नियम 14-19: पदाधिकार संबंधित नियम | Rule 14-19: Designation Rules | राजस्थान सेवा नियम

📅 सोमवार, 27 जुलाई 2026 📖 पूरा लेख
नियम 14-19: पदाधिकार (लियन) | Rule 14-19: Lien | राजस्थान सेवा नियम

नियम 14 से 19: पदाधिकार (लियन) — नियुक्ति, निलम्बन, समाप्ति एवं स्थानान्तरण

Rules 14–19: Lien — Appointment, Suspension, Termination and Transfer of Lien
अध्याय: राजस्थान सेवा नियम, 1951 — खण्ड I, भाग 1  |  नियम: 14, 15, 16, 17, 18, 19  |  पृष्ठ: 109–123
एक नज़र में

नियम 14 — एक पद, एक कर्मचारी

नियम 15 — पदाधिकार कब प्राप्त होता है

नियम 16 — पदाधिकार कब बना रहता है

नियम 17 — पदाधिकार का निलम्बन एवं पुनःप्रतिस्थापन

नियम 18 — पदाधिकार का समाप्त करना

नियम 19 — पदाधिकार का स्थानान्तरण

अंग्रेजी पर्याय: Lien

राजस्थान सेवा नियम, 1951 के नियम 14 से 19 तक का पूरा समूह एक ही विषय — पदाधिकार (Lien) — से संबंधित है। पदाधिकार वह अधिकार है जो किसी कर्मचारी को स्थायी पद पर स्थायी नियुक्ति मिलने पर उस पद पर प्राप्त होता है। इन छह नियमों में यह बताया गया है कि पदाधिकार कब मिलता है, कब बना रहता है, कब निलम्बित होता है, कब पुनः प्रतिस्थापित होता है, कब समाप्त होता है और कब स्थानान्तरित किया जा सकता है। इसीलिए इन्हें एक साथ पढ़ना आवश्यक है।

1. मूल पाठ

नियम 14

(क) एक समय में एक स्थाई पद पर, दो या दो से अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति स्थाई रूप से नहीं की जा सकती है।

(ख) एक कर्मचारी एक ही समय, अस्थाई रूप से नियुक्ति के अतिरिक्त, दो या दो से अधिक पदों पर स्थाई रूप से नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

(ग) एक कर्मचारी किसी ऐसे पद पर स्थाई रूप से नियुक्त नहीं किया जा सकता है जिस पद पर किसी अन्य व्यक्ति का पदाधिकार हो।

नियम 15. पदाधिकार (लियन)

जब तक इन नियमों में कोई विशेष प्रावधान नहीं हो, एक कर्मचारी किसी स्पष्ट रूप से रिक्त स्थाई पद पर, स्थाई रूप से नियुक्त किये जाने पर उस पद पर अपना पदाधिकार प्राप्त कर लेता है तथा तत्पश्चात्, किसी अन्य पद पर पूर्व में अर्जित पदाधिकार समाप्त हो जाता है।

नियम 16

जब तक किसी कर्मचारी का पदाधिकार इन नियमों के नियम 17 के अनुसार निलम्बित नहीं कर दिया जाता अथवा नियम 19 के अनुसार स्थानान्तरण नहीं कर दिया जाता, तब तक वह स्थायी पद को धारण करते हुए उसी पद पर अपना पदाधिकार निम्नलिखित परिस्थितियों में भी बनाये रखेगा :

(क) जब वह उस पद का कार्य कर रहा हो;

(ख) जब वह विदेश सेवा में हो अथवा किसी दूसरे पद पर अस्थाई या कार्यवाहक रूप से कार्य कर रहा हो;

(ग) दूसरे पद पर कार्य ग्रहण करने की (during joining time) अवधि में, यदि वह पूर्व के कनिष्ठ वेतन वाले पद पर स्थायी रूप से स्थानान्तरित नहीं कर दिया गया हो। ऐसे मामले में जिस दिन वह अपने पुराने पद के कार्यभार से मुक्त हुआ, तब से उसका पदाधिकार नये पद पर स्थानान्तरित कर दिया जायेगा;

(घ) जब वह अवकाश पर रहे; एवं

(ङ) जब वह निलम्बित रहे।

नियम 17. पदाधिकार का निलम्बन

(क) यदि एक कर्मचारी निम्नलिखित पदों में से किसी एक पद पर स्थाई रूप से नियुक्त हो जाता है तो सरकार उसका पदाधिकार उस स्थाई पद से अवश्य निलम्बित करेगी जिसे वह पूर्व में मूल रूप में धारण कर रहा है:

(i) किसी सावधि पद पर; या

(ii) [विलोपित।]

(iii) अन्तःकालीन रूप से किसी पद, जिस पर अन्य कर्मचारी अपना पदाधिकार रखता, यदि उसका पदाधिकार इस नियम के अन्तर्गत, निलम्बित नहीं कर दिया जाता।

(ख) यदि कोई कर्मचारी भारत से बाहर प्रतिनियुक्ति पर भेज दिया जाता है या वैदेशिक सेवा में स्थानान्तरित कर दिया जाता है या इस नियम के खण्ड (क) के अन्तर्गत नहीं आने वाली परिस्थितियों में किसी दूसरे संवर्ग में एक पद पर [स्थानापन्न रूप से स्थानान्तरित कर दिया जाता है] एवं यदि उक्त मामलों में से किसी में सरकार को यह सन्तोष हो जाये कि वह कर्मचारी जिस पद पर अपना पदाधिकार रखता है, उस पद से 3 वर्ष की अवधि तक अनुपस्थित रहेगा तो सरकार उस कर्मचारी का उस पद से पदाधिकार अपनी ओर से, विवेकानुसार, निलम्बित कर सकती है।

