राजस्थान CCA Rules 1958 — नियम 1-37 सम्पूर्ण हिंदी गाइड | Rajasthan Civil Services Rules

📅 शनिवार, 2 मई 2026 📖 3-5 min read
राजस्थान सिविल सेवा (CCA) नियम 1958 — नियम 1–37 सम्पूर्ण हिंदी गाइड | SarkariServicePrep

राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958 Rajasthan Civil Services (Classification, Control & Appeal) Rules, 1958 — नियम 1 से 37 — सम्पूर्ण हिंदी पाठ

⚖️ महत्वपूर्ण: यह लेख शैक्षणिक एवं सूचनात्मक उद्देश्य से है। किसी विभागीय/कानूनी कार्यवाही में मूल नियम, नवीनतम संशोधन और सक्षम प्राधिकारी की सलाह को प्राथमिक मानें। सरकारी आदेश सदैव आधिकारिक राजस्थान राजपत्र से सत्यापित करें।
📋 CCA Rules 1958 — परिचय
पूरा नामराजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958
प्रभावी07 मई 1959
अनुच्छेदसंविधान अनुच्छेद 309
मुख्य प्रावधान
कुल भाग8
कुल नियम1 से 37
शास्तियाँ7 (नियम 14)
समय सीमाएँ
Auto-Suspension48 घंटे हिरासत पर
अपील3 माह (नियम 25)
पुनरीक्षण6 माह (नियम 32)
राज्यपाल3 वर्ष (नियम 34)
स्रोत
Official PDFDOP Rajasthan ↗
सम्बन्धितRSR Guide ↗
📄 Official Source: Rajasthan Civil Services (CCA) Rules, 1958 — Official PDF (DOP Rajasthan) | अंतिम संशोधन: राजस्थान राजपत्र से

राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958 — जिन्हें सामान्यतः CCA Rules 1958 कहा जाता है — राजस्थान सरकार के अधीन कार्यरत सरकारी कर्मचारियों के वर्गीकरण, अनुशासनिक नियंत्रण और अपील प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाला मूल नियम-संग्रह है। ये नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 309 के अधीन निर्मित हैं और 07 मई 1959 से प्रभावी हैं।

इस नियम-संग्रह में 8 भाग एवं नियम 1 से 37 सम्मिलित हैं, जो नियुक्ति से लेकर सेवानिवृत्ति तक कर्मचारी के विरुद्ध किसी भी अनुशासनिक कार्यवाही — निलम्बन, शास्ति, जांच, अपील, पुनरीक्षण — की सम्पूर्ण विधिक प्रक्रिया निर्धारित करते हैं। राजस्थान के अनुशासन नियम और RSR 1951 के साथ मिलकर ये सेवा विधि की त्रिभुज रचना करते हैं।

CCA Rules 1958 — 8 भागों का ढाँचा
भाग 1 सामान्य नियम 1–5 परिभाषाएँ, लागू होना भाग 2 वर्गीकरण नियम 6–11 4 वर्ग भाग 3–4 नियुक्ति+निलम्बन नियम 12–13 48 घंटे auto-suspension भाग 5 अनुशासन नियम 14–20 7 शास्तियाँ + जांच भाग 6 अपीलें नियम 21–31 परिसीमा 3 माह भाग 7 पुनरीक्षण नियम 32–34 6 माह | राज्यपाल 3 वर्ष भाग 8 प्रकीर्ण नियम 35–37 निरसन, संदेह निवारण, विशेष उपबंध

📘भाग 1 — सामान्य (General)

नियम 1 — संक्षिप्त नाम और प्रारंभ

नियम 1: (क) इन नियमों का संक्षिप्त नाम "राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958" है।

(ख) ये तुरंत प्रवृत्त होंगे।

नियम 2 — निर्वचन (Definitions)

नियम 2: जब तक संदर्भ द्वारा अन्यथा अपेक्षित न हो, इन नियमों में—

(क) किसी सरकारी कर्मचारी के संबंध में "नियुक्ति अधिकारी" से निम्नलिखित में से जो भी उच्चतम प्राधिकारी हो, वह अभिप्रेत है—

  1. (i) जिस सेवा का राजकीय कर्मचारी उस समय सदस्य है उस सेवा की श्रेणी में, नियुक्तियां करने में सक्षम प्राधिकारी, या
  2. (ii) जिस पद को राजकीय कर्मचारी उस समय धारण करता है उस पर नियुक्तियां करने में सशक्त प्राधिकारी, या
  3. (iii) जिस प्राधिकारी ने राजकीय कर्मचारी को उस सेवा, श्रेणी या पद, यथास्थिति, पर नियुक्त किया था, या
  4. (iv) जहाँ राज्य कर्मचारी किसी अन्य सेवा का स्थायी सदस्य होते हुए या अधिष्ठायी रूप से कोई अन्य स्थायी पद धारण करते हुये निरंतर सरकार के नियोजन में रहा है, वहाँ वह प्राधिकारी जिसने उसे उस सेवा में या उस सेवा की किसी श्रेणी में या उस पद पर नियुक्त किया था।
नोट 01: Inserted by Notification No. F. 16(2)Apptts. (A)/60 III, dated 2-6-60 and 24-8-60

परन्तु जहां सरकार ने या विभागाध्यक्ष ने किसी अधीनस्थ प्राधिकारी को अपनी शक्तियाँ सौंप दी हों तो नियम 23(2)(क)(ख) के प्रयोजनों के लिए सम्बन्धित विभागाध्यक्ष ही नियुक्ति प्राधिकारी होगा।

(ख) "आयोग" से राजस्थान लोक सेवा आयोग अभिप्रेत है।

(ग) 'अनुशासनिक कार्यवाही' से किसी सरकारी कर्मचारी पर शास्ति लगाने के संबंध में ऐसा प्राधिकारी अभिप्रेत है जो इन नियमों के अधीन उस पर ऐसी शास्ति लगाने के लिये सक्षम हो।

(घ) 'राजपत्र' से राजस्थान राजपत्र अभिप्रेत है।

(ङ) 'सरकार' से राजस्थान सरकार अभिप्रेत है।

(च) राजकीय कर्मचारी से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी सेवा का सदस्य है अथवा राजस्थान सरकार के अधीन कोई सिविल पद धारण किये हुए है और उसमें ऐसा कोई भी व्यक्ति सम्मिलित है जो बाहरी सेवा में है अथवा जिनकी सेवायें अस्थायी रूप से किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी को सौंप दी गई हैं तथा किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी की सेवा का वह व्यक्ति भी जिसकी सेवायें अस्थायी रूप से राज्य सरकार को सौंपी जा चुकी हो अथवा जो किसी संविदा के अंतर्गत राजस्थान सरकार की सेवा में है अथवा जो अन्य किसी राजकीय सेवा से निवृत हो चुका है और राजस्थान सरकार के अधीन पुनर्नियोजित कर लिया गया है, किन्तु इसमें ऐसा व्यक्ति सम्मिलित नहीं है जो भारत संघ अथवा किसी राज्य सरकार की सिविल सेवा का है व राजस्थान में प्रतिनियुक्ति पर सेवा कर रहा है।

²(छ) विभागाध्यक्ष से वह प्राधिकारी अभिप्रेत है जो अनुसूची 'क' में विनिर्दिष्ट है तथा अन्य कोई प्राधिकारी जो इन नियमों के लिये सरकार के आदेश से घोषित हो।

नोट 02: Substituted by No. F. 3(8)Karmik (A-III)/76 GSR, 116 dated 6-12-79

³(ज) कार्यालयाध्यक्ष से सामान्य वित्तीय एवं लेखा नियमों के नियम 3 के अधीन विभागाध्यक्ष द्वारा इस रूप में घोषित अधिकारी अभिप्रेत है।

नोट 03: Substituted by No. F.3(3)Karmik (A-III)/79, GSR 46 dated 16-8-1982.

