नियम 7 : परिभाषाएँ
परिभाषा सूचकांक
नियम 7 — प्रारम्भिक वाक्य
जब तक किसी विषय अथवा प्रसंग में अन्यथा रूप से कहीं स्पष्ट नहीं कर दिया गया हो, इस अध्याय में इन नियमों में प्रयुक्त शब्दों का अर्थ निम्न प्रकार माना जायेगा :
परिभाषाएँ
जब किसी राज्य कर्मचारी का विशिष्ट आयु को प्राप्त करने पर सेवानिवृत्ति, पदावनति या अवकाश पर रहना आवश्यक हो, तो जिस दिन वह कर्मचारी विशिष्ट आयु प्राप्त करता है, वह "अकार्य दिवस" माना जाता है, एवं कर्मचारी का उस दिन से सेवा, पदावनति या यथास्थिति अवकाश पर रहना समाप्त हो जाना चाहिये।
यदि किसी राज्य कर्मचारी को अपनी वास्तविक जन्म-तिथि ज्ञात नहीं हो, तो सामान्य वित्तीय एवं लेखा नियमों के पैरा 63 के अनुसार जन्म तारीख ज्ञात करने की प्रक्रिया निम्न प्रकार अपनाई जानी चाहिए :
(1) यदि कोई कर्मचारी अपनी वास्तविक जन्म दिनांक नहीं बताकर केवल अपने जन्म का वर्ष, या वर्ष एवं माह ही बता सके, तो उसकी जन्म तारीख क्रमशः उस वर्ष की एक जुलाई अथवा उस माह की 16 तारीख समझी जायेगी।
(2) यदि वह केवल अपनी सम्भावित आयु ही बता पाये, तो उसकी जन्म-तारीख, उसकी नियुक्ति के दिनांक से उसका सेवा-काल सम्भावित आयु में से काट कर, निश्चित की जानी चाहिये।
ऐसे मामले, जिनमें जन्म-तारीख नियुक्ति या अन्य प्रकार से प्रमाणित आयु से कम की गई है, पर पुनः विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं।
टिप्पणी (2) — विलोपित।
वि.वि. की अधिसूचना सं. एफ. 1(27) वित्त विभाग/(ग्रुप-2)/78, दिनांक 24.1.1979 द्वारा विलोपित — जो नियुक्ति 'क' विभाग के परिपत्र सं. एफ. 8(33) नियुक्ति (क)/55, दिनांक 28.4.1958 द्वारा अन्तःस्थापित किया गया था।
यह देखा गया है कि पर्याप्त संख्या में कर्मचारी अपना वेतन स्थिरीकरण कराने, सेवा-भंग को जुड़ाने, दो पदों पर कार्य करने के भत्ते माँगने, पूर्व प्रभाव के स्थायीकरण कराने इत्यादि की माँग या तो सेवानिवृत्ति होने से कुछ समय पूर्व या सेवानिवृत्ति होने के पश्चात् करते हैं। ऐसी माँगें प्रायः वे होती हैं जिन पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्णय पूर्व में ही कर दिया जाता है और कर्मचारी को सूचना दे दी जाती है।
इस विभाग के ज्ञापन क्रमांक एफ. 13(10) एफ. 11/53, दिनांक 23 दिसम्बर 1953 को निरस्त करते हुए यह आज्ञा दी जाती है कि सेवा भंग को जोड़ने, वेतन निर्धारण करने, वेतन आदि में परिवर्तन करने, जन्म तारीख में परिवर्तन करने तथा सेवा-इतिहास में परिवर्तन करने आदि की माँगों एवं आवेदनों पर सरकार द्वारा तब तक कोई विचार नहीं किया जायेगा जब तक ऐसे मामले सम्बन्धित कर्मचारी द्वारा उसके सेवानिवृत्त होने की तारीख से तीन वर्ष पूर्व प्रस्तुत नहीं किए गए हों। इस अवधि के बाद प्रस्तुत मामलों को सरसरी तौर पर ही देखकर अस्वीकार कर दिया जायेगा।
यह आज्ञा उन कर्मचारियों के लिए प्रभावी नहीं होगी जो दिनांक 31 मार्च, 1964 तक सेवानिवृत्त होने वाले हों।
निर्णय 2 — विलोपित।
वित्त विभाग के ज्ञापन सं. एफ. 1(18) विवि/ए (नियम)/61, दिनांक 28.4.1961 द्वारा प्रतिस्थापित। निर्णय 2 — वि.वि. की अधिसूचना सं. एफ. 1(27) विवि ग्रुप-2/78, दिनांक 24.1.1979 द्वारा विलोपित।
शिक्षार्थी/शिक्षु का तात्पर्य एक ऐसे व्यक्ति से है जो किसी व्यापार/व्यवसाय के कार्य पर किसी राजकीय सेवा में नियोजन के उद्देश्य से प्रशिक्षणार्थ चुना जाए, एवं जो ऐसे प्रशिक्षण काल में सरकार से एक निश्चित राशि वृत्तिका (स्टाईपेण्ड) के रूप में प्राप्त करे, तथा जो किसी विभाग में किसी पद पर या संवर्ग में अथवा उसके विरुद्ध नियुक्त किया हुआ नहीं हो।
संविधान का तात्पर्य भारतीय गणराज्य के संविधान से है।
संवर्ग का तात्पर्य किसी सेवा अथवा उसके अंग की उस निर्धारित संख्या से है जो स्थायी पदों के आधार पर पृथक् इकाई के रूप में रखी गई हो।
चतुर्थ श्रेणी सेवा से तात्पर्य उस सेवा से है जो प्रभावशाली वेतनमान नियमों की वेतन शृंखला संख्या एक या दो में की गई हो।
वि.वि. अधिसूचना सं. एफ. 1(9) विवि (ग्रुप-2)/90, दिनांक 17.5.1990 द्वारा प्रतिस्थापित।
क्षति-पूरक भत्ते उन भत्तों को कहा जाता है जिन्हें राज्य सरकार अपने कर्मचारियों को उनके द्वारा विशेष परिस्थितियों में व्यक्तिगत रूप से किये गये व्यय की पूर्ति के रूप में देती है। इसमें यात्रा भत्ता सम्मिलित है, किन्तु इसमें सत्कार (सम्पच्यूरी) भत्ता अथवा भारत के बाहर जल मार्ग द्वारा जाने एवं लौटने का भत्ता सम्मिलित नहीं है।
किन्हीं शक्तियों/अधिकारों के सम्बन्ध में सक्षम प्राधिकारी से तात्पर्य राजस्थान के राज्यपाल एवं ऐसे अन्य प्राधिकारी से है जिसे इन नियमों के द्वारा अथवा इनके अधीन राज्यपाल द्वारा शक्तियाँ प्रदान की जायें।
इन नियमों के परिशिष्ट IX में उन अधिकारियों की एक सूची दी गई है जो विभिन्न नियमों के अन्तर्गत सक्षम प्राधिकारी की शक्तियों का प्रयोग करते हैं।
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 5(1) एफ (आर)/56, दिनांक 11.1.1956 द्वारा अन्तःस्थापित।
संचित निधि का तात्पर्य भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266 की अनुपालना में गठित राज्य की संचित निधि से है।
रूपान्तरित अवकाश से तात्पर्य इन नियमों के नियम 93 के उपनियम (2) के प्रावधानों के रूप में उल्लिखित अवकाश से है।
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 10(51) एफ. 11/54, दिनांक 14.6.1954 द्वारा अन्तःस्थापित, 1.4.1951 से प्रभावी। "उप-नियम 1(ग)" के स्थान पर वि.वि. अधिसूचना सं. एफ. 1(66) विवि/ग्रुप-2/85, दिनांक 30.12.1985 द्वारा प्रतिस्थापित, 1.1.1983 से प्रभावी।
(अ) कर्त्तव्य में निम्नलिखित अवधि सम्मिलित होती है :
(i) परिवीक्षाधीन (प्रोबेशनर) अथवा शिक्षार्थी (अपरेन्टिस) के रूप में की गई सेवा, यदि ऐसी सेवा के तुरन्त बाद नियमित सेवा में व्यक्ति स्थायी रूप से नियुक्त कर दिया जाता है;
(ii) पद-भार ग्रहण अवधि।