(ग) इस नियम के खण्ड (क) तथा (ख) में कुछ भी उल्लेख होते हुए भी एक कर्मचारी का किसी सावधि पद से पदाधिकार किसी भी परिस्थिति में निलम्बित नहीं किया जा सकेगा। यदि वह किसी अन्य स्थायी पद पर स्थायी रूप से नियुक्त कर दिया जाता है तो सावधि पद से उसका पदाधिकार आवश्यक रूप से समाप्त ही किया जाना चाहिए।

(घ) यदि किसी कर्मचारी का पदाधिकार इस नियम के खण्ड (क) अथवा (ख) के अनुसार निलम्बित कर दिया जाता है तो उस पद को तब स्थायी रूप से भरा जा सकता है तथा ऐसे पद पर नियुक्त किया गया कर्मचारी उस पर अपना पदाधिकार बनाये रख सकेगा किन्तु जैसे ही निलम्बित पदाधिकार पुनः प्रतिस्थापित (रिवाइव) कर दिया जाये, वैसे ही उक्त व्यवस्था पुनः बदल दी जायेगी।

टिप्पणी — उक्त खण्ड के अनुसार ऐसा पद स्थाई रूप से भरा जा सकता है तो भी वह नियुक्ति अन्तःकालीन नियुक्ति (प्रोविजनल) कहलायेगी एवं कर्मचारी उस पर अपना अन्तःकालीन पदाधिकार ही रखेगा। वह पदाधिकार भी इस नियम के खण्ड (क) या (ख) के अनुसार निलम्बित किया जा सकता है।

(ङ) निलम्बित पदाधिकार का पुनःप्रतिस्थापन : एक कर्मचारी का पदाधिकार, जिसे इस नियम के खण्ड (क) के अनुसार निलम्बित किया जा सकता है, जैसे ही वह कर्मचारी इस खण्ड के उपखण्ड (i), (ii) या (iii) में उल्लिखित प्रकृति के कारण उस पद पर अपना पदाधिकार समाप्त कर देता है तो उसका पूर्व में निलम्बित पदाधिकार पुनः प्रतिस्थापित हो जाता है।

(च) एक कर्मचारी का पदाधिकार जो इस नियम के खण्ड (ख) के अनुसार निलम्बित किया जा चुका है, उसी समय पुनः प्रतिस्थापित किया जायेगा जब वह कर्मचारी भारत से बाहर प्रतिनियुक्ति पर रहना समाप्त कर दे, या विदेश सेवा में रहना समाप्त कर दे, या दूसरे संवर्ग में कार्य करना बन्द कर दे। किन्तु शर्त यह है कि एक निलम्बित पदाधिकार पुनः प्रतिस्थापित नहीं किया जायेगा यदि वह कर्मचारी अवकाश ले लेता है और उसके बारे में यह सुनिश्चित हो जाये कि अवकाश से लौट आने पर वह भारत से बाहर या पुनः विदेश-सेवा में प्रतिनियुक्ति पर चलता रहेगा या अन्य संवर्ग में कार्य करता रहेगा तथा उसकी सेवा से अनुपस्थिति की कुल अवधि 3 वर्ष से कम नहीं होगी अथवा वह इस नियम के खण्ड (क) के उपखण्ड (i), (ii) या (iii) में अंकित पदों पर स्थाई रूप से कार्य करता रहेगा।

टिप्पणी — जब यह ज्ञात हो जाये कि कर्मचारी, जो अपने संवर्ग के बाहर किसी पद पर स्थानान्तरित हो गया है, अपने स्थानान्तरण से 3 वर्ष की अवधि में विश्राम-वृत्ति आयु प्राप्त करने के कारण सेवा-निवृत्त होने वाला है, तो स्थाई पद से उसका पदाधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता है।

नियम 18. पदाधिकार का समाप्त करना

(क) एक कर्मचारी के पदाधिकार को किसी पद से किसी परिस्थिति में समाप्त नहीं किया जा सकता, वह पदाधिकार उसकी सहमति से भी समाप्त नहीं किया जा सकता है यदि उसके फलस्वरूप उसे किसी स्थायी पद पर अपने पदाधिकार अथवा निलम्बित पदाधिकार से वंचित रहना पड़े।

(ख) एक कर्मचारी का किसी पद से पदाधिकार, जिस संवर्ग में वह नियुक्त किया हुआ है, उसके अतिरिक्त अन्य संवर्ग से (सरकार या केन्द्रीय/अन्य राज्य सरकार के अधीन) किसी स्थायी पद पर मूल नियुक्ति हो जाने के कारण, समाप्त हो जायेगा।

टिप्पणी 1 — [विलोपित]

टिप्पणी 2 — इस नियम के प्रावधान एक अधिकारी के लिए उस दिन से स्थगित माने जायेंगे जब वह संघीय अथवा राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष या सदस्य नियुक्त कर दिया जाये। आयोग में नियुक्ति होते ही सरकारी पद से उसका पदाधिकार समाप्त हो जायेगा।