(झ) 'अनुसूची' से इन नियमों में संलग्न अनुसूची अभिप्रेत है।

(ञ) 'सेवा' से राजस्थान राज्य की कोई सिविल सेवा अभिप्रेत हैं।

नियम 3 — नियमों का लागू होना

⚠️ ये व्यक्ति CCA Rules 1958 से exempt हैं (नियम 3(1)): AIS सदस्य, केन्द्र/राज्य प्रतिनियुक्ति पर आए व्यक्ति, High Court न्यायाधीश, RPSC सदस्य, आकस्मिक नियोजित, 1 माह से कम नोटिस पर हटाए जाने वाले।

नियम 3(1): ये नियम निम्नांकित के सिवाय सभी राजकीय कर्मचारियों पर प्रभावी होंगे:—

  1. (क) वे व्यक्ति जो भारत सरकार, अथवा किन्हीं भी राज्यों या संघ राज्य क्षेत्रों से प्रतिनियुक्ति पर हों,
  2. (ख) वे व्यक्ति जो भारत सरकार के ऐसे औद्योगिक संस्थानों में नियोजित हैं जो औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत कर्मकार हैं;
  3. (ग) राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश,
  4. (घ) उच्च न्यायालय के अधिकारी और कर्मचारी, जो संविधान के अनुच्छेद 229 के खंड (2) के अधीन बनाए गये नियमों द्वारा शासित होंगे,
  5. (ङ) राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य संविधान के अनुच्छेद 318 के अधीन बनाये गये नियमों द्वारा शासित होंगे,
  6. (च) वे व्यक्ति जिनकी नियुक्ति तथा अन्य मामलों के लिये तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के द्वारा या अधीन विशेष उपबंध किया गया है,
  7. (छ) वे व्यक्ति जो आकस्मिक नियोजन में हैं,
  8. (ज) वे व्यक्ति जो एक महीने से कम की अवधि के नोटिस से सेवामुक्त किये जा सकते हैं, और,
  9. (झ) अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्य।

(2) उपनियम (1) में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुये भी और संविधान के अनुच्छेद 311 के उपबंधों के अध्यधीन सरकार, आदेश द्वारा किसी सरकारी कर्मचारी या किसी वर्ग को, इन नियमों या इनमें से कुछ के प्रवर्तन से अलग कर सकेगी।

(3) यदि कोई संदेह उत्पन्न हो कि: (क) क्या ये नियम किसी व्यक्ति पर लागू होते हैं; या (ख) क्या कोई व्यक्ति किसी विशेष सेवा का सदस्य है; तो ऐसा मामला सरकार के नियुक्ति विभाग को निर्दिष्ट किया जायेगा जिसका निर्णय अन्तिम होगा।

नियम 4 — करार द्वारा विशेष उपबंध

नियम 4: जहाँ किसी राजकीय कर्मचारी के संबंध में, इन नियमों के किसी नियम से असंगत विशेष उपबंध का रखा जाना आवश्यक प्रतीत हो, तो नियुक्ति प्राधिकारी, उक्त सरकारी कर्मचारी के साथ करार द्वारा ऐसे विशेष उपबंध कर सकेगा और तदुपरांत ये नियम उक्त सरकारी कर्मचारी पर उस सीमा तक लागू नहीं होंगे जिस सीमा तक इस प्रकार बनाए गए विशेष उपबंध उनसे असंगत हो।

परन्तु यदि नियुक्ति प्राधिकारी सरकार के नियुक्ति विभाग के अतिरिक्त दूसरा कोई हो, तो ऐसे अधिकारी द्वारा सरकार के नियुक्ति विभाग की पूर्व स्वीकृति प्राप्त की जायेगी।

नियम 5 — अधिकारों और विशेषाधिकारों का संरक्षण

नियम 5: इन नियमों की कोई भी बात किसी भी सरकारी कर्मचारी को किसी अधिकार या विशेषाधिकार से वंचित नहीं करेगी, जिसका वह निम्नांकित आधारों पर हकदार है— (क) उस समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या, उसके अधीन; या (ख) इन नियमों के प्रारंभ के समय उस व्यक्ति और सरकार के बीच अस्तित्वयुक्त किसी करार की शर्तों के द्वारा।

📗भाग 2 — वर्गीकरण (Classification)

नियम 6 — सिविल सेवाओं के 4 वर्ग
नियम 6 — सिविल सेवाओं का वर्गीकरण राज्य सेवा State Service नियम 7 | अनुसूची (1) अधीनस्थ सेवा Subordinate Service नियम 8 | अनुसूची (2) लिपिक वर्गीय Clerical Service नियम 9 | अनुसूची (3) चतुर्थ श्रेणी Class IV Service नियम 10 | अनुसूची (4)

नियम 6 — वर्गीकरण

नियम 6(1): सिविल सेवाओं का निम्नांकित रूप से वर्गीकरण किया जाएगा— (i) राज्य सेवायें, (ii) अधीनस्थ सेवायें, (iii) लिपिक वर्गीय सेवायें, (iv) चतुर्थ श्रेणी की सेवायें।

(2) यदि किसी सेवा में एक से अधिक ग्रेड के पद हों, तो विभिन्न ग्रेडों के पदों को विभिन्न वर्गों में सम्मिलित किया जा सकेगा।

नोट 04: Inserted by Notification No. F.16(9)Apptts./(a)/59 Gr.III/dated 23-2-62.

नियम 7 — राज्य सेवा

नियम 7 — राज्य सेवा में निम्नांकित होंगे: (क) अनुसूची (1) में सम्मिलित सेवाओं के सदस्य; (ख) ऐसे व्यक्ति जो अनुसूची (1) में सम्मिलित पदों पर अधिष्ठायी हैसियत से कार्य करते हों और जो किसी दूसरी सेवा के संवर्ग में नहीं हों; (ग) ऐसे व्यक्ति जिनका एकीकरण विभाग के नियमों के अनुसार उनका अंतिम चयन होने तक खंड (क) या (ख) में निर्दिष्ट पदों पर तदर्थ आधार पर नियुक्त किया गया हो।

नियम 8 — अधीनस्थ सेवा

नियम 8 — अधीनस्थ सेवा में निम्नलिखित सम्मिलित होंगे: (क) अनुसूची (2) में सम्मिलित सेवाओं के सदस्य; (ख) ऐसे व्यक्ति जो अनुसूची (2) में सम्मिलित पदों पर अधिष्ठायी हैसियत से कार्य करते हों और जो पद किसी दूसरी सेवा के संवर्ग के न हो; (ग) ऐसे व्यक्ति जिनका अंतिम चयन होने तक खंड (क)/(ख) के पदों पर तदर्थ आधार पर नियुक्त किया गया हो।

नियम 9 — लिपिक वर्गीय सेवाएँ

नियम 9 — लिपिक वर्गीय सेवाओं में निम्नलिखित सम्मिलित होंगे: (क) अनुसूची (3) में सम्मिलित सेवाओं के सदस्य; (ख) ऐसे व्यक्ति जो अनुसूची (3) में सम्मिलित पदों पर अधिष्ठायी हैसियत से कार्य करते हों और जो पद किसी दूसरी सेवा के संवर्ग के नहीं हों; (ग) ऐसे व्यक्ति जिनका अंतिम चयन होने तक तदर्थ आधार पर नियुक्त किया गया हो।

नियम 10 — चतुर्थ श्रेणी सेवा

नियम 10 — चतुर्थ श्रेणी सेवा में निम्नांकित सम्मिलित होंगे: (क) अनुसूची (4) में सम्मिलित सेवाओं के सदस्य; (ख) ऐसे व्यक्ति जो अनुसूची (4) में सम्मिलित पदों पर अधिष्ठायी हैसियत से कार्य करते हों और जो पद किसी दूसरी सेवा के संवर्ग के नहीं हों; (ग) ऐसे व्यक्ति जिनका अंतिम चयन होने तक तदर्थ आधार पर नियुक्त किया गया हो।

नियम 11 — विशेष वर्गीकरण

5नियम 11: राज्य सरकार, इन नियमों के प्रयोजनार्थ, किसी पद को आदेश द्वारा वर्गीकृत कर सकेगी, यदि कोई पद, जो किसी सेवा में सम्मिलित नहीं किया गया है, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा धारित हो जो नियम 7, 8, 9 तथा 10 के अधीन निर्दिष्ट सेवा में से किसी भी सेवा का सदस्य नहीं है।

नोट 05: Inserted by Notification No. F.3(8)Karmik (A-III)76 GSR 136 dated 6-12-1979.