(iii) अवकाश से लौटने वाले कर्मचारी के सम्बन्ध में, जिस पद से उसने अवकाश पर प्रस्थान किया था, उसी पद का पुनः कार्यभार सम्भालने का दिन।
(iv) परिवीक्षाधीन — प्रशिक्षणार्थी।
अपवाद : जयपुर और जोधपुर के कोषागारों का कार्यभार सम्भालने के सम्बन्ध में उक्त प्रावधानों के प्रयोजनार्थ अधिकतम 7 दिन, तथा अन्य जिला कोषागारों के कार्यभार के सम्बन्ध में 3 दिन का समय कर्त्तव्य के रूप में गिना जायेगा।
(ब) राज्य सरकार एक विशिष्ट आज्ञा जारी करके यह घोषणा कर सकती है कि निम्नलिखित परिस्थितियों, या इनके समान परिस्थितियों में, किसी राज्य कर्मचारी को ड्यूटी (कर्त्तव्य) पर माना जायेगा :—
(i) भारत में निर्देशन या प्रशिक्षण की अवधि।
(ii) कोई विद्यार्थी जो भारतवर्ष के किसी विश्वविद्यालय, महाविद्यालय या विद्यालय में, छात्रवृत्ति प्राप्त करते हुए या अन्यथा, कोई प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा हो और जो प्रशिक्षण की समाप्ति पर राजकीय सेवा पाने का अधिकारी हो — तो उसके द्वारा प्रशिक्षण को सफलतापूर्वक पूर्ण करने एवं सेवा में नियुक्त होने के बीच की समस्त अवधि को कर्त्तव्य अवधि समझा जाना चाहिये।
(iii) कोई व्यक्ति जो राज्य सेवा में अपनी प्रथम नियुक्ति के समय निर्धारित स्थान पर, सक्षम अधिकारी के निर्देशानुसार उपस्थिति देता है, और तब तक किसी विशिष्ट पद पर नियोजित करने की आज्ञा प्राप्त नहीं हो पाती है — तो ऐसे व्यक्ति की निर्धारित स्थान पर उपस्थिति की सूचना देने के दिन से विशिष्ट पद पर नियोजित होने के मध्य की अवधि को कर्त्तव्य अवधि समझा जायेगा।
(iv) राज्य कर्मचारी जिसे अनिवार्य विभागीय परीक्षा में बैठना हो, या जिसे किसी ऐसी परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी गई हो जिसमें उत्तीर्ण होने पर कर्मचारी के विभाग या कार्यालय की दृष्टि से उसकी कार्यकुशलता में वृद्धि होती हो — तो परीक्षा का समय तथा परीक्षास्थल तक आने एवं जाने का यथोचित समय कर्त्तव्य के रूप में माना जायेगा।
(v) किसी ऐच्छिक परीक्षा, जिसमें प्रवेश के लिए सक्षम प्राधिकारी ने स्वीकृति प्रदान कर दी हो, तो परीक्षा अवधि तथा परीक्षास्थल तक जाने एवं आने का उचित समय कर्त्तव्य माना जायेगा।
खण्ड (8) — वि.वि. आदेश सं. एफ. 7ए(5) विवि-ए (नियम)/60, दिनांक 3.10.1960 द्वारा प्रतिस्थापित। उप-खण्ड (iii) — अधिसूचना सं. एफ. 1(50) विवि (नियम)/70, दिनांक 3.8.1970 द्वारा अन्तःस्थापित। उप-खण्ड (iv) — अधिसूचना सं. एफ. 1(2) विवि/नियम/2006, दिनांक 13.3.2006 द्वारा अन्तःस्थापित।
यदि कोई कर्मचारी अवकाश से वापिस लौटने पर, या अपने पुराने पद का कार्यभार सम्भला कर, किसी पद पर नियोजित होने के आदेश की प्रतीक्षा करता है — तो वह अनिवार्य प्रतीक्षा का समय भी इस खण्ड के अन्तर्गत कर्त्तव्य-अवधि माना जायेगा।
वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(18) एफ.डी. (ग्रुप-2)/74, दिनांक 7 मई 1974 की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है, जिसके द्वारा सरकार ने शासन सचिवों को पद-स्थापन हेतु सक्षम आदेशों की प्रतीक्षा अवधि को कर्त्तव्य मानने के अधिकार प्रदान किये थे — शर्त यह थी कि ऐसे पद-स्थापन हेतु राजकीय आदेशों की प्रतीक्षा करने की अवधि 30 दिन से अधिक न हो।
यह देखने में आया है कि राज्य कर्मचारियों को लम्बे समय तक पद-स्थापन के लिए सक्षम प्राधिकारी के आदेशों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, और जब अवधि 30 दिन से अधिक हो जाती है तो ऐसे मामले वित्त विभाग में नियमित करने हेतु भेजे जाते हैं। यहाँ यह ध्यान में लाना आवश्यक है कि कर्मचारियों को 'पद-स्थापन के लिये आज्ञा की प्रतीक्षा' में रखने की अवधि के वेतन एवं भत्तों पर जो अपव्यय होता है, उस पर लेखा-प्रतिवेदनों में कटु टिप्पणियाँ दी जाती हैं। अतः यह आवश्यक है कि इस प्रकार के अपव्यय को रोकने के लिए प्रयत्न किये जाने चाहिए।
अतः निर्देश दिया जाता है कि भविष्य में ऐसे मामले नहीं होने चाहियें जिनमें कर्मचारियों को पद-स्थापना के लिये आज्ञा की प्रतीक्षा करनी पड़ती हो। यदि कभी कोई ऐसे मामले को टाला नहीं जा सके तो ऐसी अवधि को कम से कम रखा जाए। यहाँ यह भी स्पष्ट किया जाता है कि वित्त विभाग ऐसे मामले को नियमित करने में उस समय तक सहयोग नहीं देगा जब तक कि कर्मचारी का पद-स्थापना की आज्ञा नहीं देने के ठोस, उचित कारण नहीं हों।
विवि के ज्ञापन सं. एफ. 1(18) विवि (ग्रुप-2)/74, दिनांक 18.7.1975 द्वारा अन्तःस्थापित।
यह आज्ञा दी जाती है कि राजकीय कर्मचारी जो केन्द्रीय आपातकालीन सहायता प्रशिक्षण संस्थान, नागपुर या राष्ट्रीय अग्नि शमन सेवा महाविद्यालय, नागपुर में निम्नांकित पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण के लिए प्रतिनियुक्त किए जाते हैं, उन्हें राजस्थान सेवा नियमों के नियम 7(8)(ब)(i) के अधीन कर्त्तव्य पर समझा जायेगा, तथा वे वह वेतन एवं भत्ते प्राप्त करने के अधिकारी होंगे जिन्हें वे यदि प्रशिक्षण पर नहीं जाते तो प्राप्त करते।
यह भी आज्ञा दी जाती है कि वे प्रशिक्षण के प्रारम्भ या अन्त में, प्रशिक्षण स्थान पर जाने और आने की यात्रा के लिए केवल दौरों पर की गयी यात्रा की दर पर यात्रा भत्ते के हकदार होंगे। प्रशिक्षण अवधि के दौरान वे राजस्थान यात्रा भत्ता नियमों के परिशिष्ट II में आये आदेश सं. 3 में उपबंधित दरों के अनुसार क्षतिपूर्ति भत्ते के हकदार होंगे।
पाठ्यक्रमों के नाम :
- (1) नागरिक सुरक्षा का प्रारम्भिक पाठ्यक्रम
- (2) वरिष्ठ अधिकारियों की वार्षिक संगोष्ठी
- (3) नागरिक सुरक्षा कर्मचारी पाठ्यक्रम
- (4) नागरिक सुरक्षा निर्देशक पाठ्यक्रम
- (5) नागरिक सुरक्षा महिला अधिकारी पाठ्यक्रम
- (6) औद्योगिक नागरिक सुरक्षा पाठ्यक्रम
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 1(7) विवि (ई.आर.)/66, दिनांक 1.4.1966 द्वारा अन्तःस्थापित।