राजस्थान सरकार के निर्णय (नियम 18 से संबंधित)

निर्णय 1 — विलीन देशी राज्यों के कर्मचारी

राजस्थान राज्य में विलीन देशी राज्यों के स्थायी कर्मचारीगण, जो राजस्थान के निर्माण के समय या बाद में एकीकरण की प्रक्रिया में अस्थायी पदों पर आमेलित किये गये थे और जिन्हें पदाधिकार प्राप्त नहीं हुआ, उनके पदाधिकार, वेतन एवं पेंशन आदि के प्रश्न पर सरकार ने विचार कर निम्नलिखित आज्ञा दी है :

(1) उन कर्मचारियों के सम्बन्ध में जिनको किसी स्थायी पद पर उनका पदाधिकार रखे बिना अथवा अधिशेष घोषित किये बिना अस्थायी (या कार्यवाहक) पदों पर लगा दिया गया था, उनका पदाधिकार उसी वेतन शृंखला में अधिसंख्य पदों का सृजन कर रखा जा सकता है ताकि सम्बन्धित कर्मचारी विलीन हुए राज्यों में अपने अन्तिम स्थायी पद के पदाधिकार का लाभ प्राप्त कर सकें और उन्हें राजस्थान में एकीकृत वेतनमान आदि मिल सकें। उपर्युक्त प्रकार के पद वर्तमान में 31 मई, 1956 तक सृजित किये समझे जायेंगे। ये पद जैसे-जैसे सम्बन्धित कर्मचारी स्थायी पदों पर नियोजित होते जायेंगे, वैसे-वैसे कम होते जायेंगे। सभी ऐसे व्यक्तियों को इस अवधि में स्थायी पदों पर नियुक्त कर दिया जाना चाहिए या अधिशेष घोषित करके सेवा से मुक्त कर दिया जाना चाहिये। यदि आवश्यक हो तो अस्थायी रूप से उन्हें पुनः नियुक्त किया जा सकता है। इस श्रेणी के कर्मचारियों को स्थायी पदों पर नियुक्त करने के मामलों में पूर्णतया अस्थायी कर्मचारियों की तुलना में प्राथमिकता दी जानी चाहिये।

(2) (क) इस श्रेणी के कर्मचारी जो पूर्व में अधिशेष घोषित कर दिये गये थे किन्तु वास्तव में उन्हें बिना हटाये अस्थायी पदों पर कार्य करने के लिये स्वीकृति दे दी गई या उन्हें किसी पद पर अस्थायी रूप से काम करने की स्वीकृति दे दी गई चाहे उस पद पर या उसके समान पद पर वे नियुक्त रहे हों या नहीं, उन्हें अन्तिम मूल वेतन तथा वार्षिक वृद्धि प्राप्त करने की स्वीकृति दी जाती है। कोई अस्थायी वेतन आरक्षित नहीं किया जायेगा। यदि उनके पूर्व के पद का मूल वेतन नये पद के अधिकतम वेतन से अधिक हो तो ऐसे कर्मचारियों का वेतन नवीन पद के अधिकतम स्तर पर निश्चित किया जायेगा तथा मूल वेतन एवं अधिकतम वेतन के बीच के अन्तर की राशि को व्यक्तिगत वेतन के रूप में स्वीकृति दी जायेगी। ऐसे कर्मचारियों की सेवायें पेंशन योग्य मानने के लिए उसी वेतनमान में अधिसंख्य पद सृजित किये जाने चाहिये जिन पर वे कर्मचारी अन्तर्लीन हुए राज्यों में स्थायी रूप से पद धारण किये हुए हों।

(ख) जो कर्मचारी अतिरिक्त (सरप्लस) घोषित किये जाकर हटा दिये गये थे, उनके मामले पुनः नहीं उठाये जायेंगे। यदि उनमें से किसी व्यक्ति के मामले पर पुनः विचार किया गया हो या उसे पुनः नियुक्त कर दिया गया हो तो उसको वेतन, उसके पूर्व में अन्तिम रूप से प्राप्त किये गये मूल वेतन से अधिक नहीं दिया जायेगा और उस पद के अधिकतम वेतन से अधिक नहीं होगा जिस पर उसे पुनः नियुक्त किया गया हो।

(ग) यदि उन कर्मचारियों में से जो किसी भी स्थायी पद पर अपना पदाधिकार नहीं रखते हों, किन्तु उन्होंने 25 वर्ष की सेवा पूर्ण कर ली है अथवा 50 वर्ष के हो गये हैं तो उन कर्मचारियों को भी अधिशेष मानकर सेवानिवृत्त किया जा सकता है एवं यदि आवश्यक हो तो उन्हें पुनः नियुक्त किया जा सकता है।

निर्णय 2 — [विलोपित]

निर्णय 3 — अधिसंख्य (सुपरन्यूमेरी) पदों का सृजन

इस प्रश्न पर गत समय में विचार किया जाता रहा है कि किन परिस्थितियों में अधिसंख्य पदों का सृजन किया जाना चाहिये एवं ऐसे पदों को नियमित कराने के क्या सिद्धान्त होने चाहिए। प्रश्न पर सावधानी से विचार किया गया है तथा ऐसे पदों के सृजन को नियमित करने के लिये निम्न अंकित सिद्धान्त निर्धारित किये जाते हैं :