📙भाग 3 — नियुक्ति प्राधिकारी

नियम 12 — नियुक्ति प्राधिकारी

सेवा वर्गनियुक्ति प्राधिकारीनियम
राज्य सेवासरकार या उसका सशक्त प्राधिकारी12(1)
अधीनस्थ / लिपिक वर्गीयविभागाध्यक्ष या सरकार की स्वीकृति से सशक्त प्राधिकारी12(2)
चतुर्थ श्रेणीविभागाध्यक्ष के नियमों के अध्यधीन कार्यालयाध्यक्ष12(3)

नियम 12(1): किसी राज्य सेवा में समस्त नियुक्तियाँ सरकार द्वारा, या इस विषय में सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त प्राधिकारी द्वारा की जाएंगी।

(2) अधीनस्थ और लिपिक वर्गीय सेवाओं में समस्त नियुक्तियाँ, विभागाध्यक्ष द्वारा या, इस विषय में सरकार की स्वीकृति से विभागाध्यक्ष द्वारा विशेष रूप से सशक्त प्राधिकारी द्वारा की जायेगी।

(3) किसी चतुर्थ श्रेणी सेवा में समस्त नियुक्तियाँ विभागाध्यक्ष द्वारा जारी किये गये नियमों एवं अनुदेशों के अध्यधीन कार्यालयाध्यक्ष द्वारा की जाएंगी।

नोट 06: Substituted & Deleted by No. F.3(3) Karmik (A-III) 79 GSR 46 dated 16-8-82.

📕भाग 4 — निलम्बन (Suspension)

नियम 13 — निलम्बन प्रक्रिया एवं Auto-Suspension
आधार (नियम 13(1)) अनुशासनिक कार्यवाही या फौजदारी मामला नियुक्ति/सक्षम प्राधिकारी ⚡ Auto-Suspension नियम 13(2) 48 घंटे से अधिक हिरासत → हिरासत की तिथि से स्वतः प्रभाव Subsistence Allowance आगामी आदेश तक प्रभावी रद्द: नियम 13(5)

नियम 13 — निलम्बन

नियम 13(1): नियुक्ति प्राधिकारी या कोई अधिकारी जिसके अधीन वह नियुक्ति अधिकारी है, या सरकार द्वारा इस विषय में सशक्त कोई भी अन्य प्राधिकारी किसी सरकारी कर्मचारी को निलम्बित कर सकेगा—

  1. (क) जहां तक उसके विरुद्ध कोई अनुशासनिक कार्यवाही करने का विचार है या ऐसी कोई कार्यवाही लम्बित है; या
  2. (ख) जहां उसके किसी फौजदारी अपराध के सम्बन्ध में, अन्वेषण या विचार हो रहा हो:

परन्तु जहां निलम्बन की आज्ञा नियुक्ति प्राधिकारी से नीचे के स्तर के प्राधिकारी द्वारा दी गई है तो उक्त प्राधिकारी, उन परिस्थितियों की रिपोर्ट, जिनमें ऐसी आज्ञा दी गई थी, तुरन्त नियुक्ति प्राधिकारी को देगा।

7राजस्थान सरकार का निर्णय: राज्य सरकार इन नियमों के नियम 14 में निर्दिष्ट लघु शास्तियों में से कोई शास्ति आरोपित करने के लिये सशक्त अधिकारी को राज्य सरकार के कर्मचारी को निलम्बन करने का अधिकार प्रदान करती है।

नोट 07: विज्ञप्ति संख्या एफ 3(9) नियुक्ति (क) 62 दिनांक 11–9–1962 द्वारा निविष्ट।

(2) कोई राज्य कर्मचारी जो किसी फौजदारी पोषारोपण पर या अन्यथा, 48 घण्टों से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया हो तो उसे हिरासत की तिथि से, उपनियम (1) के अधीन किसी सरकारी कर्मचारी को निलम्बनाधीन रखने के लिए सक्षम प्राधिकारी के आदेश द्वारा निलम्बित हुआ समझा जावेगा और वह आगामी आदेश तक निलम्बन में रहेगा।

(3) जब किसी निलम्बन आदेश में चल रहे राज्य कर्मचारी की बर्खास्तगी या सेवा से हटाये जाने या अनिवार्य सेवा निवृत्ति की शास्ति, इन नियमों के अधीन अपील में या नजरसानी होने पर निरस्त कर दी जाती है और किसी निर्देश के साथ मामला आगे जांच करने या कार्यवाही करने के लिए लौटा दिया जावे, तो उस कर्मचारी का निलम्बन, मूल आदेश की तिथि से पुनः जारी रहना समझा जावेगा और वह आगामी आज्ञा तक प्रभावशील रहेगा।

(4) जब किसी राज्य कर्मचारी पर सेवा से बर्खास्त करने, हटाये जाने या अनिवार्य सेवा निवृत्ति करने की शास्ति, किसी न्यायालय के फैसले द्वारा खारिज कर दी जावे या शून्य घोषित कर दी जावे या प्रभावहीन हो जावे और अनुशासनिक प्राधिकारी उन्हीं आरोपों पर आगे जांच करना तय करे तो उक्त राज्य कर्मचारी मूल आदेश की तिथि से निलम्बित किया समझा जावेगा और आगामी आदेशों तक वह निलम्बन में चलता रहेगा।

(5) इस नियम के अधीन जारी किया गया निलम्बन का आदेश, किसी भी समय, उक्त आदेश देने वाले प्राधिकारी द्वारा या ऐसे प्राधिकारी द्वारा, निरस्त किया जा सकेगा, जिसका उक्त प्राधिकारी अधीनस्थ है।

💡 व्यावहारिक उदाहरण — नियम 13(2) Auto-Suspension
स्थिति: राजकीय शिक्षक रामलाल को किसी विवाद में 10 मार्च को गिरफ्तार किया गया। 13 मार्च को जमानत मिली।
नियम 13(2) लागू: हिरासत 10–13 मार्च = 72 घंटे (48 से अधिक)। अतः 10 मार्च से auto-suspended माने जाएंगे। विद्यालय को अलग निलम्बन आदेश जारी करने की आवश्यकता नहीं — परन्तु सक्षम प्राधिकारी को तुरन्त सूचित करना होगा।

📒भाग 5 — अनुशासन (Discipline)

नियम 14 — शास्तियों के प्रकार

नियम 14 — 7 शास्तियाँ: लघु एवं वृहद
लघु शास्तियाँ (Minor Penalties) नियम 17 की सरल प्रक्रिया — जांच अनिवार्य नहीं (i)परिनिन्दा (Censure) (ii)वेतन वृद्धि या पदोन्नति रोकना (iii)आर्थिक हानि की वसूली वृहद शास्तियाँ (Major Penalties) नियम 16 की पूर्ण जांच अनिवार्य — RPSC परामर्श* (iv) अवनति (Demotion) (v) अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) (vi) सेवा से हटाना (Removal) (vii) पदच्युति (Dismissal) — भावी नियोजन निरर्हता