यह आदेश दिया जाता है कि राज्य कर्मचारी जो नागरिक सुरक्षा संप्रेषण विधि एवं ऑपरेशन निर्देशक पाठ्यक्रम के लिए संचालित सिविल आपातीत सेवा प्रशिक्षण केन्द्र, मालवीय नगर, एक्सटेन्सन एरिया, नई दिल्ली में प्रतिनियुक्त किया जाता है, उसे नियम 7(8)(ब)(i) के अधीन कर्त्तव्य पर माना जायेगा और उसे वही वेतन एवं भत्ते मिलेंगे जो वह प्रशिक्षण पर जाने से पूर्व प्राप्त करता था।
यह भी आदेश दिया जाता है कि प्रशिक्षण के स्थान पर जाने एवं आने की यात्रा के लिए प्रशिक्षण के आरम्भ से अन्त तक केवल दौरों की दरों पर यात्रा-भत्ता प्राप्त कर सकेंगे। प्रशिक्षण की अवधि में उन्हें राजस्थान यात्रा भत्ता नियमों में वर्णित दरों के अनुसार क्षतिपूरक भत्ता भी दिया जायेगा।
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 1(29) विवि (ग्रुप-2)/74, दिनांक 19.7.1974 द्वारा अन्तःस्थापित।
महालेखाकार राजस्थान द्वारा ऐसे कई मामले राज्य सरकार के ध्यान में लाये गये हैं जिनमें शासन सचिवों/विभागाध्यक्षों द्वारा व्यावसायिक एवं तकनीकी विषयों में ऐसे उच्चतर अध्ययन के लिए अधिकारियों को प्रतिनियुक्त कर दिया गया है जिससे उन्हें डिप्लोमा एवं डिग्री प्राप्त हो सके — जैसे चिकित्सकों को विशेषज्ञता हेतु स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में, अभियन्ताओं को एम.ई. पाठ्यक्रम के लिए — तथा नियम 7(8)(बी) के अन्तर्गत ऐसे पाठ्यक्रम की अवधि को कर्त्तव्य मान लिया गया, जबकि ऐसी अवधि अध्ययन अवकाश के रूप में मानी जानी चाहिए।
ऐसे मामलों में सम्बन्धित अधिकारियों का ध्यान राजस्थान सेवा नियमों के खण्ड 2 के परिशिष्ट IX की मद I की ओर दिलाया जाता है, जिसके अनुसार निम्न शर्तें पूरी हों तो भारत में प्रशिक्षण अथवा निर्देशन के पाठ्यक्रम की अवधि को कर्त्तव्य अवधि माना जा सकता है :
- (i) जब राज्य कर्मचारी को ऐसे प्रशिक्षण अथवा निर्देशन के लिये भेजना सरकार के लिये अनिवार्य हो;
- (ii) प्रशिक्षण व्यावसायिक अथवा तकनीकी विषयों में नहीं होना चाहिये जो सामान्यतः अध्ययन अवकाश के नियमों से नियमित होता है;
- (iii) प्रशिक्षण की अवधि एक वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिये।
अतः सम्बन्धित अधिकारियों को आग्रहपूर्वक यह कहा जाता है कि सरकारी कर्मचारियों को डिग्री अथवा डिप्लोमा प्राप्त करने हेतु उच्चतर-अध्ययन के लिए भेजने पर कर्त्तव्य पर नहीं माना जाना चाहिये।
वित्त विभाग के ज्ञापन सं. एफ. 1(9) विवि (ग्रुप-2)/75, दिनांक 30.10.1975 द्वारा अन्तःस्थापित।
यह आदेश दिये जाते हैं कि अधिकारी जिन्हें व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता है, अथवा जो प्रशासन की राष्ट्रीय अकादमी अथवा इसी प्रकार के राष्ट्रीय संस्थान — जो प्रशिक्षण के लिए भारत सरकार द्वारा अथवा भारत सरकार द्वारा प्रायोजित अखिल भारतीय स्तर के संस्थानों द्वारा चलाये जाते हैं — उनमें आयोजित सेमीनार में भाग लेते हैं, उन्हें नियम 7(8) के अन्तर्गत कर्त्तव्य पर माना जा सकता है, बशर्ते कि :
- (i) मुख्यालय से बाहर बिताया गया समय 7 दिवस से अधिक नहीं हो, और
- (ii) यात्रा भत्ता उस संस्थान द्वारा चुकाया जाये, अथवा अधिकारी ऐसी राशि राज्य सरकार से प्राप्त नहीं करें।
यह भी आदेश दिये जाते हैं कि सभी अधिकारी उक्त कार्यक्रम के लिए उन्हें संस्था से प्राप्त पारिश्रमिक, शुल्क आदि के सम्बन्ध में राजस्थान सेवा नियमों के नियम 47 के प्रभाव क्षेत्र से बाहर रहेंगे। यह 1.9.1968 से प्रभावी है।
आदेश सं. एफ. 1(15) विवि (नियम)/71, दिनांक 8.3.1971 एवं 26.3.1971 द्वारा अन्तःस्थापित।
यह संदेह उत्पन्न किया गया है कि क्या निवास स्थान से कार्यालय और उसके विपरीत यात्रा की अवधि नियम 7(8) के अधीन किसी सरकारी कर्मचारी की 'ड्यूटी' का भाग है या नहीं।
मामले पर विचार किया गया है और राज्यपाल आदेश देते हैं कि निम्नलिखित मामलों में सरकारी कर्मचारियों को नियम 7(8) के अधीन ड्यूटी पर समझा जायेगा :
(1) 'ड्यूटी' तब प्रारम्भ होती है जब सरकारी कर्मचारी किसी दिन-विशेष में 'ड्यूटी' के लिए रिपोर्ट करता है या पद का कार्यभार संभालता है, और तब समाप्त होती है जब वह अपनी ड्यूटी का स्थान छोड़ता है। तदनुसार निवास-स्थान से कार्यालय और इसके विपरीत यात्रा की अवधि 'ड्यूटी' का भाग नहीं है।
(2) मुख्यालय से दौरे पर अनुपस्थिति की अवधि दिन में उस समय से प्रारम्भ होती है जब सरकारी कर्मचारी वास्तव में अपना निवास स्थान छोड़ता है, और दिन में उस समय समाप्त होती है जब वह 'ड्यूटी' पर लौटता है। इसमें दौरे के दौरान उपयुक्त आकस्मिक अवकाश सहित अवकाश, यदि कोई हो, सम्मिलित नहीं है।
(3) किसी सरकारी कर्मचारी को, उसके प्रशिक्षण सहित, किसी भी निर्वाचन संबंधी ड्यूटी के लिए रिपोर्ट करने हेतु अपना निवास स्थान/कार्यालय छोड़ने से लेकर उसकी निर्वाचन संबंधी ड्यूटी का पालन करने के पश्चात् अपने निवास स्थान/कार्यालय पर वापस पहुँचने तक निर्वाचन ड्यूटी पर समझा जाना है। यदि इस अवधि के दौरान कोई दुर्घटना होती है तो उसे निर्वाचन ड्यूटी पर होना समझा जाना चाहिए, बशर्ते कि क्षति/मृत्यु की घटना और निर्वाचन ड्यूटी के बीच कोई आकस्मिक संबंध होना चाहिए।
शुल्क का तात्पर्य राज्य की संचित निधि, या भारत या अन्य राज्य की संचित निधि के अतिरिक्त अन्य स्रोत से किसी राज्य कर्मचारी को प्राप्त आवर्त्तक या अनावर्त्तक उस भुगतान से है जो कर्मचारी द्वारा किसी अशासकीय संस्था के लिये किये गये अतिरिक्त कार्यों के एवज़ में उस अशासकीय संस्था/निकाय से प्राप्त होता है।
किन्तु शुल्क में निम्न अंकित सम्मिलित नहीं होंगे :
(क) अनुपार्जित (अन-अर्न्ड) आय — जैसे सम्पत्ति से प्राप्त आय, मकान किराया आदि, लाभांश एवं जमाओं पर ब्याज से आय; एवं
(ख) साहित्यिक, सांस्कृतिक या कलात्मक प्रयत्नों से प्राप्त आय, यदि ऐसे कार्यों में कर्मचारी द्वारा सेवाकाल में प्राप्त किए गए ज्ञान का उपयोग नहीं किया गया हो।
आदेश सं. 4639/59/एफ. 7ए(31) विवि.ए/नियम/57, दिनांक 24.9.1959 द्वारा जोड़ा गया। खण्ड (क) एवं (ख) — वित्त विभाग के आदेश सं. 4492/57 एफ. 1(40) विवि/नियम/56, दिनांक 18.7.1957 द्वारा अन्तःस्थापित।
साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं कलात्मक प्रयत्नों में यदि सेवाकाल में अर्जित ज्ञान की सहायता मिलती है, तो उनमें प्रथमतः सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति लेनी पड़ेगी तथा उससे प्राप्त होने वाली कोई भी आय शुल्क मानी जायेगी।
लेकिन रिपोर्ट लिखना, या अन्तर्राष्ट्रीय निकायों जैसे संयुक्त राष्ट्रसंघ, यूनेस्को आदि में चुने हुए विषयों पर अध्ययन करना, भारतीय एवं विदेशी पत्रिकाओं में साहित्यिक योगदान देना आदि — खण्ड (ख) में कहे गये अनुसार माने जायेंगे, यदि यह सेवाकाल में अर्जित ज्ञान द्वारा सहायता प्राप्त किया हुआ नहीं हो।
इनका तात्पर्य राजस्थान सरकार या किसी प्रसंविदाकारी राज्य के अधीन उक्त निर्दिष्ट अवधि में लगातार की गई सेवा से है, तथा उसमें ड्यूटी पर बिताए गए समय तथा असाधारण अवकाश सहित अवकाशों का समय भी सम्मिलित होते हैं।
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 10(51) एफ. 11/54, दिनांक 14.6.1954 से अन्तःस्थापित, 1.4.1951 से प्रभावी।
इन नियमों में परिभाषित "सेवा के पूर्ण वर्ष" में असाधारण अवकाश सहित अवकाश पर बिताया गया समय भी सम्मिलित है।
एक सन्देह व्यक्त किया गया है कि क्या एक राज्य कर्मचारी जो पहले से ही अवकाश पर है, अपने अवकाश के क्रम में अर्द्ध-वेतन-अवकाश भी ले सकता है — यदि वह अर्द्ध-वेतन-अवकाश उसी अवकाश के बीच अपनी सेवा का वर्ष पूरा करने के कारण अर्जित करता हो।
मामले पर विचार कर निर्णय किया गया है कि ऐसा अर्द्ध-वेतन-अवकाश, जो एक कर्मचारी द्वारा अवकाश अवधि में ही सेवा का पूरा वर्ष होने के कारण अर्जित किया हो, उसको कर्मचारी अपने पूर्व के अवकाश के क्रम में उपभोग कर सकता है, या वह उसे अपने अवकाश की वृद्धि कराने के उपभोग में भी ले सकता है।
वित्त विभाग के ज्ञापन सं. एफ. 10(5-11) एफ. 11/54, दिनांक 28.10.1955 द्वारा अन्तःस्थापित।
वैदेशिक सेवा का तात्पर्य उस सेवा अवधि से है जिसमें एक राज्य कर्मचारी अपना वेतन तथा सभी भत्ते आदि सरकार की संचित-निधि के अतिरिक्त अन्य स्रोतों से प्राप्त करता है।
राजपत्रित अधिकारी वह है जो या तो —
(1) अखिल भारतीय सेवा का एक सदस्य हो; या
(2) राजस्थान सिविल सर्विसेज (क्लासीफिकेशन, कन्ट्रोल एवं अपील) नियम, 1958 की अनुसूची-I (राज्य सेवा) में उल्लिखित पदों में से किसी एक पर कार्य करता हो; या
(3) एक अनुबन्ध के आधार पर नियुक्त किया गया हो तथा जिसकी नियुक्ति सरकार द्वारा राजपत्रित मान ली गई हो; या
(4) ऐसे पद पर काम करने वाला हो जिसे राज्य सरकार द्वारा राजपत्रित घोषित कर दिया जाये। (परिशिष्ट XII भाग 2, राज्य सेवा)
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 5(1) एफ. (आर)/56, दिनांक 11.1.1956 द्वारा अन्तःस्थापित।
| आदेश दिनांक | सेवा नियम | राजपत्रित घोषित पद |
|---|---|---|
| 15.9.2017 | राजस्थान अधीनस्थ कार्यालय मंत्रालयिक सेवा नियम, 1999 | अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारी |
| 17.1.2018 | राजस्थान सामाजिक कल्याण अधीनस्थ सेवा नियम, 1963 | सामाजिक सुरक्षा अधिकारी |
| 4.1.2019 | राजस्थान चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधीनस्थ सेवा नियम, 1965 | अधीक्षक रेडियोग्राफर |
| 16.1.2020 | राजस्थान जिला न्यायालय मंत्रालयिक स्थापना नियम, 1986 | प्रोटोकॉल अधिकारी-सह-प्रशासनिक अधिकारी; व्यक्तिगत सहायक सह कार्यकारी सहायक |
| 29.5.2020 | राजस्थान ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज राज्य एवं अधीनस्थ सेवा नियम, 1998 | अतिरिक्त विकास अधिकारी |
अर्द्ध-वेतन-अवकाश का तात्पर्य सेवा के प्रत्येक पूर्ण वर्ष के कारण अर्जित किए हुए अवकाश से है।
"बकाया अर्द्ध-वेतन-अवकाश" का तात्पर्य उस अर्द्ध-वेतन-अवकाश की संख्या से है जो नियम 93 में निर्धारित किए गए अनुसार पूर्ण सेवा काल में से — निजी कार्यों के लिए एवं चिकित्सा प्रमाण-पत्र के आधार पर, या 1.4.1951 से पूर्व अन्य किसी प्रकार के अर्द्ध-वेतन पर लिए अवकाश, एवं अर्द्ध-वेतन (या औसत अर्द्ध-वेतन) अवकाश जो 1.4.1951 या उसके बाद लिया गया हो — को घटाकर निकाला गया है।
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 10(51)/एफ. 11/54, दिनांक 27.10.1955 द्वारा अन्तःस्थापित, 1.4.1951 से प्रभावी।
विभागाध्यक्ष का तात्पर्य किसी ऐसे अधिकारी से है जिसे राज्य सरकार इन नियमों के उद्देश्यों के लिए विभागाध्यक्ष घोषित कर दे। (परिशिष्ट XIV)
अवकाश का तात्पर्य —
(क) निगोशिएबिल-इन्स्ट्रूमेंट्स-एक्ट के अन्तर्गत घोषित किए गए अवकाश दिवस से है; एवं
(ख) किसी विशेष कार्यालय के सम्बन्ध में, उस दिन से है जिस दिन ऐसा कार्यालय राज्य कार्य नहीं करने के लिए, राज्य सरकार की विज्ञप्ति द्वारा, बन्द घोषित कर दिया जाता है।
मानदेय का तात्पर्य एक राज्य कर्मचारी को अनावर्त्तक राशि के उस भुगतान से है, जो राज्य की या भारत या अन्य राज्य की संचित निधि से किसी सामयिक अथवा कभी-कभी होने वाले (इन्टरमिटेन्ट) कार्य के लिए स्वीकृत किया जाता है।
आदेश सं. 4639/59/एफ. 7ए(31) विवि-क/नियम/57, दिनांक 24.9.1959 द्वारा अन्तःस्थापित।
(1) यदि कोई कार्य, सम्बन्धित राज्य कर्मचारी के कर्त्तव्यों का वैधानिक अंश माना जाता है, तो उस कार्य के लिए उसे किसी प्रकार का कोई मानदेय नहीं दिया जाना चाहिए।
(2) अपवादस्वरूप विशेष परिस्थितियों में कार्यालय समय के बाद भी कार्य करना एक प्रकार से राज्य कर्मचारी का उत्तरदायित्व है। इसके लिए सामान्यतः कोई मानदेय स्वीकृत नहीं किया जाना चाहिए — किन्तु लगातार कार्यालय समय के बाद भी काम करते रहने के कारण मानदेय या विशेष वेतन का प्रस्ताव उचित ठहराया जा सकता है।
पदभार ग्रहण काल का तात्पर्य एक राज्य कर्मचारी को दिए गए उस समय से है जो उसे नए पद का कार्यभार सम्भालने के लिये, अथवा एक स्थान से दूसरे स्थान तक जहाँ पर वह पद-स्थापित किया गया है, यात्रा के लिए स्वीकृत किया जाता है।