(i) सामान्यतः अधिसंख्य (सुपरन्यूमेरी) पद किसी ऐसे अधिकारी को 'पदाधिकार' उपलब्ध कराने के लिये सृजित किये जाते हैं जो ऐसा पद सृजित करने वाले सक्षम प्राधिकारी के विचार से, नियमित स्थायी पद पर पदाधिकार रखने का अधिकारी हो एवं जो नियमित स्थायी पद के अभाव में ऐसे पद पर अपना पदाधिकार नहीं रख सकता है।

(ii) ये कल्पित पद होते हैं अर्थात् ऐसे पदों के साथ कोई कर्त्तव्य लगा नहीं होता। अधिकारी, जिसका पदाधिकार ऐसे पद पर रखा जाता है, सामान्यतया किसी अन्य रिक्त अस्थायी पद या स्थायी पद पर कर्त्तव्यरत रहकर कार्य निष्पादन करता है।

(iii) ऐसे पद केवल उसी स्थिति में सृजित किए जा सकते हैं, जब उस कर्मचारी के लिये, जिसका पदाधिकार अधिसंख्य पद का सृजन कर रखा जाता है, अन्य रिक्त पद उपलब्ध नहीं हों। दूसरे शब्दों में ये पद ऐसी परिस्थिति में सृजित नहीं किये जाने चाहिये जो पद के सृजन के समय या उसके बाद विद्यमान नियमित पदों की संख्या से अधिक हो जायें।

(iv) ऐसे पद सदैव स्थायी होते हैं। इनका सृजन तब तक के लिये होता है जब किसी अधिकारी द्वारा किसी नियमित स्थायी पद पर पदाधिकार प्राप्त नहीं कर लिया जाता, तब तक पदाधिकार देने के लिए किया जाता है। अतः ऐसे अधिसंख्य पद अन्य स्थायी पदों की भाँति अनिश्चित काल के लिए सृजित नहीं किये जाने चाहिये वरन् व्यक्ति विशेष की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए निश्चित अवधि के लिए सृजित होने चाहिये।

(v) अधिसंख्य पद एक ऐसे अधिकारी के लिए व्यक्तिगत पद होता है जिसके लिए वह विशिष्ट रूप से सृजित किया जाता है तथा ऐसे पद पर किसी अन्य अधिकारी को नियुक्त नहीं किया जा सकता। यह उसी समय समाप्त हो जाता है जब अधिकारी, जिसके लिए यह सृजित किया गया था, सेवानिवृत्ति अथवा किसी अन्य नियमित स्थायी पद पर स्थायीकरण या अन्य किसी कारण से इसे रिक्त करता है। दूसरे शब्दों में ऐसे पद पर कोई स्थानापन्न व्यवस्था नहीं की जा सकती है।

(vi) बढ़े हुए वेतन एवं भत्ते, पेंशन सम्बन्धी लाभ आदि के रूप में ऐसे पदों के सृजन में कोई अतिरिक्त वित्तीय दायित्व सम्मिलित नहीं होता।

पूर्व में कुछ मामले ऐसे हो चुके हैं जिनमें वरिष्ठता, पात्रता आदि के परिवर्तन के कारण यह अनुभव किया गया है कि किसी एक व्यक्ति को पदोन्नति प्राप्त नहीं हो सकी जिसे वह प्राप्त करता यदि बाद में लिया गया निर्णय समय पर ले लिया गया होता तथा ऐसे व्यक्तियों को अधिसंख्य पदों को पूर्व प्रभाव से सृजित कर उन पर उनकी पूर्व प्रभाव से नियुक्ति कर उच्चतर वेतन का लाभ दिया गया है। इस प्रकार के प्रयोजनों के लिए ऐसे पदों का सृजन भविष्य में नहीं किया जाए। अधिकतम उस वेतनमान में जिसके लिए वह आशा करता है, उसी स्थिति तक लाने हेतु अग्रिम वेतन वृद्धि देने के प्रस्ताव पर विचार किया जा सकता है।

सभी प्रशासनिक विभागों से अनुरोध किया जाता है कि वे अधिसंख्य पदों के सृजन के मामले केवल ऊपर उल्लिखित परिस्थितियों के अधीन ही भेजें। यह आदेश पूर्व में उपर्युक्त प्रक्रिया-विधि के अतिरिक्त अन्य प्रकार से निपटाये गये मामलों पर प्रभाव नहीं डालेगा।

निर्णय 4 — [विलोपित]

निर्णय 5 — पूर्व प्रभाव से पदोन्नति

वित्त विभाग के ज्ञापन दिनांक 26.10.1961 (उपर्युक्त निर्णय सं. 3) के अनुच्छेद 1 (vi) को उपान्तरित करते हुए यह आदेश दिया जाता है कि उच्चतर अधिसंख्य पद सृजन कर या पदों को क्रमोन्नत कर पूर्व प्रभाव से पदोन्नतियाँ निम्नलिखित मामलों में वित्त विभाग की विशेष अनुमति से दी जा सकती हैं :