निम्नांकित शास्तियां (दण्ड) समुचित और पर्याप्त कारणों से, जिनको अभिलिखित किया जाएगा और जैसा इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित है, किसी सरकारी कर्मचारी पर लगाई जा सकेगी, अर्थात्—

  1. (i) परिनिन्दा,
  2. (ii) वेतन वृद्धि या पदोन्नति रोकना,
  3. (iii) लापरवाही से या किसी विधि, नियम या आदेश को भंग करने से सरकार को हुई आर्थिक हानि की उसके वेतन में से सम्पूर्ण या आंशिक रूप से वसूली,
  4. (iv) निम्नतर सेवा, ग्रेड या पद पर अथवा निम्नतर काल वेतनमान में अथवा काल वेतनमान में नीचे के प्रक्रम पर अवनत कर देना8, या पेंशन की दशा में नियमानुसार देय राशि में कमी कर देना,
  5. (v) आनुपातिक पेंशन पर अनिवार्य सेवा निवृत्ति,
  6. (vi) सेवा से हटाया जाना, जो कि आगे नियोजन के लिए निरर्हता नहीं होगी,
  7. (vii) सेवा से पदच्युति, जो सामान्यतः भावी नियोजन के लिए निरर्हता होगी।
नोट 08: Inserted vide Notification No. F. 3(2)Apptts. (A)/60 Group III dated 8-12-1960
शास्तिवर्गजांच (नियम)RPSC परामर्शभावी नियोजन
परिनिन्दा (i)लघुनहीं (17)नहींप्रभावित नहीं
वेतन रोकना (ii)लघुनहीं (17)नहींप्रभावित नहीं
वसूली (iii)लघुनहीं (17)नहींप्रभावित नहीं
अवनति (iv)वृहदहाँ (16)हाँ*प्रभावित हो सकती है
अनिवार्य सेवानिवृत्ति (v)वृहदहाँ (16)हाँ*निरर्हता नहीं
सेवा से हटाना (vi)वृहदहाँ (16)हाँ*निरर्हता नहीं
पदच्युति (vii)वृहदहाँ (16)हाँ*सामान्यतः निरर्हता

*जहाँ नियुक्ति शक्ति RPSC को नहीं सौंपी गई वहाँ परिनिन्दा व वेतन रोकने के अलावा RPSC परामर्श अनिवार्य।

💡 व्यावहारिक उदाहरण — शास्ति (vi) vs (vii)
स्थिति: एक शिक्षक को दोषी पाया गया। दोनों शास्तियों में क्या अंतर है?
Removal (vi): शिक्षक हटाए जाएंगे, परन्तु भविष्य में सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं।
Dismissal (vii): सबसे कड़ी — हटाए जाएंगे और सामान्यतः भावी सरकारी नियोजन के लिए निरर्हता होगी।

नियम 15 — अनुशासनिक प्राधिकारी

9नियम 15(1): राज्य सेवाओं के सम्बन्ध में सरकार या सरकार द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त प्राधिकारी, अधीनस्थ एवं लिपिक वर्गीय सेवाओं के सम्बन्ध में विभागाध्यक्ष या विभागाध्यक्ष द्वारा सरकार के अनुमोदन से विशेष रूप से सशक्त प्राधिकारी और चतुर्थ श्रेणी सेवाओं के लिए कार्यालयाध्यक्ष, अनुशासनिक प्राधिकारी होगा।

(2) जिन सेवाओं के सम्बन्ध में नियुक्ति करने की शक्ति किसी प्राधिकारी को नहीं सौंपी गयी हो, परिनिन्दा तथा वेतन वृद्धि को रोकने की शास्ति के अतिरिक्त शास्ति लगाने से पहले लोक सेवा आयोग से परामर्श किया जायेगा।

नोट 09: जी.एस.आर. 46 अधिसूचना सं. एफ 1(3)कार्मिक (ए–III)/79 दिनांक 16–8–1982 से पुनः स्थापित।

नियम 16 — वृहद दण्ड के लिए जांच की प्रक्रिया

नियम 16 — वृहद जांच प्रक्रिया (Step-by-Step)
चरण 1 आरोप तैयार अनु. प्राधिकारी चरण 2 सूचना दें आरोप+अभिकथन चरण 3 लिखित बचाव कर्मचारी द्वारा चरण 4 जांच बोर्ड साक्ष्य 10 दिन चरण 5 जांच रिपोर्ट प्रत्येक आरोप चरण 6–8 रिपोर्ट → अभ्यावेदन 15 दिन → RPSC → अंतिम आदेश 📌 नियम 16 — महत्वपूर्ण समय सीमाएँ ✅ साक्षियों की सूची: 10 दिन ✅ बचाव अभिलेखों की सूची: 10 दिन ✅ रिपोर्ट पर अभ्यावेदन: 15 दिन

नियम 16(1): जनसेवक (जांच) अधिनियम, 1850, के उपबधों पर प्रभाव डाले बिना, किसी राजकीय कर्मचारी पर नियम 14 के खण्ड (iv) से (vii) में विनिर्दिष्ट शास्तियों में से कोई शास्ति लगाने वाला आदेश तब तक नहीं दिया जाएगा, जब तक कि यथा–साध्य इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति से जांच न करली गई हो।

(2) अनुशासनिक प्राधिकारी, जिन अभिकथनों के आधार पर जांच किया जाना प्रस्तावित है, उनके आधार पर निश्चित आरोप तैयार करेगा। ऐसे आरोप अभिकथनों के विवरणों के साथ लिखित रूप में राजकीय कर्मचारी को सूचित किये जावेंगे और उससे ऐसे समय के भीतर जो अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए एक लिखित कथन प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जाएगी जिसमें यह बतलाया जावेगा कि क्या वह सभी आरोपों की या उनमें से किसी की सत्यता को स्वीकार करता है, उसे क्या स्पष्टीकरण देना है, या बचाव, यदि कोई हो, करना है और क्या वह व्यक्तिगत सुनवाई चाहता है।

परन्तु जब दोषारोपित व्यक्ति द्वारा अपने बचाव के अनुक्रम में दिए गए किसी कथन या अभिकथन पर कार्यवाही की जानी प्रस्तावित हो तो कोई अतिरिक्त आरोप तैयार करना आवश्यक नहीं होगा।

(3) राजकीय कर्मचारी को अपने बचाव की तैयारी करने के प्रयोजनार्थ ऐसे राजकीय अभिलेखों का जिन्हें वह विनिर्दिष्ट करे निरीक्षण करने तथा उनमें से उद्धरण लेने की अनुज्ञा दी जायेगी परन्तु यदि अनुशासनिक प्राधिकारी की राय में ऐसे अभिलेख उस प्रयोजन से सुसंगत नहीं हैं या उसे ऐसे अभिलेख दिखाना लोकहित के विरुद्ध है तो कारण को अभिलिखित करते हुए ऐसी अनुज्ञा देने से इन्कार किया जा सकेगा।

(4) बचाव पक्ष के लिखित कथन की प्राप्ति पर या विनिर्दिष्ट समय में ऐसा कोई कथन प्राप्त न हो तो अनुशासनिक प्राधिकारी स्वयं ऐसे आरोपों के बारे में जो स्वीकार नहीं किए गए हैं जांच कर सकेगा या यदि वह ऐसा करना आवश्यक समझे तो उस प्रयोजन के लिए "जांच बोर्ड" या "जांच प्राधिकारी" नियुक्त कर सकेगा।

नोट 10: जी.एस.आर. 129; सं. एफ. 3(17)नियुक्ति/(क–3)/67 दिनांक 5–10–74 द्वारा निविष्ट।