'अवकाश' शब्द में उपार्जित अवकाश, अर्द्ध-वेतन-अवकाश, रूपान्तरित (कम्युटेड) अवकाश, विशेष-अयोग्यता अवकाश, अध्ययन अवकाश, प्रसूति अवकाश एवं अस्पताल अवकाश, अदेय अवकाश एवं असाधारण अवकाश सम्मिलित हैं।
आदेश सं. एफ. 9(3) विवि (आर.)/56, दिनांक 14.12.1956 द्वारा अन्तःस्थापित।
अवकाश वेतन से तात्पर्य एक राज्य कर्मचारी को किसी भी प्रकार की अवकाश अवधि में दी जाने वाली मासिक वेतन आदि की राशि से है।
पदाधिकार का तात्पर्य किसी राज्य कर्मचारी के एक स्थायी पद को धारण करने के उस अधिकार से है जिसे वह उस पद पर अपनी मूल-नियुक्ति के फलस्वरूप प्राप्त करता है। इसमें एक सावधि (टेन्योर) पद भी सम्मिलित है जिस पर वह स्थायी रूप से नियुक्त किया जा चुका है।
स्थानीय निधि का तात्पर्य है —
(क) विभिन्न निकायों द्वारा प्राप्त उस राजस्व से, जो किसी अधिनियम की शक्ति रखने वाले नियमों के आधार पर सरकार के नियन्त्रण में आता है — चाहे वह नियन्त्रण किसी साधारण या विशेष मामले में कार्यवाही करने के सम्बन्ध में ही क्यों न हो, जैसे उनका बजट स्वीकार करना, विशिष्ट पदों का सृजन करना अथवा उन्हें भरने की स्वीकृति देना, या अवकाश-पेंशन आदि के समान नियम बनाना; तथा
(ख) किसी भी संस्था या निकाय के उस राजस्व से, जो विशेष रूप से राज्यपाल द्वारा स्थानीय निधि घोषित कर दी गई हो।
मन्त्रालयिक कर्मचारी का तात्पर्य किसी मन्त्रालयिक सेवा के ऐसे राज्य कर्मचारी से है जो सरकार के सामान्य एवं विशेष आदेशों द्वारा विशेष रूप से इस श्रेणी में घोषित कर दिये गये हों। (परिशिष्ट XII, भाग II, मन्त्रालयिक सेवा)
माह से तात्पर्य एक कलेण्डर माह से है। महीनों व दिनों के रूप में वर्णित अवधि की गणना करने में प्रथमतः पूरे मास गिनने चाहिये और बाद में दिनों की संख्या जोड़ देनी चाहिये।
अधिसूचना सं. एफ. 1(18) विवि (नियम)/71, दिनांक 27.3.1971 द्वारा प्रतिस्थापित।
दृष्टान्त (क) — 25 जनवरी से 3 माह 20 दिन
| अवधि | वर्ष | माह | दिन |
|---|---|---|---|
| 25 जनवरी से 31 जनवरी | 0 | 0 | 7 |
| फरवरी से अप्रेल | 0 | 3 | 0 |
| 1 मई से 13 मई | 0 | 0 | 13 |
| योग | 0 | 3 | 20 |
दृष्टान्त (ख) — 30 जनवरी से 2 मार्च तक = 1 माह 4 दिन
| अवधि | वर्ष | माह | दिन |
|---|---|---|---|
| 30 जनवरी से 31 जनवरी तक | 0 | 0 | 2 |
| फरवरी | 0 | 1 | 0 |
| 1 मार्च से 2 मार्च तक | 0 | 0 | 2 |
| योग | 0 | 1 | 4 |
दृष्टान्त (ग) — 2 जनवरी से 1 मार्च तक
2 जनवरी से आरम्भ एवं 1 मार्च को समाप्त होने वाली अवधि को 2 माह तथा एक दिन गिना जायेगा, जो माह के 30 दिन के आधार पर इस प्रकार गिना जायेगा :
| अवधि | वर्ष | माह | दिन |
|---|---|---|---|
| 2 जनवरी से 31 जनवरी तक | 0 | 0 | 30 |
| फरवरी | 0 | 1 | 0 |
| 1 मार्च | 0 | 0 | 1 |
| योग | 0 | 1 | 31 |
इस प्रकार 30 दिन के एक माह के आधार पर दो माह 1 दिन बनता है।
दृष्टान्त (ख) में शब्द "मार्च" के स्थान पर "जनवरी" — वित्त विभाग के शुद्धिपत्र सं. एफ. 1(18) विवि/नियम/71, दिनांक 19.5.1971 द्वारा प्रतिस्थापित। दृष्टान्त (ग) — वि.वि. अधिसूचना सं. एफ. 1(66) विवि (ग्रुप-2)/85, दिनांक 30.12.1985 द्वारा अन्तःस्थापित।
वित्त विभाग की अधिसूचना संख्या एफ. 1(53) विवि/ए(नियम)/61, दिनांक 1.1.1965 द्वारा विलोपित।
स्थायी नियोजन के कर्मचारी से तात्पर्य ऐसे राज्य कर्मचारी से है जो किसी स्थायी पद पर स्थायी रूप से कार्य करता हो, तथा जो किसी स्थायी पद पर अपना पदाधिकार रखता हो — या यदि उसका पदाधिकार निलम्बित नहीं किया गया होता तो वह स्थायी पद पर अपना पदाधिकार रखता।
एक राज्य कर्मचारी किसी पद पर स्थानापन्न रूप से कार्य उस समय करता है जब वह एक ऐसे पद पर कार्य करता है जिस पर अन्य कर्मचारी का पदाधिकार हो। यदि सरकार उचित समझे तो किसी राज्य कर्मचारी को ऐसे रिक्त पद पर भी स्थानापन्न रूप से नियुक्त कर सकती है जिस पर किसी अन्य कर्मचारी का पदाधिकार नहीं हो।
वेतन से तात्पर्य एक राज्य कर्मचारी द्वारा प्राप्त किए जाने वाले निम्न अंकित मासिक वेतन से है :
(i) वेतन — विशेष वेतन या उसकी व्यक्तिगत योग्यता के आधार पर स्वीकृत वेतन के अतिरिक्त — जो उसके द्वारा स्थायी या स्थानापन्न रूप से धारण किए गए पद के लिए स्वीकृत किया गया है, या जिसे वह अपनी पदीय स्थिति के कारण प्राप्त करने का पात्र है; एवं
(ii) विशेष वेतन एवं व्यक्तिगत वेतन; एवं
(iii) अन्य राशि जो राज्यपाल द्वारा विशेष रूप से वेतन के रूप में वर्गीकृत की गई हो।
1. राजकीय मुद्रणालय में आंशिक आधार पर कार्य करने वालों के सम्बन्ध में, जब वह किसी समय-वेतन-मान (टाइम-स्केल) में किसी पद पर नियुक्त किया जाये, तो उसका वेतन 200 घण्टे तक काम करने के बराबर समझा जाये।
2. पुलिस सिपाही एवं अन्य स्टाफ को जो साक्षरता भत्ता स्वीकार किया जाता है, वह वेतन में गिना जाये।
3. राजस्थान सिविल सेवा (रिवाइज्ड पे) नियम, 1961 की अनुसूची 5 के अधीन चिकित्सा अधिकारी द्वारा आहरित प्रेक्टिस-बन्दी भत्ता (नान-प्रेक्टिसिंग अलाउन्स) या नान-क्लीनिकल भत्ता निम्नलिखित प्रयोजनों के लिए गिना जायेगा :
- (i) पेंशन एवं उपदान
- (ii) अवकाश वेतन
- (iii) विदेश सेवा में प्रतिनियुक्ति — यदि विदेश सेवा/प्रतिनियुक्ति में पद पर प्राइवेट प्रेक्टिस की कोई सम्भावना न हो
- (iv) नियम 7(8)(ब) के अधीन प्रशिक्षण
- (v) राजस्थान सिविल सेवा (वास-सुविधा के किराये का अवधारण और वसूली) नियम, 1958 के नियम 35 में यथा परिभाषित परिलब्धियाँ
- (vi), (vii), (viii) — विलोपित
- (ix) पदभार ग्रहण काल
- (x) राजस्थान सेवा नियमों के नियम 51 के अधीन विदेशों में प्रशिक्षण
4. चिकित्सा अधिकारी जिसे समय-समय पर प्रेक्टिस बन्दी भत्ता स्वीकृत किया गया है, किसी भी रूप में कोई प्राइवेट प्रेक्टिस नहीं करेगा। वह उस वेतन बिल में निम्न रूप में एक प्रमाण-पत्र अभिलिखित करेगा जिसमें प्रेक्टिस-बन्दी-भत्ते की माँग की गई है :