(क) किसी न्यायालय के निर्णय की अनुपालना में या फलस्वरूप।
(ख) राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अधीन भारत सरकार के निर्देशनों की पालना में यदि राज्य सरकार द्वारा ऐसा निर्देशन मान लिया गया हो।
(ग) सरकार या सरकार के अधीन सक्षम प्राधिकारी की ओर से पात्रता के निर्धारण में या वरिष्ठता के निर्धारण में वास्तविक त्रुटि वहाँ हो जहाँ वह वास्तविक आँकड़ों से सम्बन्धित "अंकों" पर निश्चित की जाती हो।
(घ) सेवा के एकीकरण की प्रक्रिया में चयन से सम्बन्धित नियमों/आदेशों का गलत प्रयोग या अनुपालना।

फिर भी निम्न प्रकार के मामलों में पूर्व प्रभाव से पदों को सृजित/क्रमोन्नत कर पदोन्नति नहीं की जानी चाहिए :

(क) जहाँ प्रथम बार वरिष्ठता निश्चित की जाती हो।
(ख) जहाँ सिद्धान्तों में परिवर्तन कर वरिष्ठता पुनः निश्चित की जाती हो।
(ग) जहाँ दक्षता (मैरिट) के पुनर्निर्धारण द्वारा वरिष्ठता पुनः निश्चित की जाती हो।
(घ) जहाँ दक्षता के पुनर्निर्धारण द्वारा उच्चतर पद पर बाद में चयन किया हो।

निर्णय 6 — पुनर्विचार की व्यवस्था

वित्त विभाग के आदेश दिनांक 17.7.1967 (निर्णय संख्या 5) के अनुसार वित्त विभाग की अनुमति से उक्त आदेश के अनुच्छेद 1 में वर्णित मामलों में अधिसंख्य पदों का सृजन कर या पदों को क्रमोन्नत कर पूर्व प्रभाव से पदोन्नति दी जा सकती है।

एक प्रश्न उत्पन्न हुआ कि क्या ऐसे मामलों पर, जो उक्त आदेश जारी होने से पूर्व हुए हैं तथा जिनमें पूर्व प्रभाव से पदोन्नति नहीं दी गई थी एवं/या पुनः स्थिरीकरण का लाभ ही स्वीकृत/अस्वीकृत किया गया था, पुनः विचार किया जा सकता है तथा उक्त आदेश के अनुसार तय किया जा सकता है। मामले की जाँच कर ली गई है तथा यह निर्णय किया गया कि चूँकि पूर्व प्रभाव से पदोन्नति देने का निर्णय सरकार द्वारा दिनांक 8.7.1966 को लिया गया था (यद्यपि आदेश दिनांक 17.7.1967 को जारी किया गया है)। अतः उक्त सभी कर्मचारियों के मामले जो दिनांक 8.7.1967 को या उसके बाद सेवानिवृत्त हुए हैं उक्त आदेश के अनुसार पुनः विचार कर निपटारा किया जाए। सम्बन्धित सरकारी कर्मचारी द्वारा इस बारे में विशिष्ट रूप से लिखित निवेदन किया जाए।

नियम 19. पदाधिकार का स्थानान्तरण

नियम 20 के प्रावधानों को ध्यान में रखकर सरकार किसी राज्य कर्मचारी के पदाधिकार को उसी संवर्ग के दूसरे स्थायी पद पर स्थानान्तरित कर सकती है, यदि वह कर्मचारी उस पद का कार्य नहीं कर सकता जिस पर उसका पदाधिकार था, चाहे वह पदाधिकार निलम्बित ही क्यों न हो।

2. व्याख्या

पदाधिकार (लियन) क्या है

पदाधिकार किसी कर्मचारी का उस स्थायी पद पर बना रहने वाला वैधानिक हक है, जिस पर उसे स्थायी रूप से नियुक्त किया गया है। यह हक कर्मचारी के उस पद पर वर्तमान में उपस्थित होने से नहीं जुड़ा होता — कर्मचारी अवकाश पर हो, प्रतिनियुक्ति पर हो, निलम्बित हो या किसी दूसरे पद पर कार्यवाहक रूप से काम कर रहा हो, फिर भी उसका पदाधिकार मूल पद पर बना रह सकता है। इसी कारण पदाधिकार को सेवा-सुरक्षा का आधार माना जाता है।

नियम 14 — "एक पद, एक कर्मचारी" का सिद्धान्त

नियम 14 तीन निषेध बताता है और तीनों का उद्देश्य एक ही है — पद और व्यक्ति के बीच एक-से-एक (one-to-one) संबंध बनाये रखना :

  • एक स्थायी पद पर एक साथ दो व्यक्ति स्थायी नहीं हो सकते।
  • एक व्यक्ति एक साथ दो स्थायी पद धारण नहीं कर सकता (अस्थायी नियुक्ति इसका अपवाद है)।
  • जिस पद पर किसी और का पदाधिकार पहले से है, उस पद पर दूसरे को स्थायी नियुक्ति नहीं दी जा सकती।

यही कारण है कि किसी पद पर स्थायी नियुक्ति से पहले यह देखना अनिवार्य होता है कि वह पद "स्पष्ट रूप से रिक्त" है या नहीं।

नियम 15 — पदाधिकार कब प्राप्त होता है

नियम 15 के अनुसार पदाधिकार तीन शर्तें एक साथ पूरी होने पर ही मिलता है : पद स्थायी हो, वह स्पष्ट रूप से रिक्त हो, और नियुक्ति स्थायी रूप से की गई हो। इनमें से कोई एक शर्त भी अधूरी हो तो पदाधिकार अर्जित नहीं होता। साथ ही, नये पद पर पदाधिकार मिलते ही पुराने पद का पदाधिकार अपने आप समाप्त हो जाता है — दो पदों पर एक साथ पदाधिकार संभव नहीं।