(5) अनुशासनिक प्राधिकारी किसी भी व्यक्ति को जांच प्राधिकारी के समक्ष आरोपों के समर्थन में प्रकरण को प्रस्तुत करने के लिए नामजद कर सकेगा। राज्य कर्मचारी भी अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित किसी दूसरे राज्य कर्मचारी 11(या सेवा निवृत्त राज्य कर्मचारी) की सहायता से अपने प्रकरण को प्रस्तुत कर सकेगा; परन्तु वह इस प्रयोजन के लिये किसी विधि व्यवसायी को नियुक्त नहीं कर सकेगा जब तक कि अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा नामांकित व्यक्ति भी विधि व्यवसायी न हो।

नोट 11: क्र.एफ 9(2)(11)डीओपी/क–3/2007 दिनांक 21–12–2012 द्वारा प्रतिस्थापित।

12नियम 16(6)क.: जहां जांच प्रारम्भ होने पर राज्य कर्मचारी ने आरोपों के प्रति दोषी न होने का अभिवचन किया है, जांच प्राधिकारी उप–स्थापक अधिकारी से साक्षियों व दस्तावेजों की सूची 10 दिनों के भीतर प्रस्तुत करने के लिए कहेगा जो साथ ही साथ राज्य कर्मचारी को भी एक प्रति भेजेगा। अपचारी कर्मचारी सूचियां प्राप्त होने के 10 दिनों के भीतर अपने बचाव के लिए अपेक्षित अभिलेखों की सूची प्रस्तुत करेगा। जांच प्राधिकारी तब दोनों पक्षों के अभिलेखों को मंगवायेगा तथा पक्षकारों से उन्हें स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए कहेगा। इसके बाद वह ऐसे साक्ष्य को बुलावेगा जो आवश्यक समझा जावेगा। पक्षकारों को तर्क प्रस्तुत करने का अवसर भी दिया जावेगा।

नोट 12: क्र. एफ. 3(2)कार्मिक/क–3/81 दिनांक 16–9–82 द्वारा प्रतिस्थापित

13(6)(क–1) किसी व्यक्ति की साक्ष्य जो औपचारिक रूप की है, शपथ पत्र द्वारा दी जा सकेगी और सब न्यायोचित अपवादों के अधीन रहते हुए, विभागीय कार्यवाही में स्वीकार की जा सकेगी।

नोट 13: जी.एस. 81; सं. एफ. 3(15)कार्मिक/(क–3)/72 दिनांक 26–12–1973 द्वारा जोड़ा गया।

(6)(ख) जांच प्राधिकारी, उसके द्वारा संचालित किये जा रहे व आंशिक रूप से सुने गये मामलों में, समुचित तथा पर्याप्त कारणों पर, जो लेखबद्ध किये जावेंगे, साक्षियों को परीक्षा के लिए पुनः बुला सकेगा।

14(6)(ग) जांच प्राधिकारी, आदेश के 10 दिनों के भीतर, किन्हीं ऐसे अभिलेखों की, जो सरकार के कब्जे में हैं, लेकिन सूची में वर्णित नहीं हैं, खोज या प्रस्तुतीकरण के लिए नोटिस प्रेषित करेगा।

नोट 14: जी.एस.आर. 129; स.एफ. 3(17)नियुक्ति/क–3/65 दिनांक 9–10–1974 द्वारा जोड़ा गया।

(6)(घ) यदि राज्य कर्मचारी सुनवाई की तारीख को बिना पर्याप्त कारण के उपस्थित होने में असफल रहता है तो, जांच प्राधिकारी उसकी अनुपस्थिति में आगे जांच की कार्यवाही कर सकेगा।

(6)(ख)(क) जांच प्राधिकारी के निष्कर्ष: जहां नियम 14 के खण्ड (i) से (iii) में शास्ति आरोपित करने में सक्षम किन्तु खण्ड (iv) से (vii) में असक्षम, अनुशासनिक अधिकारी की यह राय हो कि वृहद शास्ति आरोपित की जानी चाहिये, वहां वह जांच के अभिलेख को ऐसे अनुशासनिक प्राधिकारी को अग्रेषित करेगा, जो वर्णित शास्तियों को अधिरोपित करने में सक्षम हो।

(7) जांच की समाप्ति पर जांच प्राधिकारी, प्रत्येक आरोप पर अपने निष्कर्ष उनके कारणों सहित, अभिलिखित करते हुए जांच की रिपोर्ट तैयार करेगा।

(8) जांच के अभिलेख में निम्नांकित सम्मिलित होंगे: (i) आरोप तथा अभिकथन विवरण; (ii) कर्मचारी का बचाव का लिखित कथन; (iii) मौखिक साक्ष्य; (iv) अभिलेखीय साक्ष्य; (v) प्राधिकारियों के आदेश; (vi) प्रत्येक आरोप पर निष्कर्ष व कारण।

(9) अनुशासनिक प्राधिकारी, यदि वह जांच प्राधिकारी न हो तो, जांच के अभिलेख पर विचार करेगा तथा प्रत्येक आरोप पर, अपने निष्कर्ष अभिलिखित करेगा।

15(10) अनुशासनिक प्राधिकारी जांच रिपोर्ट की एक प्रति सरकारी कर्मचारी को अग्रेषित करेगा जिससे यह अपेक्षा की जायेगी कि वह अपना लिखित अभ्यावेदन यदि वह करना चाहे, पन्द्रह दिन के भीतर अनुशासनिक प्राधिकारी को प्रस्तुत कर दे।

(10क) अनुशासनिक प्राधिकारी यदि जांच प्राधिकारी के निष्कर्षों से असहमत हो तो वह ऐसी असहमति के अपने कारणों को अभिलिखित करेगा और अपने स्वयं के निष्कर्ष अभिलिखित करेगा।

(10ख) अनुशासनिक प्राधिकारी आगे कार्यवाही करने से पूर्व सरकारी कर्मचारी द्वारा प्रस्तुत किये गये अभ्यावेदन, यदि कोई हो, पर विचार करेगा।

नोट 15: सं.प.9(41)कार्मिक/क–3/2002 दिनांक 21–1–2003 द्वारा प्रतिस्थापित।

(11) यदि अनुशासनिक प्राधिकारी की राय हो कि उक्त सरकारी कर्मचारी पर नियम 14 के खण्ड (i) से (iii) में शास्ति अधिरोपित की जानी चाहिए तो वह ऐसी शास्ति अधिरोपित करते हुए आदेश करेगाः परन्तु जहां RPSC से परामर्श करना आवश्यक हो, जांच का अभिलेख RPSC को उसकी सलाह के लिए अग्रेषित किया जायेगा।

16(11क) यदि अनुशासनिक प्राधिकारी की राय हो कि नियम 14 के खण्ड (iv) से (vii) में शास्ति अधिरोपित की जानी चाहिए तो वह ऐसी शास्ति अधिरोपित करते हुए आदेश जारी करेगा और सरकारी कर्मचारी को अभ्यावेदन का अवसर देना आवश्यक नहीं होगाः परन्तु जहां RPSC से परामर्श आवश्यक हो, उससे परामर्श लिया जायेगा।

नोट 16: सं.प.9(5)(41)कार्मिक/क–3/2001 दिनांक 21–1–2003 द्वारा प्रतिस्थापित।

(12) अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा दिये गये आदेश सरकारी कर्मचारी को संसूचित किये जावेंगे और उसे जांच प्राधिकारी की रिपोर्ट की एक प्रति भी दी जायेगी।

नियम 17 — लघु शास्तियाँ लगाने की प्रक्रिया

नियम 17(1): नियम 14 के खण्ड (i) से (iii) में शास्ति लगाने का तब तक आदेश नहीं दिया जायेगा जब तक कि—

