — तीनों नियम एक दृष्टि में
| बिन्दु | नियम 4 | नियम 4क | नियम 4ख |
|---|---|---|---|
| विषय | शिथिलता की शक्ति | कौन-सा नियम लागू होगा | पुनर्विलोकन की शक्ति |
| जोड़ा गया | मूल नियम (अधिसूचना 16.7.1955) | 31.8.1956 | 26.2.2002 |
| दिशा | भविष्य हेतु छूट | समय-निर्धारण | अतीत के आदेश की समीक्षा |
| शक्ति किसके पास | सरकार / राज्यपाल | राज्य सरकार (संशोधन का अधिकार) | सरकार (स्वयं आरक्षित) |
| समय-सीमा | निर्धारित नहीं | लागू नहीं | साधारणतया 90 दिन |
| प्रमुख संरक्षण | कारण पत्रावली पर अंकित | भूतलक्षी प्रभाव पर रोक | प्रत्याहरण से पूर्व सुनवाई |
नियम 4 — विस्तृत सार
| बिन्दु | प्रावधान |
|---|---|
| शर्त 1 | सरकार के नियम बनाने/आदेश करने के अधिकारों की सीमा में |
| शर्त 2 | न्यायोचित प्रतीत होने पर |
| शर्त 3 | युक्तियुक्त प्रतीत होने पर |
| ट्रिगर | नियम लागू करने से अनुचित कठिनाई उत्पन्न होना |
| परामर्श आवश्यक | कार्मिक/सामान्य प्रशासन विभाग एवं वित्त विभाग |
| आज्ञा का स्वरूप | अनुच्छेद 166 एवं 238 के अनुरूप, राज्यपाल की आज्ञा के रूप में |
| लागू (1957 निर्णय) | RSR, यात्रा भत्ता नियम, एकीकृत एवं समानीकृत वेतनमान नियम |
| लागू नहीं | नियुक्ति, पदोन्नति, वरिष्ठता सम्बन्धी सेवा नियम |
| 1967 का प्रयोग | 55 वर्ष पर सेवानिवृत्ति — 3 वर्ष काल्पनिक सेवा |
| 1969 का प्रयोग | चतुर्थ श्रेणी — 2 वर्ष काल्पनिक सेवा (सीमा 60 वर्ष) |
16. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नियम 4 से सम्बन्धित
नियम 4क से सम्बन्धित
नियम 4ख से सम्बन्धित
17. संदर्भ
- राजस्थान सेवा नियम — वित्त विभाग, राजस्थान सरकार (PDF)
- भारतीय संविधान, अनुच्छेद 309 — Indian Kanoon
- वित्त विभाग, राजस्थान सरकार — आधिकारिक वेबसाइट
- राजस्थान सरकार — rajasthan.gov.in


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