नियम 16 — पदाधिकार कब बना रहता है

नियम 16 पाँच परिस्थितियाँ गिनाता है जिनमें कर्मचारी मूल पद पर उपस्थित न होते हुए भी पदाधिकार बनाये रखता है : पद का कार्य करते हुए, विदेश सेवा/अन्य पद पर कार्यवाहक रहते हुए, कार्यग्रहण अवधि (joining time) में, अवकाश के दौरान और निलम्बन के दौरान। ध्यान देने योग्य बात यह है कि निलम्बन (suspension from duty) से पदाधिकार समाप्त नहीं होता — यह दो अलग-अलग बातें हैं।

खण्ड (ग) में एक व्यावहारिक स्थिति स्पष्ट की गई है : यदि कर्मचारी कनिष्ठ वेतन वाले पद पर स्थायी रूप से स्थानान्तरित नहीं किया गया है, तो कार्यभार से मुक्त होने के दिन से ही उसका पदाधिकार नये पद पर चला जाता है।

नियम 17 — निलम्बन एवं पुनःप्रतिस्थापन

यहाँ "निलम्बन" का अर्थ कर्मचारी का निलम्बन नहीं, बल्कि पदाधिकार का अस्थायी रूप से रुक जाना है। नियम 17 दो प्रकार के निलम्बन बताता है :

प्रकारकबनिर्णय
खण्ड (क) — अनिवार्यसावधि पद पर या अन्तःकालीन रूप से ऐसे पद पर स्थायी नियुक्ति, जिस पर किसी अन्य का पदाधिकार हैसरकार को निलम्बित करना ही होगा
खण्ड (ख) — विवेकाधीनभारत से बाहर प्रतिनियुक्ति, वैदेशिक सेवा, या दूसरे संवर्ग में स्थानापन्न स्थानान्तरण — और अनुपस्थिति 3 वर्ष तक रहने की सम्भावनासरकार अपने विवेक से निलम्बित कर सकती है

महत्वपूर्ण अपवाद — खण्ड (ग) के अनुसार सावधि पद से पदाधिकार किसी भी परिस्थिति में निलम्बित नहीं किया जा सकता; वहाँ या तो पदाधिकार बना रहेगा या समाप्त किया जायेगा।

पद का भरा जाना — पदाधिकार निलम्बित होने पर वह पद स्थायी रूप से भरा जा सकता है, किन्तु टिप्पणी के अनुसार वह नियुक्ति अन्तःकालीन (प्रोविजनल) मानी जायेगी। जैसे ही मूल कर्मचारी का पदाधिकार पुनः प्रतिस्थापित होता है, व्यवस्था पूर्ववत हो जाती है।

पुनःप्रतिस्थापन — खण्ड (ङ) और (च) बताते हैं कि निलम्बित पदाधिकार तब जीवित होता है जब निलम्बन का कारण समाप्त हो जाये — प्रतिनियुक्ति/वैदेशिक सेवा/अन्य संवर्ग का कार्य समाप्त होने पर। परन्तु यदि कर्मचारी अवकाश लेकर लौटने के बाद पुनः उसी स्थिति में जाने वाला हो और कुल अनुपस्थिति 3 वर्ष से कम न हो, तो पुनःप्रतिस्थापन नहीं होगा।

सेवानिवृत्ति की सुरक्षा — टिप्पणी के अनुसार यदि संवर्ग के बाहर स्थानान्तरित कर्मचारी 3 वर्ष के भीतर सेवानिवृत्त होने वाला है, तो उसका पदाधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान सेवा के अन्तिम वर्षों में कर्मचारी को संरक्षण देता है।

नियम 18 — समाप्ति पर रोक

नियम 18(क) कर्मचारी के पक्ष में एक कड़ा संरक्षण है : पदाधिकार कर्मचारी की सहमति से भी समाप्त नहीं किया जा सकता, यदि इसका परिणाम यह हो कि वह किसी स्थायी पद पर अपने पदाधिकार या निलम्बित पदाधिकार से वंचित हो जाये। अर्थात् कर्मचारी स्वयं भी अपनी सेवा-सुरक्षा नहीं छोड़ सकता।

नियम 18(ख) समाप्ति की एकमात्र स्वाभाविक स्थिति बताता है — जब कर्मचारी अपने संवर्ग से बाहर, किसी अन्य संवर्ग (राज्य सरकार, केन्द्रीय सरकार या अन्य राज्य सरकार के अधीन) में किसी स्थायी पद पर मूल नियुक्ति प्राप्त कर लेता है। टिप्पणी 2 के अनुसार लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष/सदस्य नियुक्त होते ही सरकारी पद से पदाधिकार समाप्त हो जाता है।

अधिसंख्य (सुपरन्यूमेरी) पद — निर्णय 3 का सार

राजस्थान सरकार के निर्णयों में अधिसंख्य पद की अवधारणा विस्तार से दी गई है। संक्षेप में :