  1. (क) सरकारी कर्मचारी को उसके विरुद्ध कार्यवाही का प्रस्ताव तथा अभिकथन लिखित रूप में सूचित किये गये हों और अभ्यावेदन का अवसर दिया गया हो।
  2. 17(कक) ऐसे प्रत्येक मामले में जिसमें तीन वर्षों से अधिक की कालावधि के लिए या संचयी प्रभाव से किसी भी कालावधि के लिए वेतन वृद्धियों को रोकना प्रस्तावित है या जिसमें अनुशासनिक प्राधिकारी की राय यह हो कि ऐसी जांच आवश्यक है, नियम 16 में अधिकथित रीति में जांच कर ली गयी हो।
  3. (ख) खण्ड (क) और (कक) के अधीन कार्यवाही हो चुकी हो।
  4. 18(ग) सरकारी कर्मचारी को यदि वह चाहे तो व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया गया हो।
  5. (घ) उन मामलों में जिनमें RPSC से परामर्श लेना आवश्यक हो, परामर्श न कर लिया गया हो।
नोट 17: Added vide G.S.R. 37; No. F. 3(9)DOP/A-III/85 dated 16-11-87. | नोट 18: Amended by No. F 3(9)DOP/A-III/78 dated 27-1-1979

(2) ऐसे मामलों में कार्यवाही के अभिलेख में निम्नलिखित सम्मिलित होंगे: (i) सूचना की प्रति; (ii) अभिकथन विवरण; (iii) अभ्यावेदन यदि कोई हो; (iv) जांच के दौरान साक्ष्य; (v) प्रत्येक अभिकथन पर निकाले गये निष्कर्ष; (vi) RPSC की सलाह यदि कोई हो; (vii) मामले पर आदेश, उनके कारणों सहित।

नियम 18 — संयुक्त परीक्षण

नियम 18(1): जहां किसी मामले में दो या अधिक राजकीय कर्मचारी सम्बन्धित हों, सरकार या कोई अन्य प्राधिकारी जो ऐसे समस्त सरकारी कर्मचारियों को सेवा से पदच्युत करने की शास्ति लगाने के लिए सक्षम हो, यह आदेश दे सकेगा कि उन सबके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही एक साथ की जावे।

(2) ऐसे किसी आदेश में निम्नलिखित निर्देश होंगे: (i) अनुशासनिक अधिकारी का पद विवरण; (ii) नियम 14 में शास्तियों का विवरण; (iii) क्या नियम 16 या 17 की प्रक्रिया का पालन होना है।

19नियम 18–क. यौन उत्पीड़न में विशेष प्रक्रिया: Rajasthan Civil Services (Conduct) Rules 1971 के नियम 25कक के अंतर्गत यौन उत्पीड़न की शिकायत पर विभाग/कार्यालय में स्थापित शिकायत समिति को जांच प्राधिकारी माना जाएगा और उसकी रिपोर्ट को जांच रिपोर्ट माना जाएगा।

नोट 19: New Rule 18A inserted vide G.S.R. 92; No. F9(2)(59)DOP/A-IV/97 Part-I dated 14-2-2006.

नियम 19–20 — विशेष प्रावधान

नियम 19: नियम 16, 17 तथा 18 में किसी बात के होते हुए भी, अनुशासनिक प्राधिकारी विशेष प्रक्रिया अपना सकता है यदि: (i) कर्मचारी किसी फौजदारी आरोप पर सिद्ध हुआ हो; या (ii) नियमित प्रक्रिया का अनुसरण करना साध्य नहीं है; या (iii) राज्यपाल का समाधान हो कि राज्य सुरक्षा हित में नियमित प्रक्रिया उचित नहीं है। परन्तु जहां RPSC से परामर्श आवश्यक हो, पहले परामर्श लिया जायेगा।

20नियम 19–क (उधार पर गए कर्मचारी): केन्द्रीय सरकार, Public Sector Company या स्वशासी निकायों को उधार दी गई सेवाओं के सम्बन्ध में उधार ग्रहीता प्राधिकारी को निलम्बन व अनुशासनिक कार्यवाही की शक्ति होगी। परन्तु उधारदायी प्राधिकारी को तुरन्त सूचित करना होगा।

नोट 20: Inserted by No. F. 3(17)Apptts. (A-III)/67 dated 9-10-1974.

21नियम 19–ख (दूसरे विभाग में पदस्थापित): जहां कोई सरकारी कर्मचारी नियुक्ति प्राधिकारी के विभाग से भिन्न किसी विभाग में पदस्थापित किया गया हो, वहां उधार लेने वाले विभाग के विभागाध्यक्ष को निलम्बन व अनुशासनिक कार्यवाही की शक्तियां होंगी। परन्तु नियुक्ति प्राधिकारी को तुरन्त सूचित करना होगा।

नोट 21: अधि. सं. क्रमांक एफ. 3(4)96 DOP/A-3/96 दिनांक 29–3–1997 द्वारा जोड़ा गया।

22नियम 20: अधीनस्थ सेवा, लिपिक वर्गीय सेवा और चतुर्थ सेवा के मामलों में सरकार से भिन्न, अन्य अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश, अपील प्राधिकारी को संसूचित किये जावेंगे।

नोट 22: Substituted by G.S.R. 46; No. F 3(13)Apptts. (A-III)79 dated 16-08-1982

📔भाग 6 — अपीलें (Appeals)

समय सीमाएँ — अपील, पुनरीक्षण, राज्यपाल
आदेश तिथि 0 3 माह अपील (नियम 25) 6 माह पुनरीक्षण (नियम 32) 3 वर्ष राज्यपाल (नियम 34)

नियम 21 — सरकार के आदेशों की कोई अपील नहीं

नियम 21: इस भाग में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी नियम 14 में विनिर्दिष्ट शास्तियों में से कोई भी शास्ति लगाने वाले, सरकार द्वारा दिये गये, किसी आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी।

नियम 22 — निलम्बन के आदेशों के विरुद्ध अपील

नियम 22: कोई सरकारी कर्मचारी निलम्बन आदेश के विरुद्ध, उस प्राधिकारी को अपील कर सकेगा, जिसके ठीक अधीनस्थ वह प्राधिकारी हो जिसने आदेश दिया हो या जिसके द्वारा दिया गया समझा जाए।

नियम 23 — शास्तियाँ लगाने के विरुद्ध अपील

23नियम 23(1): अधीनस्थ सेवा, लिपिक वर्गीय सेवा या चतुर्थ श्रेणी सेवा का कोई सदस्य, उस पर शास्ति अधिरोपित करने वाले किसी आदेश के विरुद्ध, नीचे यथादर्शित प्राधिकारी को अपील कर सकेगा—

सेवाअपील किसेनियम
राज्य सेवासरकार को (RPSC परामर्श से)23(2)
अधीनस्थ सेवाप्रशासनिक विभाग में सरकार को23(1)(1)
लिपिक वर्गीयप्रशासनिक विभाग में सरकार को23(1)(2)
चतुर्थ श्रेणीविभागाध्यक्ष को23(1)(3)
निलम्बनतत्काल उच्च प्राधिकारी को22
सरकार के आदेश परकोई अपील नहीं21
नोट 23: Substituted by No. F. 3(3)Karmik (A-III) 79 dated 16-8-1982.

