नियम 5 एवं 6 : शक्तियों का प्रदत्तीकरण एवं व्याख्या
विषय-सूची
1. मूल नियम का पाठ
सरकार अपने अधिकारियों को ऐसी शर्तों के आधार पर, जिन्हें वह लगाना उचित समझे, इन नियमों के अन्तर्गत निम्नांकित अपवादों के साथ अपनी शक्तियाँ प्रदत्त कर सकती है :
(क) नियम बनाने की सम्पूर्ण शक्तियाँ,
(ख) अन्य शक्तियाँ जो नियम 5, 42, 56(क), 81, 1[ ] 2[ ] 2[ ], 148, 151 एवं 157(ग) द्वारा प्रदत्त की गई हों।
पाद-टिप्पणियाँ:
1. वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 16(4) विवि-क (नियम)/60 और एफ. 1(37) विवि-क (नियम)/61, दिनांक 31.3.1961 और 18.12.1961 द्वारा अंक "99" लोपित किया गया, जो 21.4.1960 से प्रभावी हुआ।
2. वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(66) विवि (ग्रुप-2)/85, दिनांक 30.12.1985 द्वारा अंक "135, 140" लोपित किये गये। 1.4.1981 से प्रभावी।
2. लोपित नियम संख्याएँ — खाली कोष्ठक का अर्थ
मूल पुस्तिका में खण्ड (ख) की सूची के बीच तीन खाली कोष्ठक [ ] दिखाई देते हैं। ये मुद्रण की भूल नहीं हैं — ये उन नियम संख्याओं के स्थान हैं जो बाद के संशोधनों द्वारा लोपित कर दी गईं। पुस्तिका उन्हें हटाकर खाली कोष्ठक छोड़ देती है ताकि संशोधन का इतिहास पाद-टिप्पणी से पढ़ा जा सके।
| लोपित अंक | किस आदेश से | दिनांक | प्रभावी |
|---|---|---|---|
| 99 | एफ. 16(4) विवि-क (नियम)/60 तथा एफ. 1(37) विवि-क (नियम)/61 | 31.3.1961 एवं 18.12.1961 | 21.4.1960 से |
| 135 | एफ. 1(66) विवि (ग्रुप-2)/85 | 30.12.1985 | 1.4.1981 से |
| 140 | एफ. 1(66) विवि (ग्रुप-2)/85 | 30.12.1985 | 1.4.1981 से |
3. राजस्थान सरकार का निर्णय
हाल ही में सरकार के प्रशासनिक विभागों एवं विभागाध्यक्षों को — पदभार ग्रहण करने के समय (ज्वाइनिंग टाइम) में वृद्धि करने, नियुक्ति की आज्ञाओं की प्रतीक्षा के समय को ड्यूटी मानने, पुनः नियुक्ति की मंजूरी देने, आयु सीमा के प्रतिबन्ध को हटाने, और सेवा नियमों से सम्बन्धित इसी प्रकार के मामलों में — शक्तियाँ प्रदान की गई हैं।
इस सम्बन्ध में एक प्रश्न उठाया गया है कि क्या उनको दी गई शक्तियों का प्रयोग आज्ञा जारी होने की तारीख से किया जाना है, या विचाराधीन मामलों में भी प्रयोग कर निपटाया जा सकता है?
प्रश्न की जाँच कर ली गई है और यह आज्ञा दी जाती है कि प्रदत्त शक्तियों का उपयोग उनके प्रदत्तीकरण से पूर्व में उत्पन्न हुए मामलों में भी किया जा सकता है — किन्तु उन मामलों में उनका प्रयोग नहीं किया जायेगा जो पूर्व में ही सक्षम अधिकारी द्वारा निरस्त कर दिये गये हों, या जिन्हें सक्षम प्राधिकारी को पूर्व में ही विचारार्थ प्रस्तुत किया जा चुका है और उसके पास विचारार्थ लंबित हैं।
वित्त विभाग की सं. 4512/59 एफ. 6(26) विवि-क (नियम)/59, दिनांक 14.9.1959 से अन्तःस्थापित किया गया।
4. नियम 5 की व्याख्या
नियम 3 ने बताया कि शक्तियों का प्रयोग या प्रत्यायोजन वित्त विभाग के परामर्श के बिना नहीं होगा। नियम 5 उसी बात को दूसरी ओर से देखता है — सरकार अपनी शक्तियाँ अपने अधिकारियों को सौंप सकती है, पर सब नहीं।
प्रदत्तीकरण का सामान्य नियम
सरकार अपने अधिकारियों को इन नियमों के अन्तर्गत अपनी शक्तियाँ सौंप सकती है। साथ में एक लचीलापन भी है — वह ऐसी शर्तें लगा सकती है जिन्हें वह उचित समझे। यानी प्रदत्तीकरण पूर्ण भी हो सकता है और सशर्त भी; किसी सीमा तक भी हो सकता है और किसी विशेष प्रकार के मामलों तक सीमित भी।