  • यह एक कल्पित पद है, जिसके साथ कोई कर्त्तव्य नहीं जुड़ा होता।
  • इसका एकमात्र उद्देश्य ऐसे अधिकारी को पदाधिकार उपलब्ध कराना है, जिसके लिए नियमित स्थायी पद उपलब्ध नहीं है।
  • यह व्यक्तिगत पद होता है — किसी अन्य अधिकारी को उस पर नियुक्त नहीं किया जा सकता, न ही उस पर स्थानापन्न व्यवस्था हो सकती है।
  • यह सदैव स्थायी प्रकृति का होता है, परन्तु निश्चित अवधि के लिए ही सृजित होना चाहिए।
  • यह उसी क्षण समाप्त हो जाता है जब सम्बन्धित अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाये या नियमित स्थायी पद पर स्थायी हो जाये।

निर्णय 5 में स्पष्ट किया गया है कि पूर्व प्रभाव से पदोन्नति केवल चार परिस्थितियों — न्यायालय के निर्णय, राज्य पुनर्गठन अधिनियम के निर्देश, पात्रता/वरिष्ठता निर्धारण में वास्तविक त्रुटि, तथा एकीकरण में नियमों के गलत प्रयोग — में वित्त विभाग की विशेष अनुमति से ही दी जा सकती है।

नियम 19 — स्थानान्तरण

नियम 19 सरकार को यह शक्ति देता है कि वह पदाधिकार को उसी संवर्ग के किसी दूसरे स्थायी पद पर स्थानान्तरित कर दे, बशर्ते कर्मचारी उस मूल पद का कार्य करने में असमर्थ हो। इसमें तीन बातें ध्यान देने योग्य हैं :

  • स्थानान्तरण केवल उसी संवर्ग के भीतर हो सकता है।
  • निलम्बित पदाधिकार भी स्थानान्तरित किया जा सकता है।
  • यह शक्ति नियम 20 के प्रावधानों के अधीन है, जो कम वेतन वाले पद पर स्थानान्तरण को प्रतिबंधित करता है।

छहों नियमों का पारस्परिक संबंध

नियमप्रश्न जिसका उत्तर देता है
नियम 14क्या एक पद पर एक से अधिक व्यक्ति हो सकते हैं?
नियम 15पदाधिकार कब और कैसे प्राप्त होता है?
नियम 16अनुपस्थिति की स्थिति में पदाधिकार बना रहता है या नहीं?
नियम 17पदाधिकार कब रुकता है और कब पुनः जीवित होता है?
नियम 18पदाधिकार कब पूर्णतः समाप्त होता है?
नियम 19पदाधिकार दूसरे पद पर कब भेजा जा सकता है?

3. प्रश्नोत्तर (FAQ)

प्र. 1 — क्या निलम्बित (suspended) कर्मचारी का पदाधिकार समाप्त हो जाता है?

नहीं। नियम 16(ङ) के अनुसार निलम्बन की अवधि में भी कर्मचारी का पदाधिकार उसी स्थायी पद पर बना रहता है। कर्मचारी का निलम्बन और पदाधिकार का निलम्बन दो अलग-अलग विषय हैं।

प्र. 2 — क्या एक कर्मचारी दो स्थायी पदों पर एक साथ पदाधिकार रख सकता है?

नहीं। नियम 14(ख) इसे स्पष्ट रूप से वर्जित करता है और नियम 15 के अनुसार नये पद पर पदाधिकार प्राप्त होते ही पुराने पद का पदाधिकार स्वतः समाप्त हो जाता है।

प्र. 3 — प्रतिनियुक्ति पर जाने से पदाधिकार पर क्या असर पड़ता है?

सामान्यतः पदाधिकार बना रहता है (नियम 16(ख))। किन्तु यदि कर्मचारी भारत से बाहर प्रतिनियुक्ति पर या वैदेशिक सेवा में जाता है और सरकार को यह सन्तोष हो जाये कि वह 3 वर्ष तक मूल पद से अनुपस्थित रहेगा, तो नियम 17(ख) के अन्तर्गत सरकार अपने विवेक से पदाधिकार निलम्बित कर सकती है।

प्र. 4 — क्या कर्मचारी स्वयं अपना पदाधिकार छोड़ सकता है?

नहीं। नियम 18(क) के अनुसार पदाधिकार कर्मचारी की सहमति से भी समाप्त नहीं किया जा सकता, यदि इसके फलस्वरूप उसे किसी स्थायी पद पर अपने पदाधिकार या निलम्बित पदाधिकार से वंचित रहना पड़े।

प्र. 5 — केन्द्र सरकार में स्थायी नियुक्ति मिलने पर राज्य के पद का क्या होगा?

नियम 18(ख) के अनुसार अन्य संवर्ग (केन्द्रीय या अन्य राज्य सरकार के अधीन) में किसी स्थायी पद पर मूल नियुक्ति हो जाने पर राज्य के पद से पदाधिकार समाप्त हो जायेगा।

प्र. 6 — पदाधिकार निलम्बित होने पर वह पद खाली पड़ा रहता है क्या?

नहीं। नियम 17(घ) के अनुसार वह पद स्थायी रूप से भरा जा सकता है, किन्तु टिप्पणी के अनुसार ऐसी नियुक्ति अन्तःकालीन (प्रोविजनल) मानी जायेगी। मूल कर्मचारी का पदाधिकार पुनः प्रतिस्थापित होते ही व्यवस्था बदल दी जायेगी।

प्र. 7 — सेवानिवृत्ति के निकट कर्मचारी को क्या संरक्षण प्राप्त है?