नियम 24 — आदेश की प्रमाणित प्रति

नियम 24: किसी भी अपील योग्य आदेश के मामलों में उक्त आदेश पारित करने वाला प्राधिकारी युक्ति युक्त समय के अन्दर आदेश की एक प्रमाणित प्रति उस व्यक्ति को निःशुल्क देगा जिसके विरुद्ध आदेश पारित किया गया है।

नियम 25 — अपीलों के लिए परिसीमा

नियम 25: इस भाग के अधीन कोई अपील तब तक ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक कि वह उस दिन से तीन महीने की अवधि के अन्दर प्रस्तुत नहीं कर दी जाए, जिस दिन अपीलकर्ता को उस आदेश की प्रति प्राप्त हुई हो जिसके विरुद्ध अपील करनी होः

परन्तु अपील प्राधिकारी उपर्युक्त समय के समाप्त होने के बाद भी अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका समाधान हो जाए कि अपील कर्ता के पास पर्याप्त कारण थे।

💡 व्यावहारिक उदाहरण — अपील परिसीमा (नियम 25)
स्थिति: शिक्षक को 5 जनवरी 2026 को परिनिन्दा (Censure) का आदेश मिला। वे 10 अप्रैल 2026 को अपील करना चाहते हैं।
गणना: 5 जनवरी + 3 माह = 5 अप्रैल 2026। 10 अप्रैल को अपील 5 दिन विलम्ब से होगी। पर्याप्त कारण बताने पर ग्रहण हो सकती है। सुझाव: हमेशा समय पर अपील करें।

नियम 26–31 — अपील की प्रक्रिया

नियम 26: अपील करने वाला प्रत्येक व्यक्ति पृथक रूप से तथा अपने स्वयं के नाम से अपील करेगा। अपील में समस्त सारवान विवरण तथा तर्क अन्तर्विष्ट होंगे। उसमें कोई अनादर पूर्ण या अनुचित भाषा का प्रयोग नहीं होगा तथा वह स्वयं में पूर्ण होगी।

नियम 27: प्रत्येक अपील समुचित माध्यम से उस प्राधिकारी को प्रस्तुत की जावेगी जिसके आदेश के विरुद्ध अपील की गई हो। अपील की प्रति अपील प्राधिकारी को सीधी भी प्रस्तुत की जा सकेगी।

नियम 28 (अपीलों को रोके रखना): अपील रोकी जा सकती है यदि— (i) उस आदेश के विरुद्ध हो जिसकी अपील न होती हो; (ii) नियम 26 के उपबन्धों का पालन न किया गया हो; (iii) नियम 25 में विनिर्दिष्ट अवधि के अन्दर प्रस्तुत न की गयी हो; (iv) किसी पूर्व निश्चित अपील की पुनरावृत्ति हो।

नियम 29: वह प्राधिकारी जिसके आदेश के विरुद्ध अपील की गयी है, किसी विलम्ब के बिना प्रत्येक अपील को, जो नियम 28 के अधीन नहीं रोकी गयी हो, उस पर स्वयं की टिप्पणी और अभिलेखों के साथ अपील प्राधिकारी को पारेषित करेगा।

नियम 30 (अपीलों पर विचार): (1) निलम्बन अपील में — अपील प्राधिकारी विचार करेगा कि निलम्बन का आदेश न्याय संगत है या नहीं तथा तदुपरांत आदेश को पुष्ट या रद्द करेगा। (2) शास्ति अपील में — (क) प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं; (ख) तथ्य सिद्ध किये गये या नहीं; (ग) पर्याप्त औचित्य है या नहीं; (घ) शास्ति अत्याधिक, पर्याप्त या अपर्याप्त है। परन्तु वर्धित शास्ति लगाने से पहले अभ्यावेदन का अवसर अनिवार्य।

नियम 31: वह प्राधिकारी जिसके आदेश के विरुद्ध अपील की गई है, अपील प्राधिकारी द्वारा पारित आदेशों को क्रियान्वित करेगा।

📓भाग 7 — पुनरीक्षण एवं पुनर्विलोकन

नोट 24: Substituted by G.S.R. 68; No. F.3(2)Karmik/A-III/82 dated 21-6-1983.

नियम 32 — पुनरीक्षण (Revision)

नियम 32: वह प्राधिकारी जिसके पास किसी शास्ति लगाने के आदेश के विरुद्ध अपील होती हो और यदि उसकी कोई अपील न की गयी हो तो वह, स्वेच्छा से या अन्यथा, अपने अधीनस्थ किसी प्राधिकारी द्वारा की गई अनुशासनिक कार्यवाही के अभिलेख को मंगवा सकेगा तथा उनका परीक्षण कर सकेगा और आयोग से परामर्श के बाद— (क) आदेश को पुष्ट, संशोधन या निरस्त; (ख) शास्ति लगा सकेगा या बदल सकेगा; (ग) मामले को विप्रेषित कर सकेगा; या (घ) उपयुक्त आदेश पारित कर सकेगा। परन्तु वर्धित शास्ति से पहले अभ्यावेदन का अवसर अनिवार्य।

(3) इस नियम के अधीन किसी कार्यवाही का प्रारम्भ, पुनरीक्षित किये जाने वाले आदेश के दिनांक से छः माह के पश्चात् नहीं किया जायेगा।

नियम 33 — राज्य सेवाओं के आदेशों का पुनर्विलोकन

नियम 33: सरकार स्वेच्छा से या अन्यथा, राज्य सेवाओं के किसी सदस्य पर नियम 14 में शास्ति लगाने वाले किसी भी आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगी और आयोग से परामर्श के बाद— (क) आदेश की पुष्टि, उपान्तरण या अपास्त; (ख) शास्ति अधिरोपित, अपास्त, कम या बढ़ा सकेगी। परन्तु वर्धित शास्ति से पहले अभ्यावेदन का अवसर अनिवार्य।

नोट 26: Substituted vide G.S.R. 129; No. F.3(17)Apptts.(A-III)/67 dated 9-10-1974.

नियम 34 — राज्यपाल की पुनर्विलोकन सम्बन्धी शक्तियाँ

नियम 34: इन नियमों में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, राज्यपाल, स्वेच्छा से या अन्यथा, प्रकरणों के अभिलेखों को मंगाने के पश्चात् किसी भी आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेंगें और आयोग से परामर्श के बाद— (क) आदेशों को पुष्ट, उपान्तरित या अपास्त; (ख) कोई शास्ति लगा सकेंगें या बदल सकेंगें; (ग) मामले को विप्रेषित कर सकेंगें; (घ) ऐसे अन्य आदेश पारित कर सकेंगें। परन्तु वर्धित शास्ति से पहले अभ्यावेदन अनिवार्य। यदि नियम 16 की जांच नहीं हुई तो वृहद शास्ति लगाने से पहले नियम 19 के अनुसार जांच का निर्देश देंगें।

28पुनर्विलोकन की जाने वाली आज्ञा के दिनांक से तीन वर्ष से अधिक के बाद इस नियम के अधीन कोई कार्यवाही नहीं की जायेगी।

नोट 28: Added by G.S.R. 29; No. F. 3(2)Karmik (A-III)/75 dated 25-7-1975.

📃भाग 8 — प्रकीर्ण तथा अस्थायी

नियम 35 — निरसन तथा व्यावृत्ति

नियम 35(1): राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1958 तथा ऐसे किन्हीं नियमों के अधीन जारी की गई अधिसूचना और दिये गये आदेश उस सीमा तक एतद्द्वारा निरस्त किये जाते हैं जहां तक कि वे उन व्यक्तियों पर लागू होते हैं जिन पर ये नियम लागू होते हैं।

परन्तु— (क) ऐसा निरसन उक्त नियमों, अधिसूचनाओं और आदेशों अथवा तद्धीन पहले की गई किसी बात या कार्यवाही के प्रवर्तन को प्रभावित नहीं करेगा; (ख) उक्त नियमों के अधीन लम्बित कार्यवाहियाँ चालू रहेंगी और यथासम्भव इन नियमों के उपबन्धों के अनुसार निपटाई जाएंगी।

(2) इन नियमों में कोई भी बात, ऐसे व्यक्ति को, अपील करने के लिये उस अधिकार से वंचित करने का प्रभाव नहीं करेगी जो कि इन नियमों के प्रारम्भ होने से पूर्व पारित किसी आदेश के सम्बन्ध में प्रोद्भूत हो चुका हो।

(3) इन नियमों के प्रारम्भ होने के समय लम्बित वाद में की गई अपील पर, 29जो किसी ऐसे आदेश के विरुद्ध हो जो इन नियमों के प्रारम्भ होने से पूर्व दिया गया था, इन नियमों के अनुसार विचार किया जाकर उस पर आदेश पारित किये जाएंगे।

नोट 29: Inserted vide Notification No. F. 3(2)Apptts. A/61 Gr. III dated 16-9-1961.