"यह प्रमाणित किया जाता है कि उस अवधि में जिसके लिए इस बिल में प्रेक्टिस-बन्दी भत्ते का क्लेम किया गया है, कोई प्रेक्टिस नहीं की गई है।"
5. वित्त विभाग की आज्ञा सं. एफ. 2बी(1)(3) विवि (ईआर)/65-II, दिनांक 6.2.1965 तथा सं. एफ. 2(बी)(67) विवि (ईआर)/66-II, दिनांक 29.11.1973 की शर्तों के अनुसार सहायक शल्य चिकित्सक द्वारा प्राप्त ग्रामीण-भत्ता, टिप्पणी-3 में वर्णित प्रयोजनार्थ वेतन माना जायेगा।
"पेंशन" शब्द का प्रयोग जब उपदान (ग्रेच्युटी) और/या मृत्यु एवं सेवानिवृत्ति उपदान (डेथ-कम-रिटायरमेन्ट ग्रेच्युटी) के लाभों के संदर्भ में किया जाये, तो पेंशन में उपदान और/या मृत्यु-एवं-सेवानिवृत्ति उपदान दोनों ही सम्मिलित मानी जायेंगी।
वि.वि. के आदेश सं. एफ. 2(ख)(1) वि.वि./ग्रुप-2/74, दिनांक 25.9.1974 द्वारा अन्तःस्थापित।
स्थायी पद का तात्पर्य समयावधि के बिना स्वीकृत वेतन की निश्चित शृंखला की दर वाले पद से है।
व्यक्तिगत वेतन से तात्पर्य राज्य कर्मचारी को स्वीकृत किये गए उस अतिरिक्त वेतन से है जो :
(क) जब कोई कर्मचारी सावधि पद के अतिरिक्त किसी स्थायी पद पर कार्य करता है, परन्तु वेतन में संशोधन के कारण या अनुशासनात्मक कार्यवाही के रूप में उठाए गए कदमों के अतिरिक्त अन्यथा रूप से ऐसे मूल वेतन (सब्स्टेन्टिव-पे) में कमी हो जाने के कारण कोई हानि हो — तो उसे पूरा करने के लिए व्यक्तिगत वेतन (पर्सनल-पे) स्वीकृत किया जाता है; या
(ख) अन्य वैयक्तिक कारणों से अपवाद-स्वरूप परिस्थितियों में स्वीकृत किया जाता है।
उपार्जित अवकाश का तात्पर्य सेवा में व्यतीत किए गए समय के आधार पर अर्जित अवकाश से है।
"बकाया उपार्जित अवकाश" का तात्पर्य नियम 91, 92 या 94 द्वारा अर्जित अवकाश के दिनों की संख्या से है। अवकाशों की संख्या निकालते समय सेवा में जितने समय के अवकाशों का उपयोग किया गया है, उतना समय कम कर दिया जाता है।
जब इसका प्रयोग किसी विशिष्ट कर्मचारी के लिए किया जाता है, तो इसका तात्पर्य उस वेतन से है जिसे — यदि वह उस पद को स्थायी रूप से धारण करता — तो पाने का अधिकारी होता एवं अपना कार्य करता रहता।
परन्तु इसमें विशेष वेतन उस समय तक सम्मिलित नहीं किया जा सकता जब तक राज्य कर्मचारी वह कार्य/कर्त्तव्य नहीं करता, वह जिम्मेदारी नहीं लेता, या ऐसी अस्वास्थ्यकर परिस्थिति में नहीं पड़ा होता — जिसको ध्यान में रखकर विशेष वेतन स्वीकृत किया गया था।
परिवीक्षाधीन से तात्पर्य उस कर्मचारी से है जो किसी सेवा अथवा संवर्ग (केडर) में स्थायी रूप से एक रिक्त पद पर नियमित रूप से नियुक्त किया गया है।
वि.वि. के आदेश सं. एफ. 1(14) विवि/ईआर/66, दिनांक 18.5.1966 द्वारा प्रतिस्थापित।
(1) यह परिभाषा, फिर भी, उस राज्य कर्मचारी पर प्रभावी नहीं होती जो एक संवर्ग में स्थायी रूप से कार्य करता है एवं केवल दूसरे पद 'पर परिवीक्षा' के तौर पर (on probation) नियुक्त किया जाता है।
(2) कोई भी व्यक्ति जिसे एक संवर्ग में स्थायी पद पर स्थायी रूप से नियुक्त होना है, परिवीक्षाधीन (प्रोबेशनर) नहीं होता — जब तक उसकी नियुक्ति के साथ परिवीक्षा की निश्चित शर्तें नहीं जोड़ दी गई हों, जैसे यह शर्त कि अमुक परीक्षा उत्तीर्ण करने के समय तक वह प्रोबेशन (परिवीक्षा) पर समझा जायेगा।
(3) जब तक किसी मामले में नियमों द्वारा अन्यथा निर्धारित नहीं किया गया हो, एक परिवीक्षाधीन कर्मचारी का स्तर उसी प्रकार समझा जाता है जिस प्रकार संस्थाई कर्मचारी का हो।
वि.वि. के आदेश सं. एफ. 7(7) आर/55, दिनांक 29.7.1955 द्वारा अन्तःस्थापित।
उपर्युक्त टिप्पणी संख्या (1) व (2) में दिये गये निर्देशनों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में समझा जाना चाहिए, एक-दूसरे से भिन्न नहीं।
दोनों टिप्पणियों में यह ध्यान देने की बात है कि किसी समय एक राज्य कर्मचारी — इस बात का ध्यान रखे बिना ही कि वह पूर्व में स्थायी राज्य कर्मचारी है, या बिना किसी स्थायी पद पर अपना लियन रखे ही राज्य कर्मचारी है — 'प्रोबेशनर' के रूप में है या सिर्फ 'प्रोबेशन-पर' है।
एक 'प्रोबेशनर' व्यक्ति वह होता है जो प्रोबेशन की निश्चित शर्तों के साथ स्थायी रूप से रिक्त किसी पद पर या उस पद के विरुद्ध नियुक्त किया गया हो।
तथा 'प्रोबेशन-पर' व्यक्ति वह होता है जो किसी पद पर (यह आवश्यक नहीं कि वह पद मूल रूप से रिक्त हो) भविष्य में नियमित नियुक्ति की योग्यता के निर्धारण के लिये नियुक्त किया जाता हो।
इन जाँच निर्देशनों में किसी ऐसे राज्य कर्मचारी को, जो किसी संवर्ग में अधिष्ठायी हो, किसी अन्य संवर्ग में उत्पन्न किसी एक पद पर या उसके विरुद्ध (या तो विभागीय समिति द्वारा चयन के माध्यम से, या प्रतियोगी परीक्षा के परिणामस्वरूप) प्रोबेशनर के रूप में नियुक्त करने से रोका नहीं जा सकता है — यदि प्रोबेशन की कुछ निश्चित शर्तें, जैसे विभागीय परीक्षा उत्तीर्ण करना आदि, विहित की गयी हों।
इस प्रकार के मामलों में राज्य कर्मचारी को "प्रोबेशनर" के रूप में समझा जाना चाहिये, एवं जब तक इस विषय में कोई विशेष विपरीत नियम न हो, उसे केवल उस पद की आरम्भिक वेतन दर में न्यूनतम वेतन स्वीकृत किया जाना चाहिये जो कि परिवीक्षा काल की अवधि के लिए निर्धारित की जाये।
एक ही विभाग के कर्मचारियों को चयन द्वारा पदोन्नति का मामला कुछ भिन्न है। चाहे प्रोबेशन के समय में उनकी योग्यता आदि की परीक्षा करने का कुछ भी प्रबन्ध हो, पर उनका आरम्भिक वेतन उस समय प्रभावशील वेतन फिक्सेशन सम्बन्धी सामान्य नियमों के अन्तर्गत होना चाहिये।
परिवीक्षाधीन प्रशिक्षणार्थी से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो सेवा के संवर्ग में स्पष्ट रिक्ति के विरुद्ध सीधी भर्ती के माध्यम से नियुक्त किया जाये, और दो वर्ष या विस्तारित अवधि (यदि कोई हो) के लिए नियत पारिश्रमिक पर प्रशिक्षणाधीन रखा जाये।
वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(2) विवि/नियम/2006, दिनांक 13.3.2006 द्वारा अन्तःस्थापित, 20.1.2006 से प्रभावी।