नियम 17 की टिप्पणी के अनुसार, यदि संवर्ग से बाहर स्थानान्तरित कर्मचारी अपने स्थानान्तरण से 3 वर्ष की अवधि में सेवानिवृत्त होने वाला है, तो स्थायी पद से उसका पदाधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।

प्र. 8 — अधिसंख्य (सुपरन्यूमेरी) पद पर क्या नियमित कार्य किया जाता है?

नहीं। निर्णय 3(ii) के अनुसार ये कल्पित पद हैं जिनके साथ कोई कर्त्तव्य नहीं जुड़ा होता। अधिकारी अपना पदाधिकार इस पद पर रखते हुए वास्तविक कार्य किसी अन्य रिक्त पद पर करता है।

प्र. 9 — क्या पदाधिकार किसी दूसरे संवर्ग के पद पर स्थानान्तरित हो सकता है?

नहीं। नियम 19 केवल उसी संवर्ग के दूसरे स्थायी पद पर स्थानान्तरण की अनुमति देता है, और वह भी नियम 20 के प्रावधानों के अधीन।

प्र. 10 — सावधि (term) पद से पदाधिकार निलम्बित क्यों नहीं किया जा सकता?

नियम 17(ग) में यह स्पष्ट वर्जन है। सावधि पद की प्रकृति ही निश्चित अवधि की होती है, इसलिए वहाँ निलम्बन का कोई औचित्य नहीं। यदि कर्मचारी किसी अन्य स्थायी पद पर स्थायी रूप से नियुक्त हो जाता है, तो सावधि पद से पदाधिकार समाप्त ही किया जाना चाहिए।

4. कठिन शब्द एवं अर्थ

शब्दअंग्रेजीअर्थ
पदाधिकारLienस्थायी पद पर कर्मचारी का बना रहने वाला वैधानिक हक
संवर्गCadreसमान श्रेणी एवं वेतनमान के पदों का समूह
निलम्बन (पदाधिकार का)Suspension of lienपदाधिकार का अस्थायी रूप से रुक जाना
पुनःप्रतिस्थापनRevivalनिलम्बित पदाधिकार का पुनः जीवित होना
सावधि पदTenure postनिश्चित अवधि के लिए सृजित पद
अधिसंख्य पदSupernumerary postकर्त्तव्यरहित कल्पित पद, केवल पदाधिकार देने हेतु सृजित
स्थानापन्नOfficiatingकिसी पद पर अस्थायी रूप से कार्य करना
कार्यवाहकActing / Officiatingपद का कार्यभार अस्थायी रूप से सँभालना
अन्तःकालीनProvisionalअस्थायी/सशर्त प्रकृति की व्यवस्था
वैदेशिक सेवाForeign serviceसरकार के अतिरिक्त किसी अन्य नियोक्ता के अधीन सेवा
प्रतिनियुक्तिDeputationमूल विभाग से अन्य विभाग/संस्था में भेजा जाना
मूल नियुक्तिSubstantive appointmentस्थायी पद पर स्थायी रूप से की गई नियुक्ति
अधिशेषSurplusआवश्यकता से अधिक घोषित कर्मचारी
क्रमोन्नतUpgradedपद का उच्चतर वेतनमान में उन्नयन
कार्यग्रहण अवधिJoining timeएक पद से मुक्त होकर दूसरे पद पर कार्यभार लेने की अवधि
विश्राम-वृत्ति आयुSuperannuation ageसेवानिवृत्ति की निर्धारित आयु
व्यक्तिगत वेतनPersonal payवेतन-हानि की पूर्ति हेतु स्वीकृत अतिरिक्त राशि
विलोपितDeletedअधिसूचना द्वारा हटाया गया प्रावधान

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राजकीय संदर्भ

संदर्भित अधिसूचनाएँ

राजस्थान सेवा नियम, 1951 — खण्ड I, भाग 1, नियम 14 से 19 (पृष्ठ 109–123)
वित्त विभाग आदेश संख्या एफ. 7ए(31) वि.वि.-ए (नियम)/60, दिनांक 12.8.1960
वित्त विभाग के आदेश सं. 9798-11/55, एफ. 13/(34) एफ. 11/53, दिनांक 22.3.1956
वित्त विभाग के ज्ञापन सं. एफ. 1(25) वि.वि. (क) नियम/61, दिनांक 30.6.1961
वित्त विभाग के ज्ञापन सं. एफ. 1(38) वि.वि./ए/नियम/61, दिनांक 26.10.1961
वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(75) वि.वि. (व्यय नियम)/65, दिनांक 4.1.1966
वित्त विभाग के आदेश सं. एफ. 1(101) वि.वि./(व्यय नियम)/66, दिनांक 17.7.1967
वित्त विभाग के ज्ञापन सं. एफ. 1(101) वि.वि./(व्यय नियम)/66, दिनांक 10.10.1968
वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(65) वि.वि./व्यय-नियम/66, दिनांक 23.9.1966
वित्त विभाग की अधिसूचना सं. एफ. 1(94) वि.वि. (नियम)/66, दिनांक 15.10.1969
✍️ लेखक: सुरेंद्र सिंह चौहान
पूर्व शिक्षा अधिकारी, राजस्थान · 1991–2025 · शिक्षण, प्रशिक्षण एवं प्रशासन · परिचय
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