दो अपवाद — जो सौंपे नहीं जा सकते
अपवाद (क) — नियम बनाने की सम्पूर्ण शक्तियाँ। यह सबसे बुनियादी सीमा है। सरकार किसी अधिकारी को यह अधिकार नहीं दे सकती कि वह इन नियमों में स्वयं नये नियम बना दे। नियम बनाने की शक्ति अनुच्छेद 309 से आती है और राज्यपाल में निहित है — उसे नीचे नहीं उतारा जा सकता।
अपवाद (ख) — विशिष्ट नियमों द्वारा प्रदत्त शक्तियाँ। कुछ नियम ऐसे हैं जिनकी शक्ति सरकार के स्तर पर ही रहनी चाहिए। वर्तमान सूची में ये हैं — नियम 5, 42, 56(क), 81, 148, 151 एवं 157(ग)।
1959 का निर्णय — भूतलक्षी प्रयोग
यह निर्णय एक व्यावहारिक प्रश्न सुलझाता है, और इसका प्रभाव आज भी हर विभाग में दिखता है।
मान लीजिए किसी विभागाध्यक्ष को 1 जनवरी को ज्वाइनिंग टाइम बढ़ाने की शक्ति दी गई। उसके पास ऐसे 20 मामले पड़े हैं जो दिसम्बर में उत्पन्न हुए थे। प्रश्न यह उठा — क्या वह उन पुराने मामलों में भी नई शक्ति का प्रयोग कर सकता है, या केवल 1 जनवरी के बाद के मामलों में?
सरकार का उत्तर स्पष्ट है: हाँ, पुराने मामलों में भी। शक्ति प्रदत्त होते ही वह लंबित मामलों पर भी चल जाएगी। इससे फाइलें बेवजह ऊपर नहीं भेजनी पड़तीं।
पर दो अपवाद हैं :
- निरस्त मामले — जो पहले ही सक्षम अधिकारी द्वारा निरस्त हो चुके हैं, उन्हें नई शक्ति से दुबारा नहीं खोला जाएगा। एक बार निर्णय हो चुका, तो वह अन्तिम है।
- ऊपर लंबित मामले — जो पहले ही सक्षम प्राधिकारी के पास विचारार्थ भेजे जा चुके हैं और वहाँ लंबित हैं, उनमें अब निचला अधिकारी हस्तक्षेप नहीं करेगा। एक ही मामले पर दो प्राधिकारी समानान्तर निर्णय न दें — यही इसका उद्देश्य है।
निर्णय में गिनाये गये मामले
निर्णय स्वयं उदाहरण देता है कि किस प्रकार की शक्तियाँ प्रशासनिक विभागों एवं विभागाध्यक्षों को दी गई थीं :
- पदभार ग्रहण करने के समय (ज्वाइनिंग टाइम) में वृद्धि
- नियुक्ति की आज्ञाओं की प्रतीक्षा के समय को ड्यूटी मानना
- पुनः नियुक्ति की मंजूरी देना
- आयु सीमा के प्रतिबन्ध को हटाना
- सेवा नियमों से सम्बन्धित इसी प्रकार के अन्य मामले
5. मूल नियम का पाठ
इन नियमों की व्याख्या करने का अधिकार राजस्थान के राज्यपाल के पास सुरक्षित है।
6. नियम 6 की व्याख्या
राजस्थान सेवा नियमों का सबसे छोटा नियम — एक पंक्ति। किन्तु इसका प्रभाव पूरी संहिता पर पड़ता है।
इसका व्यावहारिक अर्थ
किसी भी नियम-संहिता में शब्दों के अर्थ पर विवाद उठते हैं। "कर्तव्य" में क्या-क्या आएगा? "वेतन" में कौन-से भत्ते शामिल हैं? "अनुपस्थिति" कब से गिनी जाएगी? ऐसे प्रश्नों पर अलग-अलग विभाग अलग-अलग राय बना सकते हैं — और तब एक ही नियम राज्य में अलग-अलग जगह अलग-अलग तरह लागू होने लगेगा।
नियम 6 इसी बिखराव को रोकता है। यह कहता है कि नियमों का प्रामाणिक अर्थ बताने का अधिकार केवल राज्यपाल के पास है। कोई विभागाध्यक्ष, कोई कार्यालयाध्यक्ष, कोई नियंत्रक अधिकारी अपनी व्याख्या को बाध्यकारी नहीं बना सकता।
नियम 3 के साथ जोड़कर पढ़ें
नियम 6 अकेला पढ़ने पर अधूरा लगता है — यह तो बता देता है कि व्याख्या का अधिकार किसके पास है, पर यह नहीं बताता कि व्याख्या माँगी कैसे जाए। उसका उत्तर नियम 3 में है।
नियम 3 का निर्देश स्पष्ट कहता है कि वित्त (नियम) विभाग को केवल दो प्रकार के मामले भेजे जाने चाहिए — जिनमें वित्त विभाग की सहमति आवश्यक हो, और जिनमें किन्हीं नियमों की व्याख्या करनी हो।
नियम 6 — व्याख्या का अन्तिम अधिकार राज्यपाल के पास।