नियम 36 — संदेहों का निवारण

नियम 36: जहां कोई सन्देह उत्पन्न हो कि किसी कार्यालय का अध्यक्ष कौन है या कोई प्राधिकारी के अधीनस्थ है या उससे उच्चतर है या इन नियमों के उपबन्धों में से किसी उपबन्धों के विवेचन में या उनकी योग्यता में सन्देह हो, तो मामला सरकार के नियुक्ति विभाग में निर्दिष्ट किया जायेगा, जिसका उस पर विनिश्चय अन्तिम होगा।

नियम 37 — कतिपय अधिकारियों के लिए विशेष उपबंध

नियम 37: जहां कोई अधिकारी एकीकरण की योजनाओं में से किसी योजना में किसी पद पर नियुक्त नहीं किया गया है, तो वह राजस्थान में सम्मिलित उसी इकाई में उस पर लागू होने वाले नियमों में जिसमें उसने अन्तिम नियुक्ति धारण की हो, शासित होता रहेगा।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. CCA Rules 1958 किस पर लागू होते हैं? कौन exempt है?
लागू होते हैं: राजस्थान सरकार के सभी राजकीय कर्मचारी — राज्य, अधीनस्थ, लिपिक, चतुर्थ श्रेणी सेवा।

Exempt (नियम 3(1)): AIS सदस्य (IAS/IPS/IFS), प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारी, उच्च न्यायालय न्यायाधीश, RPSC अध्यक्ष/सदस्य, आकस्मिक नियोजित व्यक्ति, 1 माह से कम नोटिस पर हटाए जाने वाले।
Q2. नियम 14 की 7 शास्तियाँ कौन सी हैं? लघु और वृहद में क्या अंतर?
लघु (i-iii): परिनिन्दा | वेतन वृद्धि रोकना | वसूली — नियम 17 की सरल प्रक्रिया, जांच अनिवार्य नहीं।

वृहद (iv-vii): अवनति | अनिवार्य सेवानिवृत्ति | सेवा से हटाना | पदच्युति — नियम 16 की पूर्ण जांच अनिवार्य। पदच्युति (vii) सबसे कड़ी — सामान्यतः भावी नियोजन की निरर्हता।
Q3. निलम्बन कब होता है? 48 घंटे का नियम क्या है?
नियम 13(1): 2 आधार — (क) अनुशासनिक कार्यवाही लम्बित हो; (ख) फौजदारी मामले में अन्वेषण हो।

Auto-Suspension नियम 13(2): यदि कर्मचारी 48 घंटे से अधिक हिरासत में रहे → हिरासत की तिथि से स्वतः निलम्बित माना जाएगा। अलग से निलम्बन आदेश जारी करने की आवश्यकता नहीं।

निलम्बन आदेश किसी भी समय रद्द किया जा सकता है (नियम 13(5))।
Q4. वृहद जांच प्रक्रिया (नियम 16) के सभी चरण और समय सीमाएँ?
1. आरोप तैयार → 2. आरोप + अभिकथन सूचित → 3. लिखित बचाव → 4. जांच बोर्ड/प्राधिकारी → 5. साक्षियों की सूची: 10 दिन → 6. बचाव अभिलेखों की सूची: 10 दिन → 7. साक्ष्य → 8. जांच रिपोर्ट → 9. रिपोर्ट की प्रति कर्मचारी को: अभ्यावेदन 15 दिन → 10. RPSC परामर्श (जहाँ आवश्यक) → 11. अंतिम आदेश।

महत्वपूर्ण: कर्मचारी विधि व्यवसायी नियुक्त नहीं कर सकता (except जब दूसरा पक्ष भी हो)।
Q5. अपील की समय सीमा, किसे और क्या नहीं होगी?
परिसीमा: आदेश मिलने से 3 माह के भीतर (नियम 25)।

किसे: राज्य सेवा → सरकार | अधीनस्थ/लिपिक → सरकार | चतुर्थ → विभागाध्यक्ष | निलम्बन → तत्काल उच्च प्राधिकारी।

अपील नहीं होगी (नियम 21): सरकार द्वारा दिये गये किसी आदेश के विरुद्ध।

आदेश की प्रमाणित प्रति निःशुल्क मिलेगी (नियम 24)।
Q6. पुनरीक्षण (Revision) और राज्यपाल पुनर्विलोकन में क्या अंतर?
पुनरीक्षण (नियम 32-33): अपील प्राधिकारी — आदेश से 6 माह के भीतर।

राज्यपाल पुनर्विलोकन (नियम 34): किसी भी आदेश पर — आदेश से 3 वर्ष के भीतर।

दोनों में: वर्धित शास्ति लगाने से पहले कर्मचारी को अभ्यावेदन का अवसर अनिवार्य।
Q7. RPSC परामर्श कब अनिवार्य है?
जिन सेवाओं में नियुक्ति शक्ति RPSC को नहीं सौंपी गई है (नियम 15(2)):
✅ परिनिन्दा (i), वेतन रोकना (ii) → RPSC परामर्श आवश्यक नहीं
❌ वसूली (iii) से पदच्युति (vii) → RPSC परामर्श अनिवार्य

अपील, पुनरीक्षण और राज्यपाल पुनर्विलोकन में भी जहाँ आवश्यक हो RPSC परामर्श लिया जाएगा।
Q8. सेवा (vi) से हटाना और पदच्युति (vii) में क्या अंतर है?
सेवा से हटाना (vi) Removal: कर्मचारी सेवा से हटाया जाएगा, परन्तु भविष्य में सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकता है (निरर्हता नहीं)।

पदच्युति (vii) Dismissal: सबसे कड़ी शास्ति — हटाया जाएगा और सामान्यतः भावी सरकारी नियोजन के लिए निरर्हता होगी।
Q9. निलम्बन अवधि पेंशन योग्य सेवा में कब गिनेगी?
राजस्थान सिविल सेवा पेंशन नियम 1996 के अनुसार — निलम्बन अवधि को qualifying service में माना जाएगा यदि जांच के आदेशों में अनुशासनिक अधिकारी ने स्पष्टतः निलम्बन अवधि को सेवा योग्य घोषित किया हो। अधिक जानकारी: Pension Rules Complete Guide 2025
Q10. लघु शास्ति (नियम 17) में 3 वर्ष से अधिक वेतन रोकने पर जांच अनिवार्य क्यों?
नियम 17(1)(कक): यदि 3 वर्षों से अधिक वेतन वृद्धि रोकना प्रस्तावित हो या संचयी प्रभाव से कोई भी अवधि के लिए, या पेंशन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े — तो नियम 16 की पूर्ण जांच प्रक्रिया अनिवार्य हो जाती है। यह प्रावधान 1987 में जोड़ा गया था (G.S.R. 37; No. F. 3(9)DOP/A-III/85 dated 16-11-87)।


📄 Official Source: Rajasthan Civil Services (CCA) Rules, 1958 — Official PDF (DOP Rajasthan)
प्रकाशक: SarkariServicePrep.com  |  प्रकाशित: 2 मई 2026  |  संशोधित: 2 मई 2026
⚖️ अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख राजस्थान सिविल सेवा (CCA) नियम 1958 के मूल हिंदी पाठ पर आधारित है। यह शैक्षणिक/सूचनात्मक उद्देश्य से है। किसी विभागीय/कानूनी कार्यवाही में मूल नियम, नवीनतम संशोधन (राजस्थान राजपत्र) और सक्षम प्राधिकारी की सलाह को प्राथमिक मानें।

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