विशेष वेतन से तात्पर्य निम्न अंकित तथ्यों को दृष्टि में रखते हुए किसी पद पर एक कर्मचारी को प्राप्त हो रहे वेतन में अतिरिक्त वृद्धि से है, जो :
(क) विशेष रूप से कठिन प्रकृति के कार्य करने के लिये; अथवा
(ख) कार्य या उत्तरदायित्व में विशिष्ट वृद्धि होने पर — स्वीकृत किया जाता है।
वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(64) विवि (नियम)/68, दिनांक 22.2.1969 द्वारा प्रतिस्थापित।
कोई राज्य कर्मचारी जो किसी विशेष पद पर नियुक्त किया गया हो, उसकी नियुक्ति की शर्तों में यह प्रावधान होने का — कि उसे वे सारे कार्य करने होंगे जिनको उसे करने के लिये कहा जाये — तात्पर्य यह नहीं कि उससे यदि दूसरे पद का अतिरिक्त कार्य करने के लिए कहा जायेगा तो उसे उसका पारिश्रमिक नहीं दिया जायेगा।
चतुर्थ श्रेणी सेवा को छोड़कर अन्य समस्त प्रकार की सेवाओं को उच्च सेवा (सुपीरियर सर्विस) कहा जाता है।
"(परिशिष्ट XII, भाग 2)" — वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(9) विवि (ग्रुप-2)/90, दिनांक 17.5.1990 द्वारा विलोपित।
निर्वाह अनुदान से तात्पर्य एक राज्य कर्मचारी को दी गई उस मासिक सहायता से है, जिसे वेतन या अवकाश वेतन के रूप में कुछ भी नहीं दिया जा रहा हो।
मूल वेतन से तात्पर्य नियम 7(24)(iii) के अन्तर्गत राज्यपाल द्वारा स्वीकृत उस वेतन से है जो विशेष वेतन, व्यक्तिगत वेतन या अन्य वेतन के अतिरिक्त है, और जो वह स्थायी पद पर नियुक्त होने के कारण, या उसकी किसी संवर्ग में स्थायी नियुक्ति होने के कारण, प्राप्त करने का अधिकारी है।
1. जब कोई राजकीय मुद्रणालय में आंशिक काम करने वाला व्यक्ति वेतनमान वाले किसी अस्थायी पद पर नियुक्त किया जाता है, तो मूल वेतन उसके प्रति घण्टे की दर के हिसाब से 200 घण्टे कार्य के समान होगा।
2. मूल वेतन में परिवीक्षाधीन द्वारा किसी ऐसे पद पर प्राप्त किया गया वेतन भी सम्मिलित है, जिस पर वह परिवीक्षाधीन नियुक्त किया गया है।
3. यदि कोई कर्मचारी राज्य सरकार के अधीन किसी स्थायी पद पर अपना पदाधिकार रखता है, तो उसके सम्बन्ध में 'मूल वेतन' का तात्पर्य उस 'वेतन' से है जो सरकार के सम्बन्धित नियमों द्वारा परिभाषित किया जाये।
टिप्पणी 2 — वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 5(1) एफ (आर)/56, दिनांक 11.1.1956 द्वारा अन्तःस्थापित। टिप्पणी 3 — वित्त विभाग के आदेश सं. डी. 3549/एफ. 7क(4) विवि-क/नियम/57, दिनांक 19.6.1957 द्वारा अन्तःस्थापित।
स्थायी नियुक्ति से तात्पर्य एक राज्य कर्मचारी की ऐसे स्थायी पद पर नियुक्ति से है जिस पर वह पदाधिकार अर्जित करता है।
वि.वि. के आदेश सं. एफ. 1(14) वित्त (व्यय-नियम)/66, दिनांक 18.5.1966 द्वारा जोड़ा गया।
अस्थायी पद से तात्पर्य एक ऐसे पद से है जो एक वेतनमान में निश्चित समय अथवा अवधि के लिये सृजित किया जाये।
1 व 2 — विलोपित।
3. एक अस्थायी पद की अवधि को उस पद पर कार्य करने वाले व्यक्ति के अवकाश की अवधि तक बढ़ाना उस समय आवश्यक है, जब उस अवकाश की स्वीकृति से "सरकार को कोई व्यय नहीं" करना पड़ता है।
टिप्पणी 1 व 2 — वित्त विभाग के आदेश सं. 5317/56/एफ. 8(47) विवि/आर/55, दिनांक 12.11.1956 द्वारा विलोपित।
सावधि पद का तात्पर्य एक ऐसे स्थायी पद से है जिसे एक अधिकारी एक निश्चित अवधि से अधिक समय तक धारण नहीं कर सकता है।
सन्देह की दशा में सरकार ही निर्णय करेगी कि अमुक पद सावधि पद है या नहीं।
समय-वेतनमान का तात्पर्य उस वेतनमान से है जो इन नियमों में दी गई शर्तों के आधार पर एक निश्चित अवधि के आधार पर न्यूनतम से अधिकतम तक चलता हो।
एक पद को दूसरे पद के समय-वेतनमान के समकक्ष उसी स्थिति में कहा जाता है जब दोनों पदों का वेतनमान समान हो, तथा दोनों पदों के व्यक्ति एक संवर्ग में आते हों या किसी संवर्ग के एक वर्ग में आते हों।
ऐसा संवर्ग अथवा वर्ग इस दृष्टि से बनाया जाता है जिससे कि पदों की प्रवृत्ति तथा उत्तरदायित्व इस प्रकार समान हों कि किसी सेवा में या संस्थापन में या उनके वर्ग में पदों को भरने के लिए नियुक्त किया जा सके — जिससे किसी भी पद का धारण करने वाले व्यक्ति का वेतन उसके संवर्ग अथवा वर्ग में होने के कारण निश्चित किया जा सके, न कि इन तथ्यों के आधार पर कि वह उसी पद को धारण करता है।
स्थानान्तरण का तात्पर्य किसी राज्य कर्मचारी का, जहाँ पर वह नियुक्त है उस स्थान से, अन्य स्थान पर निम्नलिखित कारणों से प्रस्थान करना है :
(क) नये पद का कार्यभार सम्भालने के लिए; अथवा
(ख) उसके मुख्यालय के स्थान परिवर्तन के फलस्वरूप।
विश्रामकालीन विभाग एक विभाग अथवा विभाग का वह भाग कहलाता है जिसमें प्रतिवर्ष नियमित रूप से अवकाश रखा जाता है, और इन अवकाशों की अवधि में उस विभाग के कर्मचारियों को अपने कर्त्तव्य से अनुपस्थित रहने की अनुमति होती है।
अपवाद : विलोपित।
अपवाद — वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(62) विवि (नियम)/68, दिनांक 17.12.1968 द्वारा अन्तःस्थापित तथा अधिसूचना सं. एफ. 4(62) विवि (नियम)/68, दिनांक 18.8.1969 द्वारा विलोपित — 17.12.1968 से प्रभावी।
पेंशन के अयोग्य संस्थापन का तात्पर्य एक ऐसे संस्थापन से है, जिसका वेतन राज्य के बजट में "अधिकारियों का संवेतन" और "संस्थापन का संवेतन" मद से नहीं चुकाया जाता है, वरन् अन्य मदों, कार्यालय व्यय अथवा अन्य प्रभार (मद) से चुकाया जाता है।
वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(14) विवि/(व्यय नियम)/67, दिनांक 21.8.1967 द्वारा अन्तःस्थापित।
व्याख्या — कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु
1. जन्म-तिथि — दो अलग-अलग नियम
टिप्पणी 1 और सरकार का निर्णय दो अलग समस्याएँ हल करते हैं, और इन्हें मिला देना आम भूल है।
टिप्पणी 1 उस स्थिति की है जब जन्म-तिथि कभी दर्ज ही नहीं हुई। तब मान लिया जाता है — केवल वर्ष पता है तो 1 जुलाई, वर्ष और माह पता है तो उस माह की 16 तारीख। ये तिथियाँ यूँ ही नहीं चुनी गईं — 1 जुलाई वर्ष का मध्य-बिन्दु है और 16 माह का, यानी अनुमान में पक्षपात न रहे।