नियम 3 — व्याख्या का प्रश्न वित्त (नियम) विभाग के माध्यम से जाएगा।
व्यवहार में इसीलिए RSR की व्याख्या से जुड़े स्पष्टीकरण वित्त विभाग के परिपत्रों के रूप में जारी होते हैं।
व्याख्या और शिथिलता में अन्तर
दोनों को मिला देना आम भूल है, पर ये अलग चीज़ें हैं :
| बिन्दु | व्याख्या (नियम 6) | शिथिलता (नियम 4) |
|---|---|---|
| क्या होता है | नियम का अर्थ स्पष्ट किया जाता है | नियम का प्रवर्तन किसी मामले में रोका जाता है |
| नियम बदलता है? | नहीं — जो अर्थ था, वही स्पष्ट होता है | नहीं — पर उस मामले में लागू नहीं होता |
| प्रभाव | सामान्यतः सभी समान मामलों पर | केवल उसी विशिष्ट मामले पर |
| अधिकार किसके पास | राज्यपाल | सरकार (राज्यपाल की आज्ञा के रूप में) |
7. अध्याय 1 का सम्पूर्ण सार
अध्याय 1 · प्रारम्भिक — आठ नियम
इस अध्याय के साथ राजस्थान सेवा नियमों का प्रारम्भिक ढाँचा पूरा होता है। ये आठ नियम बताते हैं कि संहिता क्या है, किस पर चलेगी, कौन इसे संचालित करेगा, और आवश्यकता पड़ने पर इसमें कहाँ लचीलापन है।
| नियम | विषय | सार |
|---|---|---|
| नियम 1 | संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ | नाम "राजस्थान सेवा नियम"; 1 अप्रैल 1951 से प्रवृत्त |
| नियम 2 | लागू होने की सीमा | तीन श्रेणियों पर लागू; नौ श्रेणियाँ अपवाद |
| नियम 3 | वित्त विभाग की सहमति | परामर्श बिना शक्ति का प्रयोग या प्रत्यायोजन नहीं |
| नियम 4 | परिवर्तित या संशोधित करने की शक्ति | न्यायोचित एवं युक्तियुक्त होने पर शिथिलता |
| नियम 4क | वेतन, अवकाश एवं पेंशन पर लागू नियम | अर्जन / आवेदन / सेवामुक्ति — तीन प्रासंगिक तिथियाँ |
| नियम 4ख | पुनर्विलोकन करने की शक्ति | 90 दिन; फायदा प्रत्याहरण से पूर्व सुनवाई अनिवार्य |
| नियम 5 | अधिकारों/शक्तियों का प्रदत्तीकरण | प्रदत्तीकरण सम्भव, दो अपवादों के साथ |
| नियम 6 | व्याख्या | व्याख्या का अधिकार राज्यपाल के पास सुरक्षित |
अध्याय 1 का तर्क-क्रम
इन आठ नियमों को क्रम से पढ़ें तो एक साफ़ तर्क दिखता है :
- पहचान — नियम 1 बताता है यह संहिता क्या कहलाएगी और कब से चलेगी।
- दायरा — नियम 2 बताता है यह किन पर चलेगी और किन पर नहीं।
- नियंत्रण — नियम 3 वित्त विभाग को द्वारपाल बनाता है।
- लचीलापन — नियम 4 कठिन मामलों में छूट का रास्ता देता है।
- समय-निर्धारण — नियम 4क तय करता है कि कौन-सा नियम कब लागू होगा।
- सुधार — नियम 4ख बीत चुके निर्णय दुबारा देखने की शक्ति रखता है।
- वितरण — नियम 5 बताता है शक्तियाँ कहाँ तक नीचे जा सकती हैं।
- अन्तिम शब्द — नियम 6 व्याख्या का अधिकार राज्यपाल के पास रखता है।
इसके आगे के अध्याय विषय-आधारित हैं — परिभाषाएँ, नियुक्ति, वेतन, अवकाश, स्थानान्तरण, पेंशन इत्यादि। किन्तु उन सबका आधार यही अध्याय 1 है, क्योंकि हर विवाद अन्ततः इन्हीं आठ नियमों में से किसी न किसी पर लौटता है।
8. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
9. संदर्भ
- राजस्थान सेवा नियम — वित्त विभाग, राजस्थान सरकार (PDF)
- भारतीय संविधान, अनुच्छेद 309 — Indian Kanoon
- वित्त विभाग, राजस्थान सरकार — आधिकारिक वेबसाइट
- राजस्थान सरकार — rajasthan.gov.in


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
कृपया टिप्पणी करते समय मर्यादित भाषा का प्रयोग करें। किसी भी प्रकार का स्पैम, अपशब्द या प्रमोशनल लिंक हटाया जा सकता है। आपका सुझाव हमारे लिए महत्वपूर्ण है!