सरकार का निर्णय उस स्थिति की है जब जन्म-तिथि दर्ज तो है, पर बदलवानी है। वहाँ कड़ी शर्त है — आवेदन सेवानिवृत्ति से कम से कम तीन वर्ष पहले देना होगा। इसके बाद आया आवेदन बिना गहराई में गए अस्वीकार हो जाएगा।
2. कर्त्तव्य (ड्यूटी) — सबसे विवादित परिभाषा
नियम 7 की सबसे लम्बी और सबसे अधिक बार संशोधित परिभाषा यही है, क्योंकि इसी पर वेतन, अवकाश-अर्जन और पेंशन-योग्य सेवा तीनों टिकते हैं।
खण्ड (अ) में वे अवधियाँ हैं जो स्वतः कर्त्तव्य मानी जाती हैं। खण्ड (ब) में वे हैं जिन्हें सरकार विशिष्ट आज्ञा जारी करके कर्त्तव्य घोषित कर सकती है। यह भेद महत्वपूर्ण है — खण्ड (ब) की कोई भी अवधि स्वतः कर्त्तव्य नहीं बन जाती, उसके लिए आदेश चाहिए।
3. प्रशिक्षण कब कर्त्तव्य है, कब नहीं
निर्णय 3 इस प्रश्न पर स्पष्ट रेखा खींचता है। तीनों शर्तें एक साथ पूरी हों तभी प्रशिक्षण कर्त्तव्य है — भेजना सरकार के लिए अनिवार्य हो, विषय ऐसा न हो जो अध्ययन अवकाश के नियमों से चलता है, और अवधि एक वर्ष से अधिक न हो।
डिग्री या डिप्लोमा के लिए भेजे गए कर्मचारी — जैसे स्नातकोत्तर करने वाले चिकित्सक या एम.ई. करने वाले अभियन्ता — इस दायरे में नहीं आते। उनकी अवधि अध्ययन अवकाश है, कर्त्तव्य नहीं।
4. निवास से कार्यालय की यात्रा — 2012 का आदेश
14.12.2012 का आदेश एक पुराने सन्देह को समाप्त करता है। ड्यूटी तब शुरू होती है जब कर्मचारी रिपोर्ट करता है या कार्यभार सँभालता है, और तब खत्म होती है जब वह ड्यूटी का स्थान छोड़ता है। घर से दफ़्तर और वापसी की यात्रा ड्यूटी नहीं है।
पर दो अपवाद हैं जो व्यावहारिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं :
- दौरा — यहाँ अवधि तब शुरू होती है जब कर्मचारी वास्तव में अपना निवास स्थान छोड़ता है, न कि दफ़्तर पहुँचने पर।
- निर्वाचन ड्यूटी — प्रशिक्षण सहित, घर या दफ़्तर छोड़ने से लेकर वापस पहुँचने तक पूरी अवधि निर्वाचन ड्यूटी है। इस अवधि में दुर्घटना होने पर वह निर्वाचन ड्यूटी पर हुई मानी जाएगी — बशर्ते क्षति या मृत्यु और ड्यूटी के बीच आकस्मिक संबंध हो। मुआवज़े के दावों में यही प्रावधान निर्णायक होता है।
5. शुल्क और मानदेय — अन्तर
| बिन्दु | शुल्क (Fee) | मानदेय (Honorarium) |
|---|---|---|
| स्रोत | संचित निधि के अतिरिक्त स्रोत — अशासकीय संस्था | राज्य की या भारत/अन्य राज्य की संचित निधि से |
| प्रकृति | आवर्त्तक या अनावर्त्तक | अनावर्त्तक |
| किस कार्य पर | अशासकीय संस्था के लिए किया गया अतिरिक्त कार्य | सामयिक या कभी-कभी होने वाला कार्य |
मानदेय की टिप्पणी एक व्यावहारिक सीमा भी लगाती है — यदि कार्य कर्मचारी के कर्त्तव्यों का वैधानिक अंश है, तो उसके लिए मानदेय नहीं दिया जाना चाहिए। कार्यालय समय के बाद काम करना भी सामान्यतः मानदेय का आधार नहीं — पर यदि यह लगातार चलता रहे तो मानदेय या विशेष वेतन का प्रस्ताव उचित ठहराया जा सकता है।
6. पदाधिकार (लियन) — एक कुंजी-अवधारणा
पदाधिकार पूरे RSR की सबसे बुनियादी अवधारणाओं में से है। यह किसी स्थायी पद पर कर्मचारी का अधिकार है, जो मूल-नियुक्ति से उत्पन्न होता है।
इसी अवधारणा पर परिभाषा (22) और (23) खड़ी हैं। स्थायी नियोजन का कर्मचारी वह है जो स्थायी पद पर पदाधिकार रखता है। स्थानापन्न वह है जो ऐसे पद पर काम कर रहा है जिस पर किसी और का पदाधिकार है। दूसरे शब्दों में — जिस कुर्सी पर आप बैठे हैं, वह कानूनी रूप से किसकी है, यही पदाधिकार तय करता है।
7. प्रोबेशनर बनाम प्रोबेशन-पर
यह भेद अंकेक्षण निर्देशन में स्पष्ट किया गया है और परीक्षाओं में भी बार-बार पूछा जाता है :
| प्रोबेशनर (परिवीक्षाधीन) | प्रोबेशन-पर (on probation) | |
|---|---|---|
| पद की स्थिति | स्थायी रूप से रिक्त पद | आवश्यक नहीं कि पद रिक्त हो |
| उद्देश्य | निश्चित शर्तों के साथ नियुक्ति | भविष्य की नियमित नियुक्ति हेतु योग्यता जाँचना |
| पूर्व स्थिति | पहले से स्थायी हो या न हो — दोनों सम्भव | प्रायः किसी संवर्ग में पहले से स्थायी |
वेतन के मामले में भी अन्तर है। दूसरे संवर्ग में प्रोबेशनर के रूप में नियुक्त व्यक्ति को सामान्यतः उस पद की आरम्भिक दर में न्यूनतम वेतन मिलेगा। किन्तु एक ही विभाग में चयन द्वारा पदोन्नति का मामला भिन्न है — वहाँ आरम्भिक वेतन उस समय प्रभावी सामान्य वेतन-फिक्सेशन नियमों से तय होगा।
8. माह की गणना — दृष्टान्त (ग) क्यों अलग है
पहले दो दृष्टान्त सीधे हैं — पूरे मास गिनो, फिर दिन जोड़ो। किन्तु दृष्टान्त (ग), जो 1985 में जोड़ा गया, एक अलग स्थिति दिखाता है।
2 जनवरी से 1 मार्च तक की अवधि को यदि साधारण रीति से गिनें तो 1 माह 31 दिन बनता है। पर 30 दिन के माह के आधार पर उन 31 दिनों में से 30 दिन एक और माह बन जाते हैं, और 1 दिन बचता है — इसलिए उत्तर 2 माह 1 दिन होता है। यह भेद अवकाश और पेंशन-गणना दोनों में मायने रखता है।
9. वेतन में प्रेक्टिस-बन्दी भत्ता
चिकित्सा अधिकारियों के लिए टिप्पणी 3 और 4 अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। प्रेक्टिस-बन्दी भत्ता (NPA) दस निर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए वेतन में गिना जाता है — पेंशन एवं उपदान, अवकाश वेतन, कुछ शर्तों के साथ विदेश सेवा प्रतिनियुक्ति, प्रशिक्षण, वास-सुविधा किराया, पदभार ग्रहण काल और विदेशों में प्रशिक्षण।
साथ में एक कड़ी शर्त भी है — भत्ता लेने वाला चिकित्सक किसी भी रूप में प्राइवेट प्रेक्टिस नहीं करेगा, और हर वेतन बिल पर इस आशय का प्रमाण-पत्र अभिलिखित करेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
संदर्भ
- राजस्थान सेवा नियम — वित्त विभाग, राजस्थान सरकार (PDF)
- भारतीय संविधान, अनुच्छेद 266 एवं 309 — Indian Kanoon
- वित्त विभाग, राजस्थान सरकार — आधिकारिक वेबसाइट
- राजस्थान सरकार — rajasthan.gov